Thursday, August 8, 2013

जज्बात !

मै अपनी तक़दीर पर कभी , रोया या नही रोया 
पर मेरे जज्बातों पर आसमा टूट के रोया |
मै क्या क्या बताऊ मे क्या क्या गिनाऊ ,
क्या नही पाया मैंने क्या नही खोया |
मेरी हर रात कटी है सो वीमारो के जैसे 
दर्द से जुदा होकर मै एक पल नही सोया |
मेरे जीने पे  जो जालिम , मातम मनाता रहा ,
मेरे मरने  पर वो जी भर के क्यों रोया |
मेरे दिल के जख्म फूलो से निखरते रहे   
मैंने कभी इनको मरहम से नही  धोया |
बडो की ये बड़ी बाते ,हमे देती रही है ये  नसीहत
अब काटो  बही जो  बीज वो तुमने था जो बोया |

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