मै अपनी तक़दीर पर कभी , रोया या नही रोया
पर मेरे जज्बातों पर आसमा टूट के रोया |
मै क्या क्या बताऊ मे क्या क्या गिनाऊ ,
क्या नही पाया मैंने क्या नही खोया |
मेरी हर रात कटी है सो वीमारो के जैसे
दर्द से जुदा होकर मै एक पल नही सोया |
मेरे जीने पे जो जालिम , मातम मनाता रहा ,
मेरे मरने पर वो जी भर के क्यों रोया |
मेरे दिल के जख्म फूलो से निखरते रहे
मैंने कभी इनको मरहम से नही धोया |
बडो की ये बड़ी बाते ,हमे देती रही है ये नसीहत
अब काटो बही जो बीज वो तुमने था जो बोया |
No comments:
Post a Comment