Thursday, July 19, 2012

भईया ! - 1

भईया !
          यही तो नाम होता है घर में  । घर के बड़े पुत्र का , उत्तर प्रदेश मे। प्रकाश का भी है जो रघुबंश  जी के तीनो पुत्रो में सबसे बड़े है ।पर सबसे बड़े पुत्र होने के कारण , लाडले भी रहे  है अपने माता -पिता के ,
सच तो ये है परिवार भी देश की तरह तरक्की करते है धीरे - धीरे .. शुरुआत मे नोकरी भी छोटी होती है और खर्चे भी जायदा होते है धीरे धीरे ही तो घर मै  आराम की चीज़े आती है अगर पिताजी सरकारी नोकरी मे हो ।
पर रघु जी तो आदमी भी बड़े अलग टाइप के थे ।बिलकुल आम आदमी से हटकर , उनका सबकुछ अपने लिए होता था वेतन का चोथा हिस्सा भी अगर घर पर देना पड़े तो उनको  जाएदा लगता था । आच्छे  कपडे , सूट  सिगरेट रोज़ का खाना पीना क्या कमी थी उन्हें ?पर घर में tv 30 साल के बाद आया था । यारो के यार है ! उनके दोस्तों के दोस्त भी जब शहर में आते तो खाना ,रहना रघु जी के पास ही होता । चाहे घर किराये का हो या अपना ।
सबसे बड़ा शोंक था शराब का ।जिन्दगी क्या ?  परिवार क्या ? , नोकरी भी दाव पर लगा कर  पीते थे ।बड़े सरकारी पद पर आसीन  थे ।पर शुरुआत तो क्लर्क के पोस्ट से की थी उस समय भी राजनीति ओर उसके दलालों का साथ था अब भी है ! यु तो उनके पांच  बच्चे थे एक बड़ी लड़की  और बाकी सब लड़के थे सबसे बड़ी लड़की का विवहा   समय पर कर दिया था ।वो अपने घर पर खुश  थी ।उसमे पत्नी पुष्पा  देवी के विशेष  प्रयास था। नही तो रघु जी के शही अंदाज़ हर  रिश्ते में भी आड़े आ गए थे ।वो खाली हाथ के राजा है ।
परिवार के शुरुआत के संघर्ष के दिन तो दोनों बड़े बच्चो ने ही देखे और झेले थे ।बाद के पैदा हुए बालक तो ठीक - ठाक बड़े हुए थे ।पर मुख्य रूप से जिन्दगी की लड़ाई तो पुष्पा देवी ने लड़ी थी । उनको शाम को कभी पता नही होता था की आज  रघु जी घर आएंगे भी या नही ? आयेंगे तो रिक्शा में  बैठकर या लेट कर ? कितने बजे ? कितने लोगो का खाना बनाना होंगा अगीठी पर , कितना शोर होंगा ? कितनी गालिया मिलेंगी ? पूरी पूरी रात तीन लोग जागते थे पर भैया को कभी फ़िक्र न हुई अपने पापा की,या बड़े होने के कारण शर्म आती होंगी  ! किस्मत की खास मार ये थी की पुष्पाजी अपने माँ-वाप की अकेली संतान होने के कारण बड़े ही लाड - नाज़ में बड़ी हुई थी ।जिसके शादी भी 15-16 साल की उम्र में ही कर दी गयी थी 45 साल पहले
 ये बात तो 30 - 35 साल पुरानी  है ,पर मोबाइल तो रघु  जी पर आज भी नही है ।मोबाइल के अपने घाटे है जो रघुजी गिनकर बताते थे ।और अब  मोका मिलने पर पुष्पा  जी के फ़ोन से अपने दोस्तों से बतियाते  रहते थे ।
बड़ी मुश्किलो में बच्चे पद रहे थे बैसे तो रघु जी को ये भी नही पता था की कोन  सा बच्चा किस स्कूल में है पर परीक्षा के दिनों मे पता नही कैसे उन्हें पता चल जाता था और खूब रात को अपनी सुरा लीला  दिखाते जरुर थे वो भी पूरे जोर शोर से ।रात को 2 बजे नाटक देख कर सुबह कैसा exam होता होंगा?

इ न सब जीवन के चक्रों से होकर बच्चे बड़े हो रहे थे ।पर उनके मम्मी ने मनो कसम खा रखी थी। उन्हें सफल करने की ! सब कुछ दाव पर लगा रखा था ।बच्चो पर अनुशासन का डंडा मजबूती से चलता था ।इसी के कारण  सभी बच्चे अपने साधनों के अनुसार पदाई राजकीय बिद्यालय में  कर रहे थे ।कई बार लोगो ने उन्हें अपने लडको को बेतहाशा मारते  देखा । डाँडो से / थपकी से जो मिल जाये सब कुछ मा नो दौरा पड़  गया हो !
दमा भी था उन्हें रात - रात भर खास्ती रहती थी । सो नही पाती ... बच्चे भी जगे रहते !पर उनके पापा जी को होश नही होता था !  इन सबके बीच प्रकाश अड़ियल स्वाभाव के कारण कुछ बिगड़ गया था कई बार स्कूल और मोहल्लो के अवंझित जगहों से पुष्पा  जी बेतहाशा मारती हुई घर लाई थी ।कभी स्कूल गोल तो कभी कंचे का खेल !  पिटाई के कारण  प्रकाश में विद्रोही स्वाभाव के भाव आ गए थे । पीटने पर भी नही मानता ।सब को अपना दुश्मन मानने लगा था ।घर खर्च के लिए , मकान  के किराये के लिए पुष्पा  जी ने स्वेटर सिलने का काम भी बहुत छिपा कर किया ।जिसमे सब बच्चो ने सहयोग किया । 

बड़े होने के सारे फाएदे उड़ाते थे भैया जी !छोटे भाई अगर मैथ मई प्रशन नम्बर 5 पूछते तो फेले चार बताने होते थे ।पहला पूछते तो पहाड़े सुनाने पड़ते थे वो भी खास तोर पर 17 और 19 का पहाडा , तो कभी कटवा पहाड़े !क्युकी अपने रागु जी छोटे भाइयो के  टुसन के भी बिरोधी थे ।
के उनके डर  से ही दोनों छोटे भाइयो ने अपने विषय हो परिवर्तित कर डाले   थे  मैथ तुरंत छोड़ दिया और जीव विज्ञानं पकड़ लिया मूर्खो ने ।  पर प्रकाश जी तो पूरे महोल्ले के बड़े भाई थे।क्योकि उस समय हर जगह लडको के  दो या तीन  समूह होते थे।अब तो एक भी समूह नही होता इन्टरनेट पर ही बाते कर लेते है लड़के ! वो आयु और रिस्तो के अनुसार ,बड़े भाइयो का अलग दल होता था जो अपने को मालिक और छोटो को नौकर मानता था ।और बड़े दल में  सभी के बड़े भाई थे ।तो  हर परीक्षा के बाद बापस लोटते लडको को वो गली के बहार ही खड़े मिलते ! बही  पूरा पेपर पूछते  जलील करते , जो गलत होता तो अच्छा  था, सही सवाल होता हो वो घर बुलाकर उसे करवा कर देखते थे । जिन्दगी नरक हो गयी थी !सारा मूड का गोबर बना देते थे ।  युवा होते लडको का । लगता था मर ही जाये ।कोन  से भाई का रिजल्ट कब आरहा है ? स्कूल में  कब टेस्ट है ? ...क्या टाइम है?... कहा घूम रहे थे ?.... आने मे  इतनी देर क्यों हुई ..? ....बाल  क्यों बड़े है.... ? "चल दिए .......तैल फुलेल लगा कर ?ये उनका रोज़ का कथन था । अच्छे कपडे पहनना मुस्किल हो गया था ।पर भगवन के मार देखो ... खुद 12बी कक्षा में  फ़ैल हो गए तब थोरा प्रकोप कम हुआ ।
                        हिसाब में इतने पक्के थे, की रन आउट कभी हुए नही।क्लीन बोल्ड और कैच आउट में भी कुछ कमी निकाल  ही देते थे  और अगर गेंद में  1 रुपए की हिस्सेदारी भी की तो आउट होने पर 1 रुपए  की गेंद ही काट डाली लो सा ....... अब खेल लो !!बाहर चोरहा पर  खड़े लडको को पकड़ के बोलते अबे तुम बदमाश ओ गए हो क्या ? आओ मुझसे लड़ो !और कुश्ती  करने लगते सबसे तकड़े लड़के से  ।पर बड़ा भाई के दोस्त होने का फायेदा तो प्रकाश जी लेते ही थे हर बार तो जीत जाते ।ये बात कभी सामने न आई की 10थ तक वो बिस्टर पर ही पिशाब  करते थे ।जिन्दगी युही चलती रही ..

भैया
पर बहुत सारी  अच्छाई भी है प्रकाश भाई मै , घर के सारा समान लाना , छोटो को एक ही साएकिल पर स्कूल  छोड़ के आना हर मशीन को ठीक करना । सारी रिश्तेदारी निभाना । बाबाजी दादी जी ताऊ जी ताई जी सब को सँभालते थे ।सबसे बाते करते ।छोटे बाले भाई  तो रिश्तेदारों को देख केर छिप जाते थे ।किसी को जरा से चोट लगने पर अंशु उनकी आँखों में होते ।बहार किसी  की मजाल नही थी की घर के तरफ देख भी ले । गुस्सा तो उनकी नाक पर रहता था ।लड़ाई तो अंडर वर्ल्ड डोन से भी कर सकते थे।और कर भी चुके थे  

                    .अब और भी बिद्रोही हो गए थे अपने आप ही बिना किसे बात के ।अब पुष्प जी के त्याग मेहनत रंग आई और प्रकाश जी I  T  I  में  चयनित हो गए .. घर में दो ही लोग गरम खाना खाते थे  जिनके आने पर स्टोव जलता था प्रकाश जी और खुद रघु जी । बाकि सब परिजन  दलित समाज की तरह थे । कैसा भी खाना खा लेते थे ... सबसे जादा लड़ाई होती अपनी बड़ी बहन से , उसको कुंडल, नए सूट,  बालो के क्लि,प फैशन के सभी साधनो  को सक्त  मनाही  थी भैया जी तरफ से, कई बार खुद पीछा करके देखते थे ....दसियों बार पीटाई  भी कर  चुके थे बड़ी बहन की ! बहन कितनी भी बड़ी हो पिटाई खाती ही है भाई से , लड़ाई हो जाने पर !.सारी दुनिया में !..


पुष्पा  जी को देखो ! अगर वो 15 मिनट भी लेट हो जाये तो घर से बहार रोड पर खड़ी हो जाती थी  ।मोबाईल तो थे नही पर छोटे भाइयो को उसके दोस्तों के घर भेजकर पुछवाती  की प्रकाश के दोस्त कही  घर पर लेट आने को तो नही बोल गए  । बड़ी अजीब बात थी .. पर छोटे भाई विशाल ने रोज़ ही अपनी मम्मी को जूठ बोल देने की आदत ही बना ली , की हां ! आज लेट होंगे ,फिर रोज़- रोज़ परेशान होकर मना ही कर दिया पूछने जाने को ।अब ये जिम्मेदारी सबसे छोटे अमर की थी । जो पहेले तो  एक धंटा , घर से  इधर -उधर  रहता की भाई अपने आप आजाये तो पूछना न पड़े ।भाई के आने पर ही चाय और खाना बनता था गर्म गर्म  ।घर में पैसे हो या नही पर  भैया जी को कभी न नही हुई  टुसन को ।और अब अखवार के कागज से लिफाफे भी बनाये जाने लगे जिसे भैया जी कुछ जुट सच बोल कर आस-पास के दुकानदारो को बेच कर आते बनाने में  भी सबसे जाएदा मेहनत  करते  ।ओर पर पता नही क्यों ? पुष्प जी के साथ भी जाएदा नही बनी ?? शायद  पचपन की जरुरी पिटाई उसके दिल पर लिखी रही ।दिमाग तक नही पहुची ।या कभी सोचा ही नही .
फिर अचानक एक दिन उस की नोकरी लग गयी । सेना के तकनीकी कोर में , घर से मानो काले बादल छटने लगे थे । अब वो राजे हो गए खूब पैसे भेजते रहे रघु  जी भी अब कुछ शांत होते जा रहे थे ।  जब घर में दो कमाने लगते है तो पद सोपान बदलते ही रहते है। कैंटीन से अच्छा ब्रांड सस्ता मिल जाता था ।जब वो आता दिल खोल कर  सब .....पर आज भी जब वो जाता है , आंसू आँखों में छुपाने के लिए कैंटीन से ख़रीदा रे -बेन  का चश्मा  लगा लेता है , पर रुमाल से आँखे पूछनी ही पड़ता  है जो पोल खोल देता है ।
 उसके आदेश मानो सबसे जरुरी हो गए थे ।उसकी बातो पर जान देने को मन करता !मानो घर को रघु जी का छोटा पैक मिल गया था । 
इधर रघु जी भी सेवा निवर्त हो गए थे उससे पहेले भैया जी के शादी अच्छे बड़े घर में कर दी बहू भी सेवा करने बाली  थी ।पर........ 
 बाकि कल ....................













Monday, July 9, 2012

आजाद लड़की -2

                                                                              आजाद लड़की  -2
अब यह  कहानी अलग मोड़ ले लेती है ।क्योकि हमारी हेरोइएन खुशबू  अब ओर भी आज़ाद हो गयी थी पूरी कालोनी में उसकी कहानी सुनी जा चुकी थी ।उसमे भी अब एक अलग ही आत्मविश्वास आ गया था ।कुछ कानाफूसी भी हो रही थी। की बिल्लियों  के झगडे में बंदर रोटी खा रहा है और वो तो बंदर भी तो  बड़ा ताकतवर है पूरा  लंगूर है ।
 हर आजाद नारी को पुरुष बदनाम तो करता ही है ।किसे फर्क पड़ता है इन बातो का ?नारी आजादी बहुत  बड़ी चीज  है 
जैसे - जैसे शिक्षा के साधन बड़े है आजादी भी बड़ी है बच्चो की सोच भी खुली है माँ- बाप की ।आजाद लड़के लडकिया  अब BPO की नोकरी मे मिलने बाली होलीडे में घर नही , किसी टूरिस्ट स्थान पर जाने का प्रोग्राम बनाते है ।अजी  छोड़ो ! अपनी कहानी पर आओ !यही कमी है, इस लेखक में कही  की बात कही जोड़ देता है ।

हा अब खुशबू तो स्वमसिद्ध बन गयी थी कुछ लोगो का अब इंटरेस्ट भी नही रहा ।उस बात के बाद अब कहानी में एक नई कन्या आती है जिसका नाम मनीषा है वो भी कुछ ट्रेनिंग पर आई है । पर बस 3 महीने को ,बिलकुल मेमने जैसी खुबसूरत है ! अब लड़की आई तो बनाने बाले ने उसके लिए एक लड़का भी बनाया होंगा वो लड़का खाली ग्रुप का लम्बू भी तो हो सकता है !कोशिश करना हर लड़के का धरम जो है । जिसका नाम  ऑफिस में सुनील दर्ज था । वो था तो LDC पर बहुत बड़े घर का लड़का था  अरे ! शादी के बाज़ार में सरकारी नोकरी ही तो बिकती है आज भी  ।एक वेतन के बराबर तो पैसा उसके घर से ही आता था ।और जीजा जी यही  पर  बड़े इंजिनियर है फिर डर कहे का ? सो चालू रहते है हर टाइम !
तो भैया , पड़  गए इस घनचक्कर में !कुछ दिन तो अपने आप कोशिश की , बही पुराने तरीके , रस्ते में खड़े होना ,ढूध - कोर्न्फ्लेक्स जैसे  नास्ते के लिए कैंटीन जाना जबकि बहन घर पर आलू के पराठे बना कर रखती थी ।ये बात तो आपको बताने की जरूरत नही है न  ? की मनीषा के लिए ये त्याग हो रहा था ।पर यारो बड़े से बड़ा बदमाश भी प्रेम इजहार से डरता है । वो ही कमी यह भी सामने आरही थी ।
इस काम के लिए कार्यालय की भेंजी टाइप लडकियों से सहायता मांगी गयी ।कुछ हिचकिचाहट के बात सब बड़ी ख़ुशी से सहायता के लिए तेयार हो गयी मानो वो सब इसी बात का इंतजार केर रही थी ।पर अब भी कोई रास्ता नही बना ।
फिर एक खास बहन ने राय  दी की खुशबू  ( बही पुरानी हेरोएन ) की सहायता ली  जाये  ! वो ही अब सब नयी तितलियों की बड़ी अम्मा है !अब मामला फस गया !दोस्तों को पता चला तो स......... मारंगे जरुर गद्दारी पर  !सो चुपचाप  भईयाजी मिलने गए, माता जी से ! ठ्लुया दल के पुराने बॉस को पता चलना ही था ..पर गुस्सा पी  गए। अब हमारी कोई जिम्मेदारी नही है ! पर ये तो आत्महत्या कर  रहा हें  ।" हमसे बोलता तो सीधे बात करवा देते,
facebook.comएक दिन मैस  में बुला या भी था, पर आया ही नही तो हम क्या करे ?  अब खुशबू ने क्या सहयता की? ये तो पता न चला। पर कुछ हुआ भी नही< और मनीषा को पता भी चल गया  और वो मोर्निंग वाक पर जाने लगी ... पर हमारे शेर को खुद कुछ करना नही था तो होता क्या ? धीरे_ धीरे टाइम निकल रहा था उसे जाना था ।तो फिर एक दिन एक बहन जी को उसने अपनी दोस्ती का पैगाम ले कर भेजा ।अब लगता है की मामला इस लिए उलझ रहा है की सुनील भैया ने अपनी होने वाली दोस्त के लिए बहुत  कीमती तोहफा  खरीद लिया था और उस पर मनीषा का नाम लिखा था  तो किसे ओर  को दे भी नही सकते थे । इस लिए अब मामला मोहब्बत का नही तोहफे के अंतिम सस्कार का बना हुआ था।नही तो मनीषा नाम की अब किस लड़की को खोजे ?प्रेम के तोहफे को कहा  फेक दे ? कब तक छुपा कर रखे ? घर बालो से  इस  बात को ? अब उलझे मामले में दो अलग घटनाये हो गयी जिससे कहानी  ही बदलनी पड  गयी  मनीषा का टाइम पूरा हो गया और चुपचाप वो दिल तोडकर निकल गयी . पर उसकी face book प्रोफाइल में दो नये नोजवान अधिकारी जरुर जुड़ गए थे जिनके साथ कभी कभी वो देखि जाती थी ।खबरी लाल ने बताया की जाने की रात को वो खुशबू से भ्रमज्ञान ले रही थी ।जिसमे युवा कन्याओ को दुनिया दारी की विशेस शिक्षा दी गयी ।जिसमे केरियर के लिए  कम कीमत में ज्यादा फायेदा लेने का गुप्त ज्ञान भी था ।और बहुत  कुछ.......... पता भी न चला की  क्या क्या समझाया  था ।  पर अचानक अपनी खुशबू अपना नो - डिमांड प्रपत्र लेकर कार्यालय में देखी गयी ? खास खबरी ने बताया की अपने अधिकारी को गन्दी गन्दी गालिया दे रही थी " मरेंगा ..मोटा ..... बंदर...कुत्ता कीड़े पड़ेंगे उसमे ...और पता नही क्या क्या पर क्यों ? टाइम से पहले बो जा रही है ? उसका मानसिक संतुलन भी बिगड़ गया लगता है । गुमसुम   !क्या खोया क्या पाया ? मे  उलझी हुई ।अब कोई उससे बात भी नही करता।। न तो खुदा मिला न बिसाले यार  ....... शायद आजादी की किमत ..........बहुत जायदा  चुकाई थी उसने ........
. अब तो उसकी यादे ही बाकि रही है ..........पर लडकिया अब आजाद है ....या जाएदा गुलाम हो गयी है इन शोषण यंत्रो की जो सदियों से नारियो को मुर्ख बना कर अपने उल्लू सीधे करते आ रहे है .........................


Thursday, July 5, 2012

कावड मेला .

कावड मेला .
             दोस्तों ये वो उत्सव है वो उत्तर भारत में बहुत जोर -शोर से मनाया जाता है ।N H -58 सड़क पर
दिल्ही से हरिद्वारसे गोमुख  लगभग 160KM तक भोले बम भोले ही रहेते हे !आस--पास के राज्यों से  लगभग 1.75 करोड़ भोले ( कावड लाने बाले ) हरिद्वार आकर गंगा  जल उठाते है।कुछ उत्सहाई तो गंगोत्री ,गोमुख ,यमनोत्री तक से गंगा  जल उठाते है ।और मुजफरनगर के शिव चौक से होकर  .मेरठ  के औगरनाथ कालिपल्तन के मन्दिर  बागपत के पूरा महादेव तक  ये यात्रा पहुचती है। इसके बाद अपने बोले गए मंदिर में भी जल अर्पित किया जाता है । और कावड में लाये गए .
काँवर एक विशेष प्रकार की बहँगी जिसमें बाँस के टुकड़े के दोनों सिरों पर पिटारियाँ बँधी रहती हैं और जिसमें सामान रखकर काँवाँरथी तीर्थ-यात्रा करने निकलते हैं।
 ,या अन्य साधनों से जल को पूर्वं निर्धरित शिवलिंग पर अर्पित करते है ।ये परम्परा पुर्वएतिहासिक बताई जाती है । पर असली प्रसिद्धी 90 के दसक में मि ली अब बडती जा रही है ।
सावन के महीने के आरभ से शुरू होकर  शिवरात्रि तक ये भोलेमय महोल बना रहता है सारे  रास्ते में तेज़ आवाज में बम बम भोले के भजन, जो हिट हिंदी हरियाणवी और  पंजाबी गानों की तर्ज़ पर होते है ।जिस पर खूब नाच चलता है बाकी  बम बम भोले !!!सच में बड़ा कठिन कार्य है इतनी गर्मी , कभी तेज़ बारिश .हवा में नमी ,तेज़ धुप , नंगे पैर 100-250 km तक की दुरी बोल बम 15 दिन में अपने पेरो  से नाप लेते  है ।
कावारिया 

बम बम भोले 

पूरा महादेव बागपत मेरठ 


भोले !
दूर दूर तक भगवा रंग दिखाई देता है ।खास बात तो ये है की हर इंसान को" भोले; कहकर ही पुकारा जाता है बस यही पहचान रहती है बाकी सब बम भोले !बैसे अब तो भोली भी आनेलगी है ।दिमाग से सब बते हट कर बस भोले ही भोले रहेते है ।
इस यात्रा में अनेक रोचक प्रसंग होते है ,जैसे इस में खाने -पीने और रुकने  की कही  कोई कमी नही होती ,राजस्थान ,मध्य प्रदेश, दिल्ही, उत्तेर प्रदेस MP जैसे  अनेको राज्यों से लोग सेवा के सिविर लगते है ।जहा हर बस्तु निशुल्क मिलती है ।नहाने के नल, नाचने को DJ !खाने को आलू पेरी से लेकर , डोसा इडली तक सम्पूर्ण भारत के खाने और नास्ते !
नियम बड़े कड़े होते है ।घर भी  में खाना छोक के नही बनता ।मास मच्छी लहसुन प्याज बंद !खड़ी  कावर  रख नही सकते !बबूल ,गुलर ,कीकर के पैड के नीचे से नही निकलना। हर मंदिर मे माथा टेकना ,कपडे सात्विक हो !पर कुछ भक्त भोले का प्रसाद लेकर मस्त रहते है ,
मेडिकल की सुविधा बहुत अच्छी रहती है ।पर अधिकतर भोले कीमत देकर ही सेवा लेते है !अपनी भक्ति बेचते नही । प्राय :बहुत छोटे बच्चे ,बिकलाग ,अन्य  धर्म के लोगो को भी इस सेवा को करते देखा जाता है ।
 आजकल मोटर साइकिल  स्कूटर  साइकिल आदि से भी यही सेवा होने लगी है जो दो दिन पहेले आरम्भ होते है इसमे जल लाने से जायदा नीलकंठ ऋषिकेश तक आना जाना ही रहेता है इसमे अधिकतर नवयुबक होते है जो बाज़ार और निजी कार्यलय बंद हो जाने के कारन खाली होते है अंतिम एक सप्ताह  में ।
एक होती है डाक कावर , इसमे अदिकतर हरियाना ,राजस्थान  और  बहारी देल्ही के बालीबाल ,होकी ,फूटबाल के  टीम खिलाडी  होते है ये अपनी टीम बर्दी में होते है और फिक्स टाइम में 24 घंटे से 72 घंटे या भोले की इच्छा  तक  जल पहुचाने का बेनर लगा कर  भाग कर  , रास्ता पूरा करते है ।साथ में एक-2 मोटर साइकिल बाले  होते  है जो TATA 407
या छोटे ट्रक में बैठे लोगो को मदत करता है ,MIKE ! म्यूजिक !हट जायो भोले !का तेज़ शोर ..........
कुछ लोग लेटकर भी दूरी पूरी करते है ।साथ में परिवार भी होते है ।
कुछ लोगो की जेब कट जाती है ।मोबाइल खो जाते है  .......वो क्या करे ? ये तो होता ही है ।
बड़ी बड़ी सुंदर भोले की  झाकिया चलती है जिनका अपना मजा होता है छबि देखते बनती है जिनके साथ 100 तक लोग होते है !इन की  भी प्रतियोगिता होती  है इनाम होते हे ।
अंगोछे /बनियान /टोपी/कावर /डंडे / त्रिशूल//इनका बाज़ार लगभग 1000 करोड़ का हो जाता है ।
रास्ते में लगने बाले मौसमी ढाबो / होटलों की कमाई अदिकतर गरीब तबको को मिलती है ।10 दिन तक सेवा शिविर  में फल, मिठाई, दूध ,आलू ,पूरी,डोसा ,चोवमिन , जलेबी चाये आदि आदि का मज़ा आस--पास रहने बाले लोग भी लेते है।
लोग भोलो के सेवा करने को अपना भाग्य समजते है ।पर कुछ लोग बिना किसी भावना के आते है ।
और बदनामी पुरे उत्सव की होती है ।
मोटर साइकिल-डाक कावर  जैसे साधनों के कारण दुर्घटना होती  है जबकि रेल की भीड़ के कारण छत पर बेठ क्र यात्रा करने में खतरा बना रहेता है  जो दुखद है ।
facebook.comनवुवक अगर इसकी गरिमा बनाये रखे तो ये मेला और भी सुहावना बन जाये !

में भी अपने मित्र राजकुमार के साथ 16/07/12 को हरिद्वार को चल दिया सुबह ही इतनी भागमभाग हो रही थी की बस।....पर पूरे मार्ग पर इतनी उर्जा थी की सरिर के रोंगटे खड़े हो गए ।पसीने में भीगे . तेज़ गर्मी में भागते युवा ,........कभी 100 मीटर भी न चल पाने वाले लोग इनकी बुराई करते है ।ये 1 .75 करोड़ लोग अगर डंडे से भी पाक पर हमला केर दे तो 2 दिन में धुल में मिला दे ये ही वो लोग है जो देश की सीमा पर जान देते है 1आँखों में आंसू आ गये ! भक्ति - शक्ति -हिम्मत -उर्जा देखकर ।जय भोले की !
दुनिया में युवाओ के इतने बड़े समागम को देख कर सरकार  भी याद आ गयी की इतने लोग .......बेरोजगार है इतनी उर्जा ,जो देश के निर्माण में लगती तो भारत आज इंडिया बन जाता ।पर क्या करे ?
हां तो हम 11 बजे पहुचे सती  मंदिर कनखल में , यह माँ पार्वती ने अपने पिता द्रस्क के हवन कुण्ड  में कूद केर इसलिए जान दे दे थी बहा भोले नाथ को सम्मान नही दिया गया था ?फिर भोले के क्रोध के आगे कोन  बचता ? सब हवन पूजा नाथ ने मिटटी में मिला दे द्र्स्क का घमण्ड धुल में मिला दिया ?

साईं बाबा सिर्डी 

द्रस्क  मन्दिर में गंगा जल का अर्पण , सूर्य देव को .

स्नान करने उचित घाट 
विशाल प्रतिमा भोले नाथ माँ के शव को उठा कर क्रोध मुद्रा में !
यहा  बहुत  लम्बी  लाइन थी । सावन का सोमबार भी था ना, तो लोकल लोग भी आये हुए थे ।2 घंटे में अंदर गए ।पता नही क्यों अंदर पुजारी ने मेरे बहुत  देर तक टिका लगाया ।पर कुछ पुजारी टाइप लोग धर्म का धंधा कर रहे थे । शायद ये भी जरुरी है पब्लिक भी पैसे खर्च कर  हल्का महसूस करती है। पापं  से मुक्ति का अहसास !

सब मंदिरों में माथा टिका कर हम चले अपने घर के लिए ! पर हमारा भोला राजकुमार भी सच्चा - पक्का हिन्दू  था ।मोटर साइकिल मोड़  दी  पिरान कलियर को  और धुप बहुत  तेज़ थी बाते और जोश ख़तम हो रहा था !पर सबीर सहाब की जियारत करे बिना हम कहा बापस आते ? पहले बड़े मामू जान की दरगह !पर पहुचे ।बहा भी पैसे की मांग धर्म के ठेकेदार कर रहे थे ।दोनों धर्म में ये बात कॉमन है वो है ठेकेदार ! जिन्हें बस पैसा ही दीखता है ।फिर सबीर सहाब के दर पर पहुचे ! मुस्लिम भाई भी भोला - भोला कह  रहे थे अच्छा लगा ।कोई दीवार सी  गिरती लगी ! अंदर बहुत सारे  भोले थे ।लाल - हरे रंग को एक साथ देख कर अपना भारत याद आया ।काश ........अगर ये रंग हर जगह साथ हो जाये तो।......
बाहर कोई सज्जन जकात में बिरयानी बितरण कर  रहे थे । गरीबो की लम्बी लाइन यह भी लगी थी। बहा से  चलकर हम 3 बजे घर पहुचे सार  रास्ते खाली थे ।पर निशान बाकि थे .........भोलो के कदमो के