Thursday, January 23, 2014

एक बालिका की अभिलाषा ...

भारत की बेटी

मैं हु भारत कि बेटी , इस देश को मैं बनाउंगी !
कोई न आना राह मे मेरी , हर दुश्मन को मार भगाउंगी !!

मैं हु झांसी कि रानी , मैं हु आहिल्या , गार्गी !
इन्दिरा, रज़िया ,हु कल्पना चावला , जो बनी गगन  की  मार्गी !!

 माता टेरेसा सा  दिल है मेरा ,मीराबाई  जैसा प्रेम ! 
सायना नेहवाल ,पी टी उषा  ,खेल में  मेरीकॉम !!

 जीजा बाई जैसी  माँ हु !  तो किरण बेदी सी बहन !
 सीमा पर हो या देश मे हु!  हँसकर, सब  मुश्किल की है सहन !!

मुझको जन्म लेने दो ,  मै माँ ! बहन ! हु आपकी बेटी ! सब सुंदर सपने सजाउंगी !  
हर  मोके पर  आगे हु मै  ! अब जीने दो मुझको तो  , मैं भी जी  जाउंगी !! ,

देश का नाम ऊचा कर दूंगी , सर्व समाज  को आगे बढ़ाऊंगी !
मैं हु भारत माता कि बेटी ,इस देश को मै बनाउंगी !!






आज  उनका  जन्मदिवस है  जिनको हम  "नेता जी" बोलते है ,जो वास्तव मे देश के नेताओ मे आग्रिम थे ।  जिनका जीवन सच्चे देशभक्त कि कहानी था । एक किताब कि तरह था , उनका जन्म 23 जनवरी, सन 1897 ई. में कटक उड़ीसा में और  पिता का नाम 'जानकीनाथ बोस' और माँ का नाम 'प्रभावती' था।जो एक  मशहूर वक़ील थे। 


 * छात्र बृत्ति  हुई भेद - भाव के कारण  बोस ने मिशनरी स्कूल को छोड़ दिया । 

एक  समय अरविन्द घोस  ने बोस जी से कहा- "हम में से प्रत्येक भारतीय को डायनमो बनना चाहिए, जिससे कि हममें से यदि एक भी खड़ा हो जाए तो हमारे आस-पास हज़ारों व्यक्ति प्रकाशवान हो जाएँ। अरविन्द के शब्द बोस के मस्तिष्क में गूँजते थे। 

इनकी शिक्षा कलकत्ता के 'प्रेज़िडेंसी कॉलेज'और 'स्कॉटिश चर्च कॉलेज' से हुई, और उसके बाद 'भारतीय प्रशासनिक सेवा' (इण्डियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के 'कॅम्ब्रिज विश्वविद्यालय' भेज दिया। सन 1920 ई. में बोस ने 'इंडियन सिविल सर्विस' की परीक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन अप्रैल सन 1921 ई. में भारत में बढ़ती और शीघ्र मार्त भूमि कि सेवा के लिए उसे छोड़ कर  लौट आए।  बोस को अपने बड़े भाई शरतचंद्र बोस (1889-1950 ई.) का भरपूर समर्थन मिला, वर्तमान कोलकाता के एक वक़ील होने के साथ-साथ प्रमुख कांग्रेसी राजनीतिज्ञ भी थे।

। वे चाहते तो उच्च अधिकारी के पद पर आसीन हो सकते थे। परन्तु उनकी देश भक्ति की भावना ने उन्हें कुछ अलग करने के लिए प्रेरित किया।

 उनकी युवा अबस्था में कटक मे  हैजे का प्रकोप हो गया था। शहर के कुछ कर्मठ एवं सेवाभावी युवकों ने ऐसी विकट स्थिति में एक दल का गठन किया। यह दल शहर की निर्धन बस्तियों में जाकर रोगियों की सेवा करने लगा सुभाषचंद्र बोस इस सेवादल के ऊर्जावान नेता थे।

हमारी सामाजिक स्थिति बदतर है, जाति-पाँति तो है ही, ग़रीब और अमीर की खाई भी समाज को बाँटे हुए है। निरक्षरता देश के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। इसके लिए संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता है। -सुभाष चंद्र बोस पूरे देश को सुभाष अपने साथ ले चल पड़े। वे गाँधी जी से मिले।  वे चितरंजन दास जी के पास गए। उन्होंने सुभाष को देश को समझने और जानने को कहा। सुभाष देश भर में घूमें और निष्कर्ष निकाला-
कांग्रेस के अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस ने कहा-
मैं अंग्रेज़ों को देश से निकालना चाहता हूँ। मैं अहिंसा में विश्वास रखता हूँ किन्तु इस रास्ते पर चलकर स्वतंत्रता काफ़ी देर से मिलने की आशा है।

सुभाषचंद्र बोस एक महान नेता थे। नेता अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करते,  सो, नेता जी में यह गुण कूट-कूट कर भरा था। दरअसल, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अलग-अलग विचारों के दल थे। ज़ाहिर तौर पर महात्मा गाँधी को उदार विचारों वाले दल का प्रतिनिधि माना जाता था। वहीं नेताजी अपने जोशीले स्वभाव के कारण क्रांतिकारी विचारों वाले दल में थे।
लेकिन वे यह अच्छी तरह जानते थे कि महात्मा गाँधी और उनका मक़सद एक है, यानी देश की आज़ादी। वे यह भी जानते थे कि महात्मा गाँधी ही देश के 'राष्ट्रपिता' कहलाने के सचमुच हक़दार हैं।और बो उनका बहुत सम्मान करते रहे । गाँधीजी ने भी उनकी देश की आज़ादी के प्रति लड़ने की भावना देखकर ही उन्हें देशभक्तों का देशभक्त कहा था।
सबसे पहले गाँधी को राष्ट्रपिता कहने वाले नेताजी ही थे।
 सुभाषचंद्र बोस एक युवा प्रशिक्षक, पत्रकार व बंगाल कांग्रेस के स्वयंसेवक बने। 1923 ई. में चितरंजन दास द्वारा गठित स्वराज्य पार्टी का सुभाष चन्द्र बोस ने समर्थन किया। 1923 ई. में जब चितरंजन दास ने 'कलकत्ता नगर निगम' के मेयर का कार्यभार संभाला तो उन्होंने सुभाष को निगम के 'मुख्य कार्यपालिका अधिकारी' पद पर नियुक्त किया। 25 अक्टूबर1924 ई. को उन्हें गिरफ़्तार कर बर्मा की 'माण्डले' जेल में बंद कर दिया गया।जहा एक समय तिलक को रखा गया था ।  सन् 1927 ई. में रिहा होने पर बोस कलकत्ता लौट आए, जहाँ चितरंजन दास की मृत्यु की खबर मिली ।  1928 ई. में प्रस्तुत 'नेहरू रिपोर्ट' के विरोध में उन्होंने एक अलग पार्टी 'इण्डिपेन्डेन्ट लीग' की स्थापना की। 1928 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 'कलकत्ता अधिवेशन' में उन्होंने 'विषय समिति' में 'नेहरू रिपोर्ट' प्रकाशित  प्रादेशिक स्वायत्ता के प्रस्ताव का डटकर विरोध किया। 1931 ई. में हुए 'गाँधी-इरविन समझौते' का भी सुभाष ने विरोध किया। सुभाष उग्र विचारों के समर्थक थे। उन्हें 'ऑल इण्डियन यूनियन कांग्रेस' एवं 'यूथ कांग्रेस' का भी अध्यक्ष बनाया गया था।
 बोस बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए गए। सन् 1930 ई. में जब सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हुआ, बोस कारावास में थे। रिहा और फिर से गिरफ़्तार होने व अंतत: एक वर्ष की नज़रबंदी के बाद उन्हें यूरोप जाने की आज्ञा दे दी गई। निर्वासन काल में, उन्होंने 'द इंडियन स्ट्रगल' पुस्तक लिखी और यूरोपीय नेताओं से भारत पक्ष की पैरवी की। सन् 1936 ई. में यूरोप से लौटने पर उन्हें फिर एक वर्ष के लिए गिरफ़्तार कर लिया गया। सन् 1938 ई. में 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' का अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद उन्होंने 'राष्ट्रीय योजना आयोग' का गठन किया, जिसने भारत की  औद्योगिक नीति को सूत्रबद्ध किया।

 सन् 1939 ई. में बोस के प्रति समर्थन की अभिव्यक्ति एक गाँधीवादी पत्तामिसितारम्मैया को दुबारा हुए चुनाव में हरा देने के रूप में प्रकट हुई। लेकिन गाँधी जी के विरोध प्रकट करने  के चलते इन्होने पद त्याग दिया । 

जापान के प्रधानमन्त्री जनरल हिदेकी तोजो ने नेताजी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्हें सहयोग करने का आश्वासन दिया।  नेताजी ने जापान की संसद (डायट) के सामने भाषण भी  दिया।
21 अक्तूबर 1943 के दिन नेताजी ने सिंगापुर में आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द (स्वाधीन भारत की अन्तरिम सरकार) की स्थापना की। वे खुद इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री और युद्धमन्त्री बने। इस सरकार को कुल नौ देशों ने मान्यता दी। नेताजी आज़ाद हिन्द फौज के प्रधान सेनापति भी बन गये।
आज़ाद हिन्द फौज में जापानी सेना ने अंग्रेजों की फौज से पकड़े हुए भारतीय युद्धबन्दियों को भर्ती किया था। आज़ाद हिन्द फ़ौज में औरतों के लिये झाँसी की रानी रेजिमेंट भी बनायी गयी।

जर्मनी में नेताजी एडम वॉन ट्रौट जू सोल्ज़ द्वारा नवगठित 'स्पेशल ब्यूरो फ़ॉर इंडिया' के संरक्षण में आ गए। जनवरी सन् 1942 ई. में उन्होंने और अन्य भारतीयों ने जर्मन प्रायोजित 'आज़ाद हिंद रेडियो'  अंग्रेज़ी,हिन्दी, बांग्ला, तमिल , तेलुगु, गुजराती और पश्तो में नियमित प्रसारण करना शुरू कर दिया। सफ़र करते हुए, सन् 1943 में टोक्यो पहुँचे। 4 जुलाई को उन्होंने पूर्वी एशिया में चलने वाले भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृव्य संभाला । 


। उन्होंने एक सभा में कहा- 'यदि भारत ब्रिटेन के विरूद्ध लड़ाई में भाग ले तो उसे स्वतंत्रता मिल सकती है।' उन्होंने गुप्त रूप से इसकी तैयारी शुरू कर दी। 25 जून को सिंगापुर रेडियो से उन्होंने सूचना दी कि आज़ाद हिन्द फ़ौज का निर्माण हो चुका है। अंग्रेज़ों ने उनको बन्दी बनाना चाहा, पर वे चकमा देकरनिकल गए।
 21 अक्टूबर को उन्होंने प्रतिज्ञा की-
मैं अपने देश भारत और भारतवासियों को स्वतंत्र कराने की प्रतिज्ञा करता हूँ।
लोगों ने तन, मन और धन से इनका सहयोग किया। उन्होंने एक विशाल सभा में घोषणा की- तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा। कतार लग गई।खून बहाने बालो की 
 दक्षिण-पूर्वी एशिया से जापान द्वारा एकत्रित क़रीब 40,000 भारतीय स्त्री-पुरुषों की प्रशिक्षित सेना का गठन शुरू कर दिया।

नेताजी' के नाम से विख्यात सुभाष चन्द्र ने सशक्त क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर1943 को 'आज़ाद हिन्द सरकार' की स्थापना की तथा 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का गठन किया। इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था।
क़दम-क़दम बढाए जा, खुशी के गीत गाए जा-इस संगठन का वह गीत था, जिसे गुनगुना कर संगठन के सेनानी जोश और उत्साह से भर उठते थे।जो आज भी भारतीय सेना गीत है । 
और जापानी सैनिकों के साथ उनकी  आज़ाद हिंद फ़ौज रंगून (अब यांगून) से होती हुई थल मार्ग से भारत की ओर बढ़ती, 18 मार्च सन् 1944 ई. कीकोहिमा और इम्फ़ाल के भारतीय मैदानी क्षेत्रों में पहुँच गई। जापानी वायुसेना से सहायता न मिलने के कारण एक भीषण लड़ाई में भारतीयों और जापानियों की मिली-जुली सेना हार गई और उसे पीछे हटना पड़ा। लेकिन आज़ाद हिंद फ़ौज कुछ अर्से तक बर्मा (वर्तमान म्यांमार) और बाद में हिंद-चीन में अड्डों वाली मुक्तिवाहिनी सेना के रूप में अपनी पहचान बनाए रखने में सफल रही। इसी सेना ने 1943 से 1945 तक शक्तिशाली अंग्रेज़ों से युद्ध किया था तथा उन्हें भारत को स्वतंत्रता प्रदान कर देने के विषय में सोचने के लिए मजबूर किया था। सन् 1943 से 1945 तक 'आज़ाद हिन्द सेना' अंग्रेज़ों से युद्ध करती रहीअपनी फौज को प्रेरित करने के लिये नेताजी ने " दिल्ली चलो" का नारा दिया। दोनों फौजों ने अंग्रेजों से अंदमान और निकोबार द्वीप जीत लिये। यह द्वीप आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द के अनुशासन में रहे। नेताजी ने इन द्वीपों को "शहीद द्वीप" और "स्वराज द्वीप" का नया नाम दिया। दोनों फौजों ने मिलकर इंफाल और कोहिमा पर आक्रमण किया। लेकिन बाद में अंग्रेजों का पलड़ा भारी पड़ा और दोनों फौजों को पीछे हटना पड़ा।

सुभाष भारतीयता की पहचान ही बन गए थे और भारतीय युवक आज भी उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हैं। वे भारत की अमूल्य निधि थे। 'जयहिन्द' का नारा और अभिवादन उन्हीं की देन है।


 उन्होंने कहा था कि- "स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। आपने आज़ादी के लिए बहुत त्याग किया है, किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है। आज़ादी को आज अपने शीश फूल चढ़ा देने वाले पागल पुजारियों की आवश्यकता है। ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है, जो अपना सिर काट कर स्वाधीनता देवी को भेट चढ़ा सकें। तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा। इस वाक्य के जवाब में नौजवानों ने कहा- "हम अपना ख़ून देंगे।" उन्होंने आईएनए को 'दिल्ली चलो' का नारा भी दिया।
तुम मुझे ख़ून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा। सुभाष चंद्र बोस
 जिस व्यक्तित्व ने इसे देश हित में सबके सामने रखा वह किस जीवट का व्यक्ति होगा।


आज इतने वर्षों बाद भी जन मानस उनकी राह देखता है।क्युकी उनके अंतिम समय का कुछ प्रमाण नही है ' वे रहस्य थे ना, और रहस्य को भी कभी किसी ने जाना है?
ताजी सुभाष चंद्र बोस सर्वकालिक नेता थे जिनकी ज़रूरत कल थी, आज है और आने वाले कल में भी होगी। वह ऐसे वीर सैनिक थे, इतिहास जिनकी गाथा गाता रहेगा। उनके विचार, कर्म और आदर्श अपना कर राष्ट्र वह सब कुछ हासिल कर सकता है जिसका हक़दार है। स्वतंत्रता समर के अमर सेनानी, मां भारती के सच्चे सपूत थे। नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उन योद्धाओं में से एक हैं जिनका नाम और जीवन आज भी करोड़ों देशवासियों को मातृभमि के लिए समर्पित होकर कार्य करने की प्रेरणा देता है। उनमें नेतृत्व के चमत्कारिक गुण थे जिनके बल पर उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान संभाल कर अंग्रेज़ों को भारत से निकाल बाहर करने के लिए एक मज़बूत सशस्त्र प्रतिरोध खड़ा करने में सफलता हासिल की। नेता जी के जीवन से यह भी सीखने को मिलता है कि हम देश सेवा से ही जन्मदायिनी मिट्टी का कर्ज़ उतार सकते हैं। उन्होंने अपने परिवार के बारे में न सोचकर पूरे देश के बारे में सोचा। नेता जी के जीवन के कई और पहलू हमे एक नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। वे एक सफल संगठनकर्ता थे। उनकी वाक्‌-‌ --शैली में जादू था और उन्होंने देश से बाहर रहकर 'स्वतंत्रता आंदोलन' चलाया। नेता जी मतभेद होने के बावज़ूद भी अपने साथियो का मान सम्मान रखते थे। नेता जी की व्यापक सोच आज की राजनीति के लिए भी सोचनीय विषय है।

Thursday, January 9, 2014

हमे प्रेम से रहेने दो ....

जम्मू-कश्मीर के सोपोर इलाके में स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) की सर्च टीम पर हुए आतंकी हमले में जहां एक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर (एएसआई) शहीद हो गया, वहीं तीन जवान बुरी तरह जख्मी हो गए।जहां एएसआई कफील अहमद ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। पर बड़ी खबर नही बनी जबकि एसओजी के घायल कांस्टेबल मंजूर अहमद, जाकिर और इरफान अहमद का उपचार चल रहा है। डाक्टरों के अनुसार उनकी हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है। हर भारत बासी इस देश भक्तो के जल्दी ठीक होने की कामना कर रहा है | पर नेता और उनके दल मुज्ज़फ्र्नगर के दंगो पर राजनीति क़र रहे है | खुले मे पड़े लोगो पुनर्वास की मदद करते , दंगो की निष्पक्ष जाँच , अपराधियों को सख्त सज़ा मिलती तो भविष्य मे दंगे होने से बचा जा सकता था | मुस्लिमो के रहनुमा माँने जाने बाले समाजवादी लोग भद्दे न्रत्य और रस -रास का उत्सव मना रहे है |
शहीदों का कोई धर्म नही होता , उनकी तो भावना होती है , जज्वा होता है,, मोका होता है ,सोच होती देश होता है सबसे पहले |
पर मुझे लगता है देश की सत्ता के लिए लड़ते खास और आम आदमियों पर इनका कोई फर्क नही पड़ा | रोज़ लोग मरते है , पर वतन पर सहीद कितने होते है ?
अब मे मोदी जी ., राहुल जी और आम आदमी पार्टी के लोगो के सामने ये निवेदन रखता हु की सहीद के परिवारो को इतनी राशी की राहत तो मिले जो भारत देश पर मरने बालो की शान के मुताबिक हो !,देश सेवा मे शहीद होने बालो सुरक्षा बलो,और नागरिको के परिबार के लिए राहत और पुनर्वास के साधन बढाये जाये विशेष कोष बनाया जाये
और आतंकवादियो को खतमे के लिए लोग अपने पीछे सरकार को खड़ा देखे तब एस देश के दुश्मन भी हमले से पहले हजार बार सोचेंगा ………..
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा, सब मिट गए जहाँ से ।
अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा ||
कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी ।
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा ।।
हां तो लेख का जो विषय था वो ये की इस देश के लिए अब सबसे जरुरी है धार्मिक एकता बाकि बाते तो बेकार हो जाती है जब लोग सडको पर आकर मरते है मारते है , डर और भय से घर मे भी नही रह पाते | लगता है सारी राजनीति ही अब दोनों को लड़ाने के लिए होती है |पर फिर भी कुछ उम्मीद अभी बाकि है ,अभी लाखो करोड़ो लोग प्रेम से साथ रहेते है और अभी भी लोग प्रेम से रहना पसंद करते है |जिसके कुछ उद्धरण इस प्रकार से है …
वाराणसी के एक मदरसे में सांप्रदायिक सौहार्द का एक बेमिसाल उदाहरण देखने को मिलता है, जहां छात्रों को कुरान के साथ-साथ भगवत गीता की भी शिक्षा दी जा रही है। यह आदर्श स्थिति शहर के छतरपुर इलाके स्थित 45 साल पुराने बहरूल-उलूम मदरसा में देखने को मिल रही है, जहां छात्र कुरान की आयतों के साथ-साथ गीता के श्लोक भी पढ़ रहे हैं। मदरसा संचालक 60 वर्षीय हाजी मुख्तार अहमद ने बताया, कुरान के साथ हिंदू शास्त्रों को पढ़ाने के पीछे हमारा उद्देश्य छात्रों को दोनों धार्मिक पुस्तकों में बताई गई बातें बताना हैं, ताकि उन्हें जीवन में ढालकर वे अपना भविष्य बेहतर बना सकें। अहमद के मुताबिक, इससे वे दोनों धर्मग्रंथों में बताई बातों को एक-दूसरे से जोड़े सकेंगे और उनके मन में कुरान के साथ-साथ भगवत गीता के लिए भी सम्मान जागृत होगा। उन्होंने कहा, इस कदम के पीछे हमारा उद्देश्य सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी भाईचारे को मजबूत करना है। दोनों धर्मग्रंथों में एक ही बात बताई गई है कि ईश्वर एक है।
वर्ष 1964 में स्थापित हुए इस मदरसे में करीब एक साल पहले भगवत गीता व अन्य हिंदू शास्त्रों की पढ़ाई शुरू हुई थी। अहमद के अनुसार, हमारा उद्देश्य मदरसे में पढ़ने वाले छात्रों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना और उन्हें एक बेहतर इंसान बनाना है।
मदरसा पदाधिकारियों के मुताबिक, यहां छात्रों को चारों वेद- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद की भी शिक्षा दी जाती है। यहां करीब 2500 छात्र पढ़ते हैं। लड़कियों के लिए 12वीं तक शिक्षा की व्यवस्था है, जबकि लड़कों के लिए आठवीं तक पढ़ाई की सुविधा है। मदरसे में कई हिन्दू शिक्षक भी है |
उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के मुमताज नगर गांव में नसीम की तरह दूसरे मुसलमान भी रामलीला के आयोजन में दिल खोलकर चंदा देकर सालों से चली आ रही इस परम्परा को संजोए हुए हैं। दशकों से मुसलमान इस रामलीला का आयोजन करते आ रहे हैं।
नसीम खान ने कहा, “हमें गर्व है कि हम इस तरह की परम्परा निभा रहे हैं, जो सही अर्थो में आपसी भाईचारे को मजबूत करती है। हर साल दशहरे पर जब हम लोग रामलीला का आयोजन करते हैं तो हम में ऐसी भावनाएं उमड़ती हैं कि जैसे हम ईश्वर की सेवा कर रहे हैं। आखिरकार हिंदू भाई भी तो उसी ईश्वर की संतान हैं।”


रामलीला का आयोजन रामलीला रामायण समिति के बैनर तले होता है। अब से करीब 47 साल पहले गांव के मुसलमानों ने मिलकर आपसी भाईचारे को मजबूत करने के उद्देश्य से इस समिति का गठन किया था। मुमताजनगर गांव की आबादी करीब 600 है जिसमें से तकरीबन 65 फीसदी मुसलमान समुदाय के लोग हैं।
मधुबन (मऊ) : लगभग सौ सालों से लगातार स्थानीय तहसील के ग्राम सभा दरगाह में आयोजित होने वाले ऐतिहासिक रामलीला की बुनियाद एक मुस्लिम व्यक्ति ने रखी थी।
मुजफ्फरनगर के रैदासपुरी में रहने वाली माधोराम शास्त्री सींचपाल के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। उन्होंने बगैर किसी प्रचार के पिछले 10 वर्षो से एक अनूठी मुहिम चला रखी है। वह इस्लाम धर्म का समान कर उसके त्योहारों को उसी तरह मानते हैं, जिस तरह मुसलिम भाई मनाते हैं।
जब एस देश के मुस्लिम भाई देश के लिए आवाज़ बुलंद करके इसके दुश्मनो के आगे खड़े हो कर कह देंगे की ये देश उनका भी है तो किसकी हिम्मत है? की कुछ गलत सोच भी सके
और हिन्दुयो को भी आपसी विश्वास बड़ाने के लिए आगे आना होंगा सुरक्षा का महोल बनाना होंगा , सबसे बड़ी समस्या है राजनीति जो हमे बाटती है , दोनों तरफ के नेता अपनी दूकान चलाए के लिए विकास की नही डर की राजनीति करते है |आजादी के इतने सालो बाद भी अल्प्सख्यको का विकास क्यों नही हो पाया ? क्युकी उनको वोट ही समझा गया इंसान नही |मुस्लिमो को ये सोचना होंगा की ये देश उनका है जिसके निर्माण मे उनकी भी भूमिका महत्वपूर्ण है | और हिन्दुयो को भी ये मानना होंगा की साथ मिलकर ही सर्व विकास हो सकता है |
मुस्लिमो को हर स्तर की शिक्षा , रोजगार मिले और उनको मुख्य धरा और धारा से जोड़ा जाये तब देश मजबूत बनेंगा |दोनों मतो के लोग जब मिलकर काम करंगे तब एस देश और समाज के साथ ही सबका विकास होगा | नही तो गन्दी राजनीति इस देश को बर्बादी के राह पर ले जाने मे कमी नही करेंगी |
अब चुनाव आने है इनमे सबको सोचना है की देश को किस दिशा मे ले जाना है ……

Thursday, January 2, 2014

सफदर हाशमी की मौत नही हो सकती ....

आज सफदर हाशमी की पुण्यतिथि है | उस घटना को तिथि बार याद नही करना चाहता जो रोज होती है | पर २५ वर्ष हो गये है | कबीर से लेकर मखदूम मोहियुद्दीन होते हुये बाबा नागार्जुन तक हर युग में प्रतिरोध के संघर्षों को सांस्कृतिक कर्मियों ने ऊर्जा दी है, शब्द दिये हैं, तो संघर्षों ने भी ऐसे हजारों हजार रचनाकार दिये हैं। सकारात्मक संघर्षों की कोख से साहित्य, गीत, नाटक व रचनाएँ प्रसूत हुयी हैं। संघर्षों की बड़ी उथल-पुथल ने बड़ी-बड़ी रचनाएँ दी हैं। चालीस से सत्तर तक का दशक साहित्य और यहाँ तक कि फिल्म माध्यम का सर्वश्रैष्ठ दौर ऐसे ही नहीं था। फैज अहमद फैज, मंटो, मजाज, ख्वाजा अहमद अब्बास आदि की जन्म हुआ था |
उनका जन्म १२ अप्रैल १९५४ को में हनीफ और कौमर आज़ाद हाशमी के घर दिल्ली मे हुआ था। उनका शुरुआती जीवन अलीगढ़ और दिल्ली में गुज़रा, यही से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। दिल्ली के सेंट स्टीफेन्स कॉलेज से अंग्रेज़ी में ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होने दिल्ली यूनीवस्र्टी से अंग्रेजी में एमए किया। यही वह समय था जब वे स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की सांस्कृतिक यूनिट से जुड़ गए, और इसी बीच इप्टा से भी उनका जुड़ाव रहा।
वो जन नाट्य मंच (जनम) के संस्थापक सदस्य थे। यह संगठन १९७३ में इप्टा से अलग होकर बना, ये सड़क रोड पर आम जन को नाट्यकला से जोड़ने जैसा काम करते रहे | सीटू जैसे मजदूर संगठनो के साथ जनम का अभिन्न जुड़ाव रहा। इसके अलावा जनवादी छात्रों, महिलाओं, युवाओं, किसानो इत्यादी के आंदोलनो में भी इसने अपनी सक्रिय थे । १९७५ में आपातकाल के लागू होने तक सफदर जनम के साथ नुक्कड़ नाटक करते रहे,और देश बहार मे चर्चा का कारण बन गये और उसके बाद आपातकाल के दौरान वे गढ़वाल, कश्मीर और दिल्ली के विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी साहित्य के व्याख्याता के पद पर रहे। आपातकाल के बाद सफदर वापिस राजनैतिक तौर पर सक्रिय हो गए और १९७८ तक जनम भारत में नुक्कड़ नाटक के एक महत्वपूर्ण संगठन के रूप में उभरकर आया।
एक नाटक ‘मशीन’ को दो लाख मजदूरों की विशाल सभा के सामने आयोजित किया गया था । इसके बाद और भी बहुत से नाटक आते रहे |
जिनमे निम्र वर्गीय किसानों की समस्या और बेचैनी का दर्शाता हुआ नाटक ‘गांव से शहर तक’,
सांप्रदायिक फासीवाद को दर्शाते(हत्यारे और अपहरण भाईचारे का),
बेरोजगारी पर बना नाटक ‘तीन करोड़’,
घरेलू हिंसा पर बना नाटक ‘औरत’
और मंहगाई पर बना नाटक डीटीसी की धांधली इत्यादि प्रमुख रहे।
खुद सफदर हाशमी ने लिखा था कि जब कोई मजदूर नुक्कड़ नाटक देख रहा होता है तब वह सिर्फ भीड़ का हिस्सा नहीं होता। उसे देखते हुये जब वह हॅंसता है या तालियाँ बजाता है तो दरअसल वह एक तरह से प्रतिरोध की कार्यवाही में हिस्सा ले रहा होता है।
सफदर ने बहुत से वृत्तचित्रों और दूरदर्शन के लिए एक धारावाहिक ‘खिलती कलियों का निर्माण भी किया’। उन्होने बच्चों के लिए किताबें लिखीं, और भारतीय थिएटर की आलोचना में भी अपना योगदान दिया।उनके गीत दूरदर्शन पर बहुत प्रसिद्ध हुए जिनमे ” पड़ना लिखना सीखो ” ” किताबे ”
“ मुद्दा यह नहीं है कि नाटक कहाँ आयोजित किया जाए (नुक्कड नाटक, कला को जनता तक पंहुचाने का श्रेष्ठ माध्यम है), बल्कि मुख्य मुद्दा तो तो उस अवश्यंभावी और न सुलझने वाले विरोधाभास का है, जो कला के प्रति ‘व्यक्तिवादी बुर्जुवा दृष्टिकोण’ और ‘सामूहिक जनवादी दृष्टिकोण’ के बीच होता है।
- सफदर हाशमी, अप्रैल 1983
सफदर ने जनम के निर्देशक की भूमिका बखूबी निभाई, उनकी मृत्यु तक जनम २४ नुक्कड़ नाटकों को ४००० बार प्रदर्शित कर चुका था। इन नाटकों का प्रदर्शन मुख्यत: मजदूर बस्तियों, फैक्टरियों और वर्कशॉपों में किया गया था। सफदर हिंदुस्तान की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सदस्य थे। १९७९ में उन्होने अपनी कॉमरेड और सह नुक्कड़ कर्मी ‘मल्यश्री हाशमी’ से शादी कर ली। बाद में उन्होंने प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया और इक्रोमिक्स टाइम्स के साथ पत्रकार के रूप में काम किया, वे दिल्ली में पश्चिम बंगाल सरकार के ‘प्रेस इंफोरमेशन ऑफिसर’ के रूप में भी तैनात रहे। १९८४ में उन्होने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और खुद का पूरा समय राजनैतिक सक्रियता को समर्पित कर दिया। सफदर ने दो बेहतरीन नाटक तैयार करने में अपना सहयोग दिया, मक्सिम गोर्की के नाटक पर आधारित ‘दुश्मन’ और प्रेमचंद की कहानी ‘मोटेराम के सत्याग्रह’ पर आधारित नाटक जिसे उन्होने हबीब तनवीर के साथ १९८८ में तैयार किया था। इसके अलावा उन्होने बहुत से गीतों, एक टेलीवीज़न धारावाहिक, कविताओं, बच्चों के नाटक, और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों की अमोल विरासत हमें सौंपी। रैडिकल और पॉपुलर वामपंथी कला के प्रति अपनी कटिबद्धता के बावजूद उन्होने कभी भी इसे व्यर्थ की बौद्धिकत्ता का शिकार नहीं बनने दिया और निर्भीकतापूर्वक प्रयोगों में भी जुटे रहे।
किन्तु १ जनवरी १९८९ को जब दिल्ली से सटे साहिबाबाद के झंडापुर गांव में ग़ाज़ियाबाद नगरपालिका चुनाव के दौरान नुक्कड़ नाटक ‘हल्ला बोल’ का प्रदर्शन किया जा रहा था तभी जनम के ग्रुप पर कांग्रेस (आई) से जुड़े कुछ लोगों ने हमला कर दिया।इस हमले में सफदर बुरी तरह से जख्मी हुए। उसी रात को सिर में लगी भयानक चोटों की वजह से सफदर की मृत्यु हो गई।पर वो जिन्दा है हर गरीब के दिल मे और  दो दिन बाद, ४ जनवरी १९८९ को मल्यश्री हाशमी,उनकी पत्नी जनम की टोली के साथ उस स्थान पर वापिस लौटीं और अधूरे छूट गए नाटक को खत्म किया।आज तक वहा पर उनकी याद मे लोग एक होकर उनको याद करते है | इस घटना के १४ साल बाद गाजियाबाद की एक अदालत ने १० लोगों को हत्या के मामले में आरोपी करार दिया,
सफदर ‘राज्य की तानाशाही’ के खिलाफ भारतीय वामपंथी आंदोलन के लिए एक सांस्कृतिक प्रतिरोध का प्रतीक बनकर उभरे। जनम ने दिल्ली में अपना कार्य जारी रखा। फरवरी १९८९ में भीष्म साहनी और अन्य बुद्धिजीवियों ने मिलकर ‘सफदर हाशमी मैमोरियल ट्रस्ट’(सहमत) का निर्माण किया। सफदर का संगठन जन नाट्य मंच १९८९ की उस घटना के बाद से हर बरस १ जनवरी को झंडापुर के उसी शहादत स्थल पर एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन करता है। इस कार्यक्रम की दर्शक होती है आसपास के औद्योगिक क्षेत्र के सैकड़ों मजदूरों की विशाल भीड़। इसी तरह के एक कार्यक्रम का आयोजन ‘सहमत’ भी दिल्ली के बुद्धिजीवी तबके के बीच विट्ठलभाई पटेल हाउस में करता है। आज सफदर जनवादी तबके के लिए प्रतिरोध के एक बहुत बड़े प्रतीक के रूप में जाना जाता है, बहुत से लोग, गैर सरकारी संस्थान उसकी इस विरासत का इस्तेमाल अपने निजी हित साधने में कर रहे हैं, लेकिन इस सबके बावजूद भी सफदर की अमिट ज्योति इन प्रयासों को धूमिल कर देती हैं।उनसे सबक लेकर जहाँ अपने बीच से बौद्धिक- सांस्कृतिक कर्मी तैयार करने होंगे वहीं अन्य वर्गों से आये जागृत व चेतना सम्पन्न बुद्धिजीवियों को भी स्थान, समय, सुविधा व गुँजाइश देनी होगी।यही उनको असली श्रदांजलि होंगी | अगर शासक वर्गों के लिये खतरनाक नहीं होता तो वे सफदर हाशमी को नहीं मारते। एम.एफ.हुसैन की गैलरी पर तोड़-फोड़ नहीं करते, वली दकनी की मजार को जमीदोंज नहीं करते, ईराक में बगदाद की हजारों साल पुरानी लाइब्रेरी से लेकर मुम्बई की भण्डारकर लाइब्रेरी तक को आग नहीं लगाते, बुद्ध के स्तूपों और ग्रन्थों के पीछे लाठी फावड़े लेकर नहीं दौड़ते। मनु, गौतम और शुक्र महाराजों को स्मृतियाँ और संहिताएँ नहीं लिखनी पड़ती ! अगर इस माध्यम की इतनी प्रामाणिकता व मारकता है तो इसकी हिफाजत व विस्तार आन्दोलन के लिये उतना ही जरूरी है | उनको मरने मत देना | सफ़दर अभी मत जाना भाई …..
पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो
पढ़ना-लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालो
क ख ग घ को पहचानो
अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो
ओ सड़क बनाने वालो, ओ भवन उठाने वालो
खुद अपनी किस्मत का फैसला अगर तुम्हें करना है
ओ बोझा ढोने वालो ओ रेल चलने वालो
अगर देश की बागडोर को कब्ज़े में करना है
क ख ग घ को पहचानो
अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो
पूछो, मजदूरी की खातिर लोग भटकते क्यों हैं?
पढ़ो,तुम्हारी सूखी रोटी गिद्ध लपकते क्यों हैं?
पूछो, माँ-बहनों पर यों बदमाश झपटते क्यों हैं?
पढ़ो,तुम्हारी मेहनत का फल सेठ गटकते क्यों हैं?
पढ़ो, लिखा है दीवारों पर मेहनतकश का नारा
पढ़ो, पोस्टर क्या कहता है, वो भी दोस्त तुम्हारा
पढ़ो, अगर अंधे विश्वासों से पाना छुटकारा
पढ़ो, किताबें कहती हैं – सारा संसार तुम्हारा
पढ़ो, कि हर मेहनतकश को उसका हक दिलवाना है
पढ़ो, अगर इस देश को अपने ढंग से चलवाना है
क ख ग घ को पहचानो
अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो
उनको लाल सलाम !