भईया !
यही तो नाम होता है घर में । घर के बड़े पुत्र का , उत्तर प्रदेश मे। प्रकाश का भी है जो रघुबंश जी के तीनो पुत्रो में सबसे बड़े है ।पर सबसे बड़े पुत्र होने के कारण , लाडले भी रहे है अपने माता -पिता के ,
सच तो ये है परिवार भी देश की तरह तरक्की करते है धीरे - धीरे .. शुरुआत मे नोकरी भी छोटी होती है और खर्चे भी जायदा होते है धीरे धीरे ही तो घर मै आराम की चीज़े आती है अगर पिताजी सरकारी नोकरी मे हो ।
पर रघु जी तो आदमी भी बड़े अलग टाइप के थे ।बिलकुल आम आदमी से हटकर , उनका सबकुछ अपने लिए होता था वेतन का चोथा हिस्सा भी अगर घर पर देना पड़े तो उनको जाएदा लगता था । आच्छे कपडे , सूट सिगरेट रोज़ का खाना पीना क्या कमी थी उन्हें ?पर घर में tv 30 साल के बाद आया था । यारो के यार है ! उनके दोस्तों के दोस्त भी जब शहर में आते तो खाना ,रहना रघु जी के पास ही होता । चाहे घर किराये का हो या अपना ।
सबसे बड़ा शोंक था शराब का ।जिन्दगी क्या ? परिवार क्या ? , नोकरी भी दाव पर लगा कर पीते थे ।बड़े सरकारी पद पर आसीन थे ।पर शुरुआत तो क्लर्क के पोस्ट से की थी उस समय भी राजनीति ओर उसके दलालों का साथ था अब भी है ! यु तो उनके पांच बच्चे थे एक बड़ी लड़की और बाकी सब लड़के थे सबसे बड़ी लड़की का विवहा समय पर कर दिया था ।वो अपने घर पर खुश थी ।उसमे पत्नी पुष्पा देवी के विशेष प्रयास था। नही तो रघु जी के शही अंदाज़ हर रिश्ते में भी आड़े आ गए थे ।वो खाली हाथ के राजा है ।
परिवार के शुरुआत के संघर्ष के दिन तो दोनों बड़े बच्चो ने ही देखे और झेले थे ।बाद के पैदा हुए बालक तो ठीक - ठाक बड़े हुए थे ।पर मुख्य रूप से जिन्दगी की लड़ाई तो पुष्पा देवी ने लड़ी थी । उनको शाम को कभी पता नही होता था की आज रघु जी घर आएंगे भी या नही ? आयेंगे तो रिक्शा में बैठकर या लेट कर ? कितने बजे ? कितने लोगो का खाना बनाना होंगा अगीठी पर , कितना शोर होंगा ? कितनी गालिया मिलेंगी ? पूरी पूरी रात तीन लोग जागते थे पर भैया को कभी फ़िक्र न हुई अपने पापा की,या बड़े होने के कारण शर्म आती होंगी ! किस्मत की खास मार ये थी की पुष्पाजी अपने माँ-वाप की अकेली संतान होने के कारण बड़े ही लाड - नाज़ में बड़ी हुई थी ।जिसके शादी भी 15-16 साल की उम्र में ही कर दी गयी थी 45 साल पहले
ये बात तो 30 - 35 साल पुरानी है ,पर मोबाइल तो रघु जी पर आज भी नही है ।मोबाइल के अपने घाटे है जो रघुजी गिनकर बताते थे ।और अब मोका मिलने पर पुष्पा जी के फ़ोन से अपने दोस्तों से बतियाते रहते थे ।
बड़ी मुश्किलो में बच्चे पद रहे थे बैसे तो रघु जी को ये भी नही पता था की कोन सा बच्चा किस स्कूल में है पर परीक्षा के दिनों मे पता नही कैसे उन्हें पता चल जाता था और खूब रात को अपनी सुरा लीला दिखाते जरुर थे वो भी पूरे जोर शोर से ।रात को 2 बजे नाटक देख कर सुबह कैसा exam होता होंगा?
इ न सब जीवन के चक्रों से होकर बच्चे बड़े हो रहे थे ।पर उनके मम्मी ने मनो कसम खा रखी थी। उन्हें सफल करने की ! सब कुछ दाव पर लगा रखा था ।बच्चो पर अनुशासन का डंडा मजबूती से चलता था ।इसी के कारण सभी बच्चे अपने साधनों के अनुसार पदाई राजकीय बिद्यालय में कर रहे थे ।कई बार लोगो ने उन्हें अपने लडको को बेतहाशा मारते देखा । डाँडो से / थपकी से जो मिल जाये सब कुछ मा नो दौरा पड़ गया हो !
दमा भी था उन्हें रात - रात भर खास्ती रहती थी । सो नही पाती ... बच्चे भी जगे रहते !पर उनके पापा जी को होश नही होता था ! इन सबके बीच प्रकाश अड़ियल स्वाभाव के कारण कुछ बिगड़ गया था कई बार स्कूल और मोहल्लो के अवंझित जगहों से पुष्पा जी बेतहाशा मारती हुई घर लाई थी ।कभी स्कूल गोल तो कभी कंचे का खेल ! पिटाई के कारण प्रकाश में विद्रोही स्वाभाव के भाव आ गए थे । पीटने पर भी नही मानता ।सब को अपना दुश्मन मानने लगा था ।घर खर्च के लिए , मकान के किराये के लिए पुष्पा जी ने स्वेटर सिलने का काम भी बहुत छिपा कर किया ।जिसमे सब बच्चो ने सहयोग किया ।
बड़े होने के सारे फाएदे उड़ाते थे भैया जी !छोटे भाई अगर मैथ मई प्रशन नम्बर 5 पूछते तो फेले चार बताने होते थे ।पहला पूछते तो पहाड़े सुनाने पड़ते थे वो भी खास तोर पर 17 और 19 का पहाडा , तो कभी कटवा पहाड़े !क्युकी अपने रागु जी छोटे भाइयो के टुसन के भी बिरोधी थे ।
के उनके डर से ही दोनों छोटे भाइयो ने अपने विषय हो परिवर्तित कर डाले थे मैथ तुरंत छोड़ दिया और जीव विज्ञानं पकड़ लिया मूर्खो ने । पर प्रकाश जी तो पूरे महोल्ले के बड़े भाई थे।क्योकि उस समय हर जगह लडको के दो या तीन समूह होते थे।अब तो एक भी समूह नही होता इन्टरनेट पर ही बाते कर लेते है लड़के ! वो आयु और रिस्तो के अनुसार ,बड़े भाइयो का अलग दल होता था जो अपने को मालिक और छोटो को नौकर मानता था ।और बड़े दल में सभी के बड़े भाई थे ।तो हर परीक्षा के बाद बापस लोटते लडको को वो गली के बहार ही खड़े मिलते ! बही पूरा पेपर पूछते जलील करते , जो गलत होता तो अच्छा था, सही सवाल होता हो वो घर बुलाकर उसे करवा कर देखते थे । जिन्दगी नरक हो गयी थी !सारा मूड का गोबर बना देते थे । युवा होते लडको का । लगता था मर ही जाये ।कोन से भाई का रिजल्ट कब आरहा है ? स्कूल में कब टेस्ट है ? ...क्या टाइम है?... कहा घूम रहे थे ?.... आने मे इतनी देर क्यों हुई ..? ....बाल क्यों बड़े है.... ? "चल दिए .......तैल फुलेल लगा कर ?ये उनका रोज़ का कथन था । अच्छे कपडे पहनना मुस्किल हो गया था ।पर भगवन के मार देखो ... खुद 12बी कक्षा में फ़ैल हो गए तब थोरा प्रकोप कम हुआ ।
हिसाब में इतने पक्के थे, की रन आउट कभी हुए नही।क्लीन बोल्ड और कैच आउट में भी कुछ कमी निकाल ही देते थे और अगर गेंद में 1 रुपए की हिस्सेदारी भी की तो आउट होने पर 1 रुपए की गेंद ही काट डाली लो सा ....... अब खेल लो !!बाहर चोरहा पर खड़े लडको को पकड़ के बोलते अबे तुम बदमाश ओ गए हो क्या ? आओ मुझसे लड़ो !और कुश्ती करने लगते सबसे तकड़े लड़के से ।पर बड़ा भाई के दोस्त होने का फायेदा तो प्रकाश जी लेते ही थे हर बार तो जीत जाते ।ये बात कभी सामने न आई की 10थ तक वो बिस्टर पर ही पिशाब करते थे ।जिन्दगी युही चलती रही ..
भैया
पर बहुत सारी अच्छाई भी है प्रकाश भाई मै , घर के सारा समान लाना , छोटो को एक ही साएकिल पर स्कूल छोड़ के आना हर मशीन को ठीक करना । सारी रिश्तेदारी निभाना । बाबाजी दादी जी ताऊ जी ताई जी सब को सँभालते थे ।सबसे बाते करते ।छोटे बाले भाई तो रिश्तेदारों को देख केर छिप जाते थे ।किसी को जरा से चोट लगने पर अंशु उनकी आँखों में होते ।बहार किसी की मजाल नही थी की घर के तरफ देख भी ले । गुस्सा तो उनकी नाक पर रहता था ।लड़ाई तो अंडर वर्ल्ड डोन से भी कर सकते थे।और कर भी चुके थे
.अब और भी बिद्रोही हो गए थे अपने आप ही बिना किसे बात के ।अब पुष्प जी के त्याग मेहनत रंग आई और प्रकाश जी I T I में चयनित हो गए .. घर में दो ही लोग गरम खाना खाते थे जिनके आने पर स्टोव जलता था प्रकाश जी और खुद रघु जी । बाकि सब परिजन दलित समाज की तरह थे । कैसा भी खाना खा लेते थे ... सबसे जादा लड़ाई होती अपनी बड़ी बहन से , उसको कुंडल, नए सूट, बालो के क्लि,प फैशन के सभी साधनो को सक्त मनाही थी भैया जी तरफ से, कई बार खुद पीछा करके देखते थे ....दसियों बार पीटाई भी कर चुके थे बड़ी बहन की ! बहन कितनी भी बड़ी हो पिटाई खाती ही है भाई से , लड़ाई हो जाने पर !.सारी दुनिया में !..
पुष्पा जी को देखो ! अगर वो 15 मिनट भी लेट हो जाये तो घर से बहार रोड पर खड़ी हो जाती थी ।मोबाईल तो थे नही पर छोटे भाइयो को उसके दोस्तों के घर भेजकर पुछवाती की प्रकाश के दोस्त कही घर पर लेट आने को तो नही बोल गए । बड़ी अजीब बात थी .. पर छोटे भाई विशाल ने रोज़ ही अपनी मम्मी को जूठ बोल देने की आदत ही बना ली , की हां ! आज लेट होंगे ,फिर रोज़- रोज़ परेशान होकर मना ही कर दिया पूछने जाने को ।अब ये जिम्मेदारी सबसे छोटे अमर की थी । जो पहेले तो एक धंटा , घर से इधर -उधर रहता की भाई अपने आप आजाये तो पूछना न पड़े ।भाई के आने पर ही चाय और खाना बनता था गर्म गर्म ।घर में पैसे हो या नही पर भैया जी को कभी न नही हुई टुसन को ।और अब अखवार के कागज से लिफाफे भी बनाये जाने लगे जिसे भैया जी कुछ जुट सच बोल कर आस-पास के दुकानदारो को बेच कर आते बनाने में भी सबसे जाएदा मेहनत करते ।ओर पर पता नही क्यों ? पुष्प जी के साथ भी जाएदा नही बनी ?? शायद पचपन की जरुरी पिटाई उसके दिल पर लिखी रही ।दिमाग तक नही पहुची ।या कभी सोचा ही नही .
फिर अचानक एक दिन उस की नोकरी लग गयी । सेना के तकनीकी कोर में , घर से मानो काले बादल छटने लगे थे । अब वो राजे हो गए खूब पैसे भेजते रहे रघु जी भी अब कुछ शांत होते जा रहे थे । जब घर में दो कमाने लगते है तो पद सोपान बदलते ही रहते है। कैंटीन से अच्छा ब्रांड सस्ता मिल जाता था ।जब वो आता दिल खोल कर सब .....पर आज भी जब वो जाता है , आंसू आँखों में छुपाने के लिए कैंटीन से ख़रीदा रे -बेन का चश्मा लगा लेता है , पर रुमाल से आँखे पूछनी ही पड़ता है जो पोल खोल देता है ।
उसके आदेश मानो सबसे जरुरी हो गए थे ।उसकी बातो पर जान देने को मन करता !मानो घर को रघु जी का छोटा पैक मिल गया था ।
इधर रघु जी भी सेवा निवर्त हो गए थे उससे पहेले भैया जी के शादी अच्छे बड़े घर में कर दी बहू भी सेवा करने बाली थी ।पर........
बाकि कल ....................
यही तो नाम होता है घर में । घर के बड़े पुत्र का , उत्तर प्रदेश मे। प्रकाश का भी है जो रघुबंश जी के तीनो पुत्रो में सबसे बड़े है ।पर सबसे बड़े पुत्र होने के कारण , लाडले भी रहे है अपने माता -पिता के ,
सच तो ये है परिवार भी देश की तरह तरक्की करते है धीरे - धीरे .. शुरुआत मे नोकरी भी छोटी होती है और खर्चे भी जायदा होते है धीरे धीरे ही तो घर मै आराम की चीज़े आती है अगर पिताजी सरकारी नोकरी मे हो ।
पर रघु जी तो आदमी भी बड़े अलग टाइप के थे ।बिलकुल आम आदमी से हटकर , उनका सबकुछ अपने लिए होता था वेतन का चोथा हिस्सा भी अगर घर पर देना पड़े तो उनको जाएदा लगता था । आच्छे कपडे , सूट सिगरेट रोज़ का खाना पीना क्या कमी थी उन्हें ?पर घर में tv 30 साल के बाद आया था । यारो के यार है ! उनके दोस्तों के दोस्त भी जब शहर में आते तो खाना ,रहना रघु जी के पास ही होता । चाहे घर किराये का हो या अपना ।
सबसे बड़ा शोंक था शराब का ।जिन्दगी क्या ? परिवार क्या ? , नोकरी भी दाव पर लगा कर पीते थे ।बड़े सरकारी पद पर आसीन थे ।पर शुरुआत तो क्लर्क के पोस्ट से की थी उस समय भी राजनीति ओर उसके दलालों का साथ था अब भी है ! यु तो उनके पांच बच्चे थे एक बड़ी लड़की और बाकी सब लड़के थे सबसे बड़ी लड़की का विवहा समय पर कर दिया था ।वो अपने घर पर खुश थी ।उसमे पत्नी पुष्पा देवी के विशेष प्रयास था। नही तो रघु जी के शही अंदाज़ हर रिश्ते में भी आड़े आ गए थे ।वो खाली हाथ के राजा है ।
परिवार के शुरुआत के संघर्ष के दिन तो दोनों बड़े बच्चो ने ही देखे और झेले थे ।बाद के पैदा हुए बालक तो ठीक - ठाक बड़े हुए थे ।पर मुख्य रूप से जिन्दगी की लड़ाई तो पुष्पा देवी ने लड़ी थी । उनको शाम को कभी पता नही होता था की आज रघु जी घर आएंगे भी या नही ? आयेंगे तो रिक्शा में बैठकर या लेट कर ? कितने बजे ? कितने लोगो का खाना बनाना होंगा अगीठी पर , कितना शोर होंगा ? कितनी गालिया मिलेंगी ? पूरी पूरी रात तीन लोग जागते थे पर भैया को कभी फ़िक्र न हुई अपने पापा की,या बड़े होने के कारण शर्म आती होंगी ! किस्मत की खास मार ये थी की पुष्पाजी अपने माँ-वाप की अकेली संतान होने के कारण बड़े ही लाड - नाज़ में बड़ी हुई थी ।जिसके शादी भी 15-16 साल की उम्र में ही कर दी गयी थी 45 साल पहले
ये बात तो 30 - 35 साल पुरानी है ,पर मोबाइल तो रघु जी पर आज भी नही है ।मोबाइल के अपने घाटे है जो रघुजी गिनकर बताते थे ।और अब मोका मिलने पर पुष्पा जी के फ़ोन से अपने दोस्तों से बतियाते रहते थे ।
बड़ी मुश्किलो में बच्चे पद रहे थे बैसे तो रघु जी को ये भी नही पता था की कोन सा बच्चा किस स्कूल में है पर परीक्षा के दिनों मे पता नही कैसे उन्हें पता चल जाता था और खूब रात को अपनी सुरा लीला दिखाते जरुर थे वो भी पूरे जोर शोर से ।रात को 2 बजे नाटक देख कर सुबह कैसा exam होता होंगा?
इ न सब जीवन के चक्रों से होकर बच्चे बड़े हो रहे थे ।पर उनके मम्मी ने मनो कसम खा रखी थी। उन्हें सफल करने की ! सब कुछ दाव पर लगा रखा था ।बच्चो पर अनुशासन का डंडा मजबूती से चलता था ।इसी के कारण सभी बच्चे अपने साधनों के अनुसार पदाई राजकीय बिद्यालय में कर रहे थे ।कई बार लोगो ने उन्हें अपने लडको को बेतहाशा मारते देखा । डाँडो से / थपकी से जो मिल जाये सब कुछ मा नो दौरा पड़ गया हो !
दमा भी था उन्हें रात - रात भर खास्ती रहती थी । सो नही पाती ... बच्चे भी जगे रहते !पर उनके पापा जी को होश नही होता था ! इन सबके बीच प्रकाश अड़ियल स्वाभाव के कारण कुछ बिगड़ गया था कई बार स्कूल और मोहल्लो के अवंझित जगहों से पुष्पा जी बेतहाशा मारती हुई घर लाई थी ।कभी स्कूल गोल तो कभी कंचे का खेल ! पिटाई के कारण प्रकाश में विद्रोही स्वाभाव के भाव आ गए थे । पीटने पर भी नही मानता ।सब को अपना दुश्मन मानने लगा था ।घर खर्च के लिए , मकान के किराये के लिए पुष्पा जी ने स्वेटर सिलने का काम भी बहुत छिपा कर किया ।जिसमे सब बच्चो ने सहयोग किया ।
बड़े होने के सारे फाएदे उड़ाते थे भैया जी !छोटे भाई अगर मैथ मई प्रशन नम्बर 5 पूछते तो फेले चार बताने होते थे ।पहला पूछते तो पहाड़े सुनाने पड़ते थे वो भी खास तोर पर 17 और 19 का पहाडा , तो कभी कटवा पहाड़े !क्युकी अपने रागु जी छोटे भाइयो के टुसन के भी बिरोधी थे ।
के उनके डर से ही दोनों छोटे भाइयो ने अपने विषय हो परिवर्तित कर डाले थे मैथ तुरंत छोड़ दिया और जीव विज्ञानं पकड़ लिया मूर्खो ने । पर प्रकाश जी तो पूरे महोल्ले के बड़े भाई थे।क्योकि उस समय हर जगह लडको के दो या तीन समूह होते थे।अब तो एक भी समूह नही होता इन्टरनेट पर ही बाते कर लेते है लड़के ! वो आयु और रिस्तो के अनुसार ,बड़े भाइयो का अलग दल होता था जो अपने को मालिक और छोटो को नौकर मानता था ।और बड़े दल में सभी के बड़े भाई थे ।तो हर परीक्षा के बाद बापस लोटते लडको को वो गली के बहार ही खड़े मिलते ! बही पूरा पेपर पूछते जलील करते , जो गलत होता तो अच्छा था, सही सवाल होता हो वो घर बुलाकर उसे करवा कर देखते थे । जिन्दगी नरक हो गयी थी !सारा मूड का गोबर बना देते थे । युवा होते लडको का । लगता था मर ही जाये ।कोन से भाई का रिजल्ट कब आरहा है ? स्कूल में कब टेस्ट है ? ...क्या टाइम है?... कहा घूम रहे थे ?.... आने मे इतनी देर क्यों हुई ..? ....बाल क्यों बड़े है.... ? "चल दिए .......तैल फुलेल लगा कर ?ये उनका रोज़ का कथन था । अच्छे कपडे पहनना मुस्किल हो गया था ।पर भगवन के मार देखो ... खुद 12बी कक्षा में फ़ैल हो गए तब थोरा प्रकोप कम हुआ ।
हिसाब में इतने पक्के थे, की रन आउट कभी हुए नही।क्लीन बोल्ड और कैच आउट में भी कुछ कमी निकाल ही देते थे और अगर गेंद में 1 रुपए की हिस्सेदारी भी की तो आउट होने पर 1 रुपए की गेंद ही काट डाली लो सा ....... अब खेल लो !!बाहर चोरहा पर खड़े लडको को पकड़ के बोलते अबे तुम बदमाश ओ गए हो क्या ? आओ मुझसे लड़ो !और कुश्ती करने लगते सबसे तकड़े लड़के से ।पर बड़ा भाई के दोस्त होने का फायेदा तो प्रकाश जी लेते ही थे हर बार तो जीत जाते ।ये बात कभी सामने न आई की 10थ तक वो बिस्टर पर ही पिशाब करते थे ।जिन्दगी युही चलती रही ..
भैया
पर बहुत सारी अच्छाई भी है प्रकाश भाई मै , घर के सारा समान लाना , छोटो को एक ही साएकिल पर स्कूल छोड़ के आना हर मशीन को ठीक करना । सारी रिश्तेदारी निभाना । बाबाजी दादी जी ताऊ जी ताई जी सब को सँभालते थे ।सबसे बाते करते ।छोटे बाले भाई तो रिश्तेदारों को देख केर छिप जाते थे ।किसी को जरा से चोट लगने पर अंशु उनकी आँखों में होते ।बहार किसी की मजाल नही थी की घर के तरफ देख भी ले । गुस्सा तो उनकी नाक पर रहता था ।लड़ाई तो अंडर वर्ल्ड डोन से भी कर सकते थे।और कर भी चुके थे
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पुष्पा जी को देखो ! अगर वो 15 मिनट भी लेट हो जाये तो घर से बहार रोड पर खड़ी हो जाती थी ।मोबाईल तो थे नही पर छोटे भाइयो को उसके दोस्तों के घर भेजकर पुछवाती की प्रकाश के दोस्त कही घर पर लेट आने को तो नही बोल गए । बड़ी अजीब बात थी .. पर छोटे भाई विशाल ने रोज़ ही अपनी मम्मी को जूठ बोल देने की आदत ही बना ली , की हां ! आज लेट होंगे ,फिर रोज़- रोज़ परेशान होकर मना ही कर दिया पूछने जाने को ।अब ये जिम्मेदारी सबसे छोटे अमर की थी । जो पहेले तो एक धंटा , घर से इधर -उधर रहता की भाई अपने आप आजाये तो पूछना न पड़े ।भाई के आने पर ही चाय और खाना बनता था गर्म गर्म ।घर में पैसे हो या नही पर भैया जी को कभी न नही हुई टुसन को ।और अब अखवार के कागज से लिफाफे भी बनाये जाने लगे जिसे भैया जी कुछ जुट सच बोल कर आस-पास के दुकानदारो को बेच कर आते बनाने में भी सबसे जाएदा मेहनत करते ।ओर पर पता नही क्यों ? पुष्प जी के साथ भी जाएदा नही बनी ?? शायद पचपन की जरुरी पिटाई उसके दिल पर लिखी रही ।दिमाग तक नही पहुची ।या कभी सोचा ही नही .
फिर अचानक एक दिन उस की नोकरी लग गयी । सेना के तकनीकी कोर में , घर से मानो काले बादल छटने लगे थे । अब वो राजे हो गए खूब पैसे भेजते रहे रघु जी भी अब कुछ शांत होते जा रहे थे । जब घर में दो कमाने लगते है तो पद सोपान बदलते ही रहते है। कैंटीन से अच्छा ब्रांड सस्ता मिल जाता था ।जब वो आता दिल खोल कर सब .....पर आज भी जब वो जाता है , आंसू आँखों में छुपाने के लिए कैंटीन से ख़रीदा रे -बेन का चश्मा लगा लेता है , पर रुमाल से आँखे पूछनी ही पड़ता है जो पोल खोल देता है ।
उसके आदेश मानो सबसे जरुरी हो गए थे ।उसकी बातो पर जान देने को मन करता !मानो घर को रघु जी का छोटा पैक मिल गया था ।
इधर रघु जी भी सेवा निवर्त हो गए थे उससे पहेले भैया जी के शादी अच्छे बड़े घर में कर दी बहू भी सेवा करने बाली थी ।पर........
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