Monday, September 3, 2012

महगाई की अर्थनीति !


महगाई की अर्थनीति  !

महगाई की अर्थनीति !


महगाई की अर्थनीति !
जनता महगाई से करहा रही है | हम सरकारी नोकर भी बहुत परेशान है कल सुबह जब में १३ रुपे लेकर छोटी डबल रोटी लेने गया तो उसने कहा की” बाबु जी १५ रुपे दो” ! अब ये १५ की है ! मैंने जिन्दगी में पहली बार पूछा
की ये कितने बजन में आती है | दुकानदार बोला 300gm मुझे फिर अचरज हुआ | ३०० gm पर २ रुपे बड गए है तो …….1000gm पर लगभग ६.६० पैसे बड गए क्यों भाई क्या कारन है ? हा ! ये सही है की , सरकारी गेहू बरसात में सड़ गया हर साल की तरह पर खुले बाज़ार में नही आया | ६ महीनों में ही आलू आधिक उत्पादन के बाद

सडको पर पड़ा सड गया | पर उठाने बाले नही थे | आज २५/- का दाम है क्यों ?
पियाज का भी अब टाइम आने बाला है सर्दी के साथ ही बाज़ार से पियाज गायब होना ही है फिर खायो ४०-५०/- की दर से ! | भण्डारण की जगह न होने पर भी गेहू की सरकारी खरीद होती है | जबकि भण्डारण करने के लिए गोदाम बनाना इतना महेगा नही है |भारत का सारा गेहू भी भण्डारण के लिये कम होंगा अगर भंडार न हो पाने के कारन ख़राब गेहू की कीमत का २०% भी इस काम में लगा दिया जाता |या भण्डारण का काम निजी लोगो को दे दिया जाता |
हम पर आपातकाल के लिए गेहू भी होता और जमाखोर भी खरीद कर जमा न करते |पर अब तो जमाखोर ही सरकारी है |
पर अब लगता है की सारी सरकारी योजनाये ही पैसा खाने के लिए बनती है ? मानव की पहली जरुरत है भोज़न अब सरकारी दलालों की गीध द्रस्थी उस पर भी पढ़ गयी है | पहले तो सरकार के दलाल बाज़ार को नियत्रित करते थे अब वो सरकार को ही चला रहे है |उनकी अपनी सरकारे चलती है राजेय
और केंद्र स्तर पर | उनकी हिसाब से नीतिया बनती है |
सरकार” को कमीसन दिया जाता था अब सरकार सारा अपने पास रखती है दलालों /गुंडों को कमीसन/ बेतन ही मिलता है |
प्रधानमत्री जी ने कहा है की महगाई का कारन भी विपक्ष ही है ……..अब हम हसे या रोये ? “बर्बादे गुलिस्ता करने को बस एक ही उल्लू काफी था ! हर साख पर उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्ता क्या होंगा ?”
अगर ……..काश ये हो पाता ….

१ .खाना / भोज़न अगर , इसमें सब्जी /गेहू /इधन/मसाले सस्ते हो तो भारत के 7० करोर
लोगो पर जादा पैसा होंगा बाकि के कपडे / मकान /यात्रा / टीवी/फ्रिज/कार / स्कूटर /मोटर साइकिल /कोस्मटिक /इलेक्ट्रोनिक्स सामान /मोबिल /बीमा /बैंक निजी बिजनिस/मनोरंजन /बच्चो की सिक्षा / स्वास्थ्य जैसे चीजो के लिए जादा पैसा होंगा बाकि के लोगो पर अब भी जाएदा ही है , जिन पर अगर वो महीने में ५००/- भी अगर जायदा खर्च करेंगा तो 3५,०००/- करोर का धन अर्थ
के पहिये को चलने के लिए बाज़ार में होंगा ? मंदी दूर ….

२.सोना /चांदी/कॉस्मेटिक्स/वेदिशी कपडे / कार /फ़ूड चेन /बड़े होटल /AC /महेंगे टीवी LCD /LED /टूर ओपेरटर
पर कर लगाकर महंगे किये जा सकते है |

३. आयकर / बिक्रीकर / सेवाकर अन्ये सभी करो की दर कम , हो पर दायरा बढाया जाये |अभी भी लाखो – करोरो लोग है जो अंधी कमाई करते है पर कर नही देते | बसूली के तरीके सही किये जाये ताकि कर बसूली में लगे , सरकारी कर्मचारी को कोई घूस लेकर/ देकर छूट न दे पाए , खजाना को ही भरे !अभी कर को जमा करने और उसको सरकारी खजाने तक पहुचने में ही इतना खर्च होता है की सुद्ध आमदनी बहुत कम होती है |ये तो वित् मंत्री जी ने ३/०९/१२ को माना ही है की कॉर्पोरेट टैक्स जो ३०% तक है उसमे केवल २४% तक की बसूली हो पाती है |
४,कृषि पर असली कायशील योजनाये बने ! जिससे वास्तव में परिवेर्तन आये, कागजो में नही | खाली , बंजर भूमि विकास के लिये ऋण मिले और विरोजगारो को ,इसे समूह बना कर २०- २५ सालो के लिये, दे जाये | उनको
जरुरी कृषि सामान कम दामो में मिले ताकि कृसी उत्पाद बड़े , महेगाई कम हो | नए भूमि विकास करने जरुरी है | सिचाई एव पीने के पानी के लिए नदियों को जोडकर उपलब्द पानी का संपूरण वेगानिक उपयोग जरुरी है |अभी भी कृषि क्षेत्र में बहुत कुछ होना बाकि है | अनुसन्धान / प्रोत्सहान /छूट /गोदाम/उत्पादों का सरक्षण / बाज़ार तक पहुच /उचित दाम ………की आवश्यकता है |अगर बर्तमान की उत्पाद दर को ही सही तरीके से ९०% तक बाज़ार मिल जाये| सड़ने , गलने ,और दलालों से बचा ले तो तो सारे के सारे उत्पाद २५% तक सस्ते हो जायेंगे |

५.उर्जा एवं विधुत क्षेत्र में बड़े सुधार होने बाकि है ……. चोरी रोको .वितरण सुधारो , समय बद्ध उत्पादन निति बने | सौर उर्जा पर भी धयान दे | पट्रोल में एथेनोल मिला कर , गन्ना किसान /मिल /उत्भोक्ता को फायेदा होंगा | सरकार की वेदेशी मुद्रा भी बचेंगी !पट्रोल के जुडी सब चीज़े सस्ती होंगी ! पर बड़ी तेल कम्पनी होने नही देंगी !अरे भाइयो ! अभी कोन सा सुद्ध तेल हमारी गाड़िया पीती है ? २५ – ५५ % तक तो कम तोली / साल्वेंट / मिटटी तेल होता ही है फिर १० % तक एथेनोल मिलाने से कोन सी तेल कंपनी बंद हो रही है ?हा थोरा बहुत घाटा जरुर होंगा बड़े लोगो को |
६. भारत में हजारो सरकारी दफ्तर है जो कुछ काम नही करते कागजो का पेट भरने के अलावा , उन सबको जोडकर -घटा दिया जाये तो ….उनको जाने बालीधन राशी / बेतन / पेंसन /और न जाने क्या क्या बच सकता है | उदाहरण -
(१) केंद्र – राज्ये स्तर की समितिया जिनमे पार्टी चमचो को सरकारी धन से मज़े दिलवाए जाते है |काम जीरो……
(२) जाच आयोगों से क्या फायदा हो रहा है देश को ?
(३) कितने हॉस्पिटल /संसथाओ ने टैक्स से बचने को अनुसधान केंद्र का नाम दिया है उनकी जाच का कोई साधन – नियम है या नही ?
(४ ) सरकारी घाटे बाले सब उपक्रमों को बंद कर दिया जाये या निजी बाजारों में खुली नीलामी हो |
(५) जितने भी सरकारी अनुसन्धान केंद्रे है अगर कोई काम नही होता तो बंद हो |………………………..आदि |
(६) कर से बचने के फंडे ख़तम हो |
(७) NGO के धंदे जो बड़े लोगो के पैसा, नाम कमाने के सौक बन गए है बंद हो !
(८) सरकार के नाम पर चलने बाले काफिले जिनका खर्च करोरो में होता है |

अगर भारत सरकार से पूछा जाये तो उनको भी नही पता होंगा की कितने दफ्तर काम करते
है सरकारी पैसे पर ?और उनकी जिम्मेदारी क्या है ? सबकी समयबद्ध जिम्मेदारी तय हो , न करने पर सजा
हो ……
७.भारत की समस्त जमीन का रिकॉर्ड की जाच हो ,बेनामी संपत्ति जप्त की जाये , हर नयी खरीद पर , धन का स्रोत्र भी बताया जाये ?यही प्रक्रिया सोना चांदी हिरा धातुयो पर भी हो
८ काला धन बाज़ार में आये उसकी नयी योजना लागु करे जाये |सक्ख्ती से काले धन पर कर्येबाही हो |
९. आयकर के रूप में प्राप्त धन में से अदिकतर सरकार का अपना ही पैसा होता हैजी सरकारी कर्मचारी और सस्थायो से मिलता है | निजी लोगो और सस्थायो को कर से बचने के लाखो साधन हमारे कानून में लिखे है कानून की समीक्षा हो !
१०. एस देश में लाखो लोग है जिन्होंने कभी खेत देखे नही है पर अनाज – सब्जियों वः अन्य उत्पादों की दलाली से ही करोरपति बने है ? खानधानी पेशा है ये पसीना किसान का बहता है गाडियों में दलाल घूमते है |
११. फसलो के दामो की “सट्टेबाजी” कितने लोग जानते है ? एक -२ मंडियों में मैंने खुद देखा की आने वाले महीनों में किस चीज़ का दाम क्या होंगा ? कैसे तय होता है ? भारत की बड़ी मंडियों में , कुछ लोग एक मकान में चारो तरफ दिवार के साथ इस तरह बैठते है मानो कोई नवाब मुजरा सुन रहे हो | फिर महिना और दाम बोला जाता है बोलिया लगती है | किसे बोली पर सहमति होती है फिर उस पर बस्तु की मात्र तय कर ली
जाती है | अब है असली खेल , निर्धारित तारीख पर दम के अन्तर का भूगतन होता हैबोली लगाने बाले को |अब क्रिकेट के खेल की सट्टेबाजी की तरह ही खिलाडी को भी पैसा देना होता है यानि वास्तव में जमाखोर ही दाम उतने पर ले जाते है जितने की बोली लगी थी |
हमें लगता है की दाम किसान के बजह से बड़ते है | और हां ! आप याद करे कभी कभी अचानक २-३ दिन तक दाम कम भी होते है सट्टेबाजी के कारन |

१२ . एक बार ही सही सबको अपनी संपत्ति घोषित करने का आदेश हो , ताकि अघोषित संपत्ति जप्त हो ,
बाकि कल ………………..
                                

No comments:

Post a Comment