बास्तव मे भारत की वर्तमान राजनीती बड़े उधोग मे बदल गयी है ! जिसका लक्ष्य असीम धन और शक्ति है और हर दल अपनी कम्पनी को अलग ब्रांड नेम से चला रहा है |
कोई समाजवाद के नाम राजनीती शुरू करके अब पर परिवार वाद चला रहा है तो कोई दलित उत्थान के नारे को बेच कर स्मारक बना, पैसा कम रहे है| तो कोई मन्दिर - मस्जिद पकड कर अभी तक बेठा है |तो कोई बंश वाद के सहारे सत्तासीन है |हर राज्य से लेकर केंद्र मे ये लोकतंत्र के सत्ताहड़प राजा अपनी कंपनी चला रहे है पर लक्ष्य सबका एक ही है वो है येन -केन- प्रकरण सत्ता पर कब्ज़ा करना असीम धन- सत्ता सुख के सागर मे डुबकी लगाना | इनके परिवार तो क्या इनके दूर -दूर के रिश्तेदार भी इनकी बाटी रेवड़ीया खाते है | पर दोष कही न कही इनके जूठे नारों के सुनहरे जाल मे फस कर , तडपते लोगो का है| जो इन्हे सिर आँखों पर बिठाते है |और कभी धर्म तो कभी जाति तो कभी भाषा के विज्ञापन से भाबुक और मजबूर होकर इनको फिर मजबूत बनाते है
कोई समाजवाद के नाम राजनीती शुरू करके अब पर परिवार वाद चला रहा है तो कोई दलित उत्थान के नारे को बेच कर स्मारक बना, पैसा कम रहे है| तो कोई मन्दिर - मस्जिद पकड कर अभी तक बेठा है |तो कोई बंश वाद के सहारे सत्तासीन है |हर राज्य से लेकर केंद्र मे ये लोकतंत्र के सत्ताहड़प राजा अपनी कंपनी चला रहे है पर लक्ष्य सबका एक ही है वो है येन -केन- प्रकरण सत्ता पर कब्ज़ा करना असीम धन- सत्ता सुख के सागर मे डुबकी लगाना | इनके परिवार तो क्या इनके दूर -दूर के रिश्तेदार भी इनकी बाटी रेवड़ीया खाते है | पर दोष कही न कही इनके जूठे नारों के सुनहरे जाल मे फस कर , तडपते लोगो का है| जो इन्हे सिर आँखों पर बिठाते है |और कभी धर्म तो कभी जाति तो कभी भाषा के विज्ञापन से भाबुक और मजबूर होकर इनको फिर मजबूत बनाते है
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