Monday, June 2, 2014

आम आदमी और उसकी महान शक्ति ...

इस समय देश बदलाव की करवट ले रहा है। यह देश के भविष्य के लिए यह बहुत अनुकूल संकेत है। इस समय देश में दो बातें दिखाई दे रही हैं, पहली- पहले कोई कुछ भी करता था तो आम आदमी कहता था कि कुछ भी करने का कोई फायदा नहीं है। कुछ भी करने से कोई लाभ नहीं है। इस देश में कुछ नहीं हो सकता। अब दो बातें साफ उभरकर आई हैं। चाहे उसके पीछे अन्ना जी  का आंदोलन कह लीजिए, चाहे बाबा रामदेव के आंदोलन की छाया या देश की जागरूकता कह लीजिए अथवा अनेक सामाजिक संस्थाओं के प्रयत्न। कुछ भी हो , दो बातें निकलकर आई हैं, एक तो इस देश में कुछ परिवर्तन होना चाहिए, अभी जो चल रहा है ऐसे नहीं चलना चाहिए। दूसरा- पहले कोई कितने भी आंदोलन कर ले, लोग कहते थे कि कितना भी कर लो, होना-जाना कुछ नहीं है। सब ऐसे ही चलेगा। अब दूसरी बात यह प्रकट हुई है कि आम व्यक्ति यह कहने लगा है कि अब कुछ होकर रहेगा। ये दो बातें इस देश के भविष्य के लिए बहुत अच्छे संकेत के रूप में उभरी हैं। परिवर्तन किसी संगठन से नहीं होता, किसी संगठनात्मक प्रक्रिया से नहीं होता, किसी संस्थागत व्यवस्था से नहीं होता। आम आदमी की आकांक्षा से परिवर्तन होता है।

 हिमालय से कन्याकुमारी तक सारा देश यह चाहता है कि अब कुछ हो। अब कुछ होकर रहेगा। यह दो बातें अब देश में व्याप्त हो चुकी हैं।भगवान कृष्ण ने भी जब घोषणा की 'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत' उस समय वह सामान्य ग्वाले के पुत्र के रूप में थे और कंस जैसी महाशक्ति को उन्होंने पछाड़ा था। गोकुल से भी किसी सहायक को लेकर नहीं गए थे। कहने का अर्थ यह है कि परिवर्तन जब होता है तो वह साधनों से नहीं होता। युद्ध साधनों से नहीं जीते जाते, युद्ध संकल्प से जीते जाते हैं। शस्त्र सहायक हो सकते हैं, लेकिन जीत संकल्प की होती है। मनुष्य जब भीतर से संकल्प घोषित करता है तो उसकी वाणी में भगवान बोला करता है 'सात्विक शक्ति की वाणी में भगवान बोला करते हैं'। संकल्प जब आता है तो जीवन की सोई हुई सारी शक्तियां, सारी ऊर्जाएं व्यक्त होती हैं। एक सामान्य सा व्यक्ति भी असामान्य शक्तियां अपने अंदर प्रकट कर लेता है। कहने का अर्थ यह है कि यदि इस देश का आम नागरिक संकल्प ले ले कि अब हम भ्रष्टाचार सहन नहीं करेंगे, अब तक जो रीति-नीति-गति चलती आई है, अब इसे स्वीकार नहीं करेंगे, न सहन करेंगे, अब हम इसको बदलकर रहेंगे। यह तब होगा जब सामान्य सा काम करने वाला मजदूर और ऊंचे आसन पर बैठने वाला अधिकारी, इन सबकी शक्तियां एक हो जाएंगी। सात्विक शक्तियां जब तक इस देश में कमजोर रहेंगी तब तक असात्विक शक्तियों का बोलबाला रहेगा। असात्विक शक्तियां षड्यंत्रपूर्वक यह चाहती हैं कि सात्विक शक्तियां किसी प्रकार से एक न हों। भगवान राम ने यही किया। ज्ञानी महाराज जनक और धर्म-धुरंधर दशरथ आपस में लड़े जा रहे थे। नैसर्गिक घटना करने वाले विश्वामित्र और ब्रह्मा के मानस पुत्र महाराज वशिष्ठ में आपस में बोलचाल बंद थी। जब अच्छे लोगों की बोलचाल बंद होगी तो असात्विक शक्तियों का ही राज्य होगा। भगवान राम ने पहला काम यह किया कि विवाह को माध्यम बनाया, गुरु बनाए। असात्विक शक्तियों को डिगा दिया और सारी सात्विक शक्तियों को मिला दिया। सभी सात्विक शक्तियों का आशीर्वाद लिया, सहयोग नहीं लिया। सात्विक शक्तियों का नैतिक आशीर्वाद ही काफी होता है। ये सात्विक शक्तियां युद्ध क्षेत्र में हमारे साथ खड़ी होंगी, ऐसा सोचना भी नहीं चाहिए और यह संभव भी नहीं है। लेकिन सात्विक शक्तियों का नैतिक समर्थन ही बहुत बड़ा संबल होता है व्यक्ति का। राम के साथ यही था। सारे देश की शक्तियां चाहती थीं कि राम जीतें और रावण पराजित हो। लेकिन कोई लड़ने नहीं गया। देवताओं ने भी यह देख लिया था कि रावण की लगभग सारी सेना मारी जा चुकी थी और रावण अकेला रह गया था। भगवान देवताओं की रक्षा के लिए ही तो युद्ध कर रहे थे, फिर भी देवता नहीं लड़े। अब मुझे लगता है कि इस देश में राम और कृष्ण दोबारा से प्रकट होने जा रहे हैं सात्विक शक्ति के रूप में, धार्मिक शक्ति के रूप में, राष्ट्रीय शक्ति के रूप में, संकल्प की शक्ति के रूप में, परिवर्तन की शक्ति के रूप में। हो सकता है हाथ में सुदर्शन चक्र न हो, हो सकता है कोई तीर कमान न हो। लेकिन कोई न कोई संकल्प का शस्त्र इस देश की आम जनता के हाथ में होगा और वर्तमान में चलने वाली रीति-नीति, शासन और व्यवस्था धराशायी होगी और एक अच्छा व स्वस्थ, स्वच्छ और सुसम्पन्न, भारत की आत्मा को पोषित और रक्षित करने वाला, ऐसा कोई व्यवस्था पक्ष प्रकट होगा बदलाव का, जिससे भारत आनंद और उन्नयन के शिखर की ओर बढ़ेगा।

जब जब  परिवर्तन के दौर चले, जैसे इस समय चल रहा है।  लगता है परिवर्तन से कुछ नहीं हो पाता, ये बदलाव क्यों असफल होते हैं? इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारा देश अशिक्षित तो है, अज्ञानी नहीं है। इस देश में अभी तक ऐसा व्यक्ति प्रकट नहीं हुआ जो विश्वास दिला दे देश को कि ये मारे तो जा सकते हैं, खरीदे नहीं जा सकते। इनको विचलित नहीं किया जा सकता, इनको लोभ नहीं दिया जा सकता। सत्ता इनको दीवार में तो चुनवा सकती है, लेकिन डिगा नहीं सकती। अभी तक ऐसा कोई व्यक्तित्व प्रकट नहीं हुआ।  अभी तक इस देश में किसी व्यक्ति के प्रति किसी को इतना विश्वास नहीं है। कहीं न कहीं आंदोलन करने वाले नेतृत्व की नींव चटकी हुई है। कहीं न कहीं उनमें भी धब्बे हैं, चाहे पद के हों, चाहे पद-लिप्सा के हों, चाहे अर्थ के हों, चाहे विदेशी एजेंसी के एजेंट के रूप में हों। कहीं न कहीं कुछ दाग-धब्बे हैं। इसके कारण देश धोखा खाता है, देश ने धोखा खाया है। अभी भी धोखा खाने की संभावनाएं हैं। ऐसा व्यक्ति जिस दिन देश देख लेगा कि ये मारे जा सकते हैं, लेकिन खरीदे नहीं जा सकते उसी दिन परिवर्तन हो जाएगा, फिर गड़बड़ नहीं हो सकती।        

अभी तक हम लोग बदलाव करते थे केवल सत्ता के लिए।  दल बदलने से, दलों की सत्ता बदलने से और शासक बदलने से इस देश में कुछ भी बदला नहीं जाएगा। क्योंकि चेहरे बदलते हैं, नीतियां, विधान, संविधान, वे सब प्रवृत्तियां वैसी की वैसी रहती हैं। हमने 1967 में एक बार यह परिवर्तन किया, हमने 1977 में परिवर्तन किया, 1989 में एक बार फिर परिवर्तन किया। अनुभव यह आया कि देश की जनता बार-बार छली गई। जनता ने अपना पूरा काम किया, लेकिन शासकों ने उसको छल लिया। द्रौपदी हर बार छली गई है इस देश के अंदर। मैं समझता हूं कि केवल व्यक्ति बदलने से, सत्ता बदलने से, शासन बदलने से और सत्ताधीश बदलने से काम नहीं चलेगा। पूरी की पूरी व्यवस्था बदली जाए। अभी दुर्भाग्य क्या है? इस देश में ऐसा नहीं है कि सभी भ्रष्ट हो चुके हैं, ऐसा नहीं है कि सभी अफसर रिश्वत लेते हैं। लोग अभी भी अपना कार्य प्रामाणिकता से करना चाहते हैं। लेकिन व्यवस्था ऐसी है कि प्रामाणिक व्यक्ति का जीना मुश्किल हो रहा है। उसकी मजबूरी हो रही है। या तो आप अप्रामाणिक बनिए या फिर , ग्लानि का जीवन जीते रहिए। आपको तंग किया जाएगा। इस देश में व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि अशिष्ट से अशिष्ट व्यक्ति भी शिष्ट होने के लिए मजबूर हो। जबकि आज शिष्ट भी अशिष्ट होने के लिए मजबूर हो रहा है। ईमानदार भी बेईमान होने के लिए मजबूर हो रहा है। हम नहीं चाहते कि हम बेईमान हों, लेकिन शासन की नीति ऐसी है कि हमको बेईमान होने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। होना यह चाहिए कि बेईमान बेईमानी करने की कोशिश करे, लेकिन वह कर न पाए। तो यह पूरा का पूरा 'सिस्टम' बदलना पड़ेगा, पूरा ढांचा बदलना पड़ेगा, पूरी नीतियां बदलनी पड़ेंगी, नीयत बदलनी पड़ेगी, वातावरण भी बदलना पड़ेगा। आम जनता जब तक स्वयं को दंडित करने की मानसिकता में नहीं आएगी, तब तक कोई भी बदलाव सुपरिणामकारी नहीं होगा। हम यह तो चाहते हैं कि हर अफसर ईमानदार हो, लेकिन जब अपना बेटा रिश्वत में फंसा होता है तो हम उसे बचाना चाहते हैं। जब तक अपराध के नाम पर पिता पुत्र को दंडित नहीं करेगा, पुत्र पिता को दंडित नहीं करेगा, गुरु शिष्य को दंडित नहीं करेगा, शिष्य गुरु को दंडित नहीं करेगा, तब तक कुछ ठीक नहीं हो सकता। 

जनता की भूमिका है सबसे बड़ी :-

परिवर्तन में भूमिका तो जनता की ही होगी, क्योंकि जनता का ही देश है, जनता का ही शासन है, जनता के ही शासक हैं और जनता को ही, उन शासकों की नीतियां पालन करनी पड़ती हैं। जनता यह तय कर ले कि हम सब सहन कर लेंगे, लेकिन गलत नीतियों के आधार पर सुविधाएं नहीं भोगेंगे। यहां पर जनता को शुरुआत करनी होगी कि यदि हमारे पास अन्याय करने वाला, अनीति करने वाला शासन हो तो हम उसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। इसकी शुरुआत हमें अपने घर से करनी होगी। हर पिता को कहना होगा-बेटा, हमारे घर में अब अनीति का पैसा प्रवेश नहीं करेगा, रिश्वत का पैसा हम स्वीकार नहीं करेंगे। ऐसा होना चाहिए। लेकिन हो क्या रहा है, हमारे यहां? गोस्वामी जी ने कहा, हमारे यहां धर्म की शिक्षा तो दी जाती है- 'मात-पिता बालक न बुलावे, उदर भरै सो धर्म सिखावे'। जिस प्रकार भी पेट भरता हो, उस धर्म की शिक्षा देते हैं। नहीं, जिस प्रकार से नैतिकता भरती हो, जिस प्रकार से जीवन में चरित्र भरता हो, जिस प्रकार से जीवन में धर्म भरता हो, जिस प्रकार से जीवन में संस्कृति भरती हो, जिस प्रकार से जीवन में सदाचार भरता हो, जिस प्रकार से जीवन में संवेदनशीलता भरती हो, जिस प्रकार से जीवन में राष्ट्रीयता भरती हो, जिस प्रकार से जीवन में परोपकार भरता हो, उस धर्म की शिक्षा अब माता-पिता को देनी पड़ेगी। केवल धर्माचार्यों के शिक्षा देने से काम नहीं चलेगा। शिक्षा नीति में भी ऐसा परिवर्तन करना पड़ेगा। सबसे बड़ा शिक्षा केन्द्र है हमारे घर का आंगन, जहां पहले माता-पिता बैठकर सिखाते थे। आज बेटा रिश्वत लाता है तो पिता को प्रसन्नता होती है, पिता उस दिन रोए जिस दिन पुत्र रिश्वत के पैसे लेकर घर आए। यहां से जनता की भूमिका शुुरू होगी। मुझे लगता है कि तब सब ठीक होगा। दंड के कड़े कानून भी हों। अभी क्या हो रहा है कि जिन लोगों ने घोटाले किए उन्हें जेल तो हो गई लेकिन घोटाले वैसे के वैसे ही हैं। जो पैसा खा गए उनसे बाकायदा पैसा वसूल किया जाए और उनको सार्वजनिक रूप से दंडित किया जाए। जो अपराधी है, उसे कठोर से कठोर दंड दिया जाए। सभ्य व्यक्ति भयभीत है, सुशिक्षित भयभीत है। आज गुंडे, अपराधी, लुटेरे, ये लोग अभय प्राप्त हैं। इनको किसी प्रकार का भय नहीं है। ऐसा लगता है कि शासन ने इनको संरक्षण दिया हुआ है। जब सभ्य, सज्जन की सुरक्षा होगी और गुंडे, अपराधी दंडित होंगे और सार्वजनिक रूप से दंडित होंगे तो मुझे लगता है कि सबको दंडित करने की आवश्यकता नहीं होगी। 2-4 जगह जब सार्वजनिक रूप से कुछ लोग दंडित हो गए तो बहुत सारे तो अपने आप ही ठीक हो जाएंगे।

और अंत में यही सार  निकलता है की दुनिया के हर देश में बड़ी क्रांति आप आदमियों ने ही करी है और क़र  रहे  है |भारत में भी यही होता देखा है ,


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