लिव इन नही! नही !
भारत एक विशेष सामाजिक स्थिति बाला देश है | जहा एक तरफ तो एक पीढ़ी ,परिवार ,समाज ,धर्म अभी तक पुरातनपंथी है बही दसरी और नई जनरेशन नोकरी रोजगार शिक्षा के लिए बहुत बड़ी संख्या मे घर शहर से दूर है और पूर्ण आजादी से जीवन जी रहे है |जिस कारण शादी सस्था और सामाजिक सम्बन्ध बदल रहे है | जिस कारण विपरीत सेक्स के युवा घर परिवार और आर्थिक और मनोविज्ञानिक कारणों से आसरा तलाश रहे है जिस कारण लिव-इन रिलेशनशिप जैसी नई धारणाये सामने आई है और अभी तक शादी से पहले सेक्स को केवल बड़े शहरों तक ही सीमित करके देखा जाता है, लेकिन परंपराओं के गढ़ छोटे शहरों में भी अब यह आम बात बनती जा रही है.| सेक्स अब पहले की तरह विबाह के बाद किया जाने वाला पवित्र अनुष्ठान नहीं रह गया | यह सब पिछले 10-15 सालों में बदल गया है.'|'कॉलेज की तो क्या अब तो स्कूल के बच्चों में भी ये संबंध आम होने लगे है . चाहे वो माध्यमिक स्कूल हों या सेकेंडरी, ब्वॉयफ्रेंड्स और गर्लफ्रेंड्स होना आम बात है. वे जब मिलते हैं तो सिर्फ हाथ नहीं मिलाते, वे एक दूसरे को गले लगाते हैं | एकांत मे मिलने पर वर्जनाये नही रहेती | आज का युवा प्यार के इस उन्मुक्त तरीके का आनंद ले रहा है.जिसमे बहुत सारी समस्यों का हल भी है |और नई समस्याए भी है | जहां सार्थक संबंध पिछड़ रहे हैं, वहीं थोड़े समय के लिए बनाए गए रिश्ते ज्यादा पनप रहे हैं.' इस सम्बन्ध मे रिश्तेदारी परिवार योजना की चिंता और हर चीज की मल्कियत का झगड़ा करने जैसी आम समस्या भी नहीं होती है। इस रिलेशनशिप में कपल के सामाने एक दूसरे की जिम्मेदारियों को बांटने जैसी मजबूरियां भी नहीं होती है। .
- लिव-इन रिलेशनशिप में रहने जोडियों में धोखा, बेवफाई और व्यभिचार की आशंका कम होती है।पर डर जायदा होता है |
पैसों के मामले में ये स्वतंत्र होते हैं। इसमें अपने पार्टनर के साथ अपनी कमाई को देने या जोड़ने जैसी बाध्यता नहीं होती है। अपने पैसों का इस्तेमाल पूरी आजादी होता है ।. लिव इन रिलेशनशिप को जोड़े के बीच सामंजस्य को परखने के तौर पर भी देखा जा सकता है। ताकि सही जोड़ी होने पर शादी सफल हो कि क्या आप साथ रह कर उनसे तालमेल बिठा पा रहे हैं नहीं। कुछ आधुनिक लोग लंबे समय तक एक ही जोड़ीदार के साथ ऊब जाते हैं। और रोज़ कुछ नया खोजते है | लिव इन रिलेशनशिप ऐसे लोगों के लिए ही है। अगर उन्हें लगे कि वह अब ऊब रहें हैं तो पार्टर बदलने के लिए स्वतंत्र हैं।शादी के उलट इस रिलेशनशिप को तोड़ना ज्यादा आसान होता है। अलग होने से पहले किसी भी तरह की कानूनी पचड़े और उनकी खानापूर्ति नहीं करनी होती है। अलग होने आपको बस सामान लेकर जाना है और भावनात्मक पहलू से निपटना होता है। इसमे में आप खुद नियम बनाने के लिए स्वतंत्र होते हैं। इसमें समाज के द्वारा तय किए गए मानक नहीं होते हैं। यह आप पर निर्भर करता है कि इसे कैसे आगे बढ़ाते हैं।.
- दोनों पार्टनर अपनी जिम्मेदारियां बिना किसी दबाव के निभाते हैं।
लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे कपल को शायद ही कभी एक दूसरे के लिए त्याग करना पड़ता है। इस रिलेशनशिप में आप सिर्फ अपने बारे में सोचने के लिए स्वतंत्र होते हैं। आपको अपने पार्टनर के अनुसार अपने स्वभाव में बदलाव करने की मजबूरी भी नहीं होती है। लिव इन रिलेशनशिप को आप बड़ी आसानी से खत्म कर सकते हैं। यही कारण है कि इसे काफी लोकप्रियता मिल रही है। जब भी आपको लगे कि आप अपने पार्टनर के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं, तो मामला ख़त्म !
- इस रिश्ते में रहते-रहते आप विवाह के बंधन में भी बंध सकते हैं।अगर कोई पक्ष राज़ी हो |या दुसरे साथी की साथ एक ही समय मे लिव इन कर सकते है
छोटे शहरों में भी अब लिव-इन रिलेशशिप्स की तादाद बढ़ रही है. प्रेम विवहा पर घरवालों की नापसंदगी से परेशान आज का युवा अपने प्यार की कुर्बानी देने को तैयार नहीं है, जिसके चलते लिव-इन रिलेशशिप्स के प्रति उनका रुझान बढ़ता जा रहा है.|बिना शादी के साथ मिल जाता है |हालांकि दुनिया के सारे देशों में लिव इन रिलेशनशिप को स्वीकृति नहीं मिली है और इसके लिए कानून बनाए जा रहे हैं। बिना शादी किए दो लोगों का एक साथ रहना पूरब के देशों में अभी भी वजिर्त माना जाता है। वहीं पश्चिम के ज्यादातर देशों में इसको स्वीकृत किया गया है और वहां के युवाओं नेकाफी समय पूर्व से ये अपनाया है । जिसके दुष्परिनाम भी सामने है जैसे बिन बाप के बच्चे , अल्प आयु मे गर्भधारण , आत्महत्या , पागलपन आदि |
- उच्चतम न्यायालय ने हॉल ही मे कहा कि लिव इन रिलेशनशिप मे कानून बनाए जाने की जरूरत है क्योंकि इस तरह के संबंध टूटने पर महिलाओं को भुगतना पड़ता है। इसने कहा कि बहरहाल हम इन तथ्यों से मुंह नहीं मोड़ सकते कि इस तरह के संबंधों में असमानता बनी रहती है और इस तरह के संबंध टूटने पर महिला को कष्ट उठाना पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले मे उलटे चेतावनी दी कि पहली पत्नी और बच्चे उस महिला के खिलाफ मुआवजे का दावा ठोंक सकते हैं,जिसके साथ पुरुष लिव इन सम्बन्ध मे था क्यूँकि वो उनकी वजह से पति और पिता के प्यार से वे वंचित रहे। लेकिन साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा इस तरह के मामलों में अभी तक कोई कानून नहीं है और लिव-इन रिलेशनशिप के ऐसे मामलों में पीड़ित महिला को भी न्याय मिले, इस बारे में नए सिरे से कानून बनाने पर सरकार को सोचना होगा। अब ये सरकार को सोचना होगा की बदलते समाज में बढ़ते लिव-इन रिलेशनशिप के मामलों के मद्दे नजर नए सिरे से कानून बनाये, जिससे किसी भी पक्ष के प्रति अन्याय न हो।लिव इन रिलेशनशिप आज के समय मे तेज़ी से बढ़ रहा है। एक समय था जब ऐसे संबंधों पर लोग खुलकर बात करना पसंद नहीं करते थे। लेकिन आज लोग खुलकर लिव इन रिलेशन शिप में रहते हैं और इस बात को जगजाहिर भी करते हैं। लिव इन रिलेशनशिप के जहां कुछ फायदे हैं वही इसके कुछ नुकसान भी हैं। यानी जैसे हर सिक्के के नकारात्मक और सकारात्मक पहलू होते हैं, इस रिश्तें में भी कुछ ऐसा ही है। आइए जानें लिव इन रिलेशन के पहलूओं को।परन्तु इस रिश्तो मे ,ये इश्क नहीं आसां , इतना तो समझ लीजिये एक आग का दरिया है , और डूब के जाना है इसमे बंधन में न बंधने की आजादी तो होती है, पर लाइफ में पूरी तरह से एन्जॉय नहीं कर पाते, क्योंकि अविश्वास की भावना पनपने का डर बना रहता है।
- कहीं आपका पार्टनर आपको छोड़ न दे इस तरह का डर मन में हमेशा बना रहता है, जिससे तनाव की स्थितियां भी उत्पन्न हो जाती है।
- एक दूसरे के वर्क स्टाइल या कल्चर को ना समझ पाने के कारण भी दिक्कतें आने लगती हैं।
- लिव इन रिलेशनशिप में आप परिवार की खुशी का मजा नहीं ले सकते।
- परिबार समाज के उत्सव , समारोह आदि से दूरी बन जाती है |
- आप शुरूआत में प्यार और भावनात्मक रूप से तो जुड़ते है पर शारीरिक संबंधो से ऊब हो जाने के बाद लड़ाई झगडे बहुत बड़ते है और फूलो के कांटे दर्द देने लगते है | जिससे बोरियत होने लगती है।
- थी हमारी क़िस्मत के विसाले यार होता
अगर और जीते रहते , यही इंतज़ार होता उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष की पीठ ने कहा कि वित्तीय और घरेलू इंतजाम, परस्पर जिम्मेदारी का निर्वाह, यौन संबंध, बच्चे को जन्म देना उनकी बेधता और उनकी परवरिश करना, लोगों से घुलना-मिलना तथा संबंधित लोगों की नीयत और व्यवहार कुछ ऐसे मापदंड हैं जिनके आधार पर संबंधों के स्वरूप के बारे में जानने के लिए विचार किया जा सकता है।अत भारत जैसे सामाजिक निर्भरता बाले देश मे एस प्रकार के सम्बन्ध एक सीमा तक ही प्रचालन मे आ सकते है | सर्वलोकपिर्ये और स्वीक्रत नही हो सकते |और अभी कितने जोड़े होंगे ?जो सामने आकर बोल सके ? यहा पर अधिकतम आवादी गावो मे बस्ती है जहा के सामाजिक कानून बड़े कड़े होते है |वहा तो अभी तक प्रेम विबाह तक को मान्यता नही मिल पाई है |
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