Monday, January 5, 2015

आदित्य ..

आदित्य ,!
तुम जीवन दाई हो
स्त्री - पुरुष के एक समान
 इस परम ताप से जीवन  
 सुखद, प्रेम , स्नेह ,सजीव  बना
तूम दिनकर  !
रजनी तम को करते विदा
अनंत काल से ,नित्य ही
प्राणों में स्पंदन हो  
तुम्हारा आगमन की अदितीय आहट !
प्रभा भरे सब  हरियाली में
ओ प्रभाकर ! ऊष्मीय स्नेह के वर्त   .
दिन के नरेश! तुम्हारी सत्ता
धरती माँ को आभा देती है |
पितृ देव  के समान
दिव्य प्रकाश से ,अभिभूत
पुरुष  ! तुम पूरक मेरे जीवन के ,
कर दो सबके  मन को  सूरज
हर नारी खिले चांदनी सी
दिवा कर दो हर चन्द्र को
न जाने क्यों डर  रही हु ,
कालिमा और अंधकार से
हर आँखों में  काली डोरी है
बना लो मुझ को अपनी उषा !
या ज्योति! बन में जल जाऊ
अब  किरण बनू ,रश्मि बन जाऊ
कलुष  मन प्रकाश बनाऊ
नर नारी हो अब  एक समान
तुम सा अमृत मै  बन जाऊ ,
भास्कर बनू मै  तुम सी
इस वर्ष तो दर्पण बन जाऊ !



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