मेरी दीदी नीरू .........
बहेने तो छोटी माँ के समान होती है , माँ के काम मे हाथ बटाना रसोई और पढाई दोनों को संभल लेना , माँ को कहा ? कभी छोले - भटूरे , इडली -डोसा ,आलू छोले की चाट , लिट्टी - चोखा , केक , शाही - पनीर ,नमकीन के परांठे , रस्गूले , तमाम गुजराती पंजाबी भोजन बनाने मे रूचि थी ? वो तो ही दीदी थी जो हमे ये सब कभी भी खाने को मिल जाता था |
दुपहर की चाये बस हम दोनों भाई इतना बोलते थे की " बना ले " और वो बना कर ले आती , कभी कभी समस्या होती जब वो सो रही होती .........हम बाल खीच कर परेशान करते बना ले ,
बस वो जोर से बोलती मम्मी .....!...........!..................
मम्मी डंडा लेकर हमारे पीछे , पर चाय बन जाती थी|
घर के समान का नक्शा हर सप्ताह बदलना उसकी आदत थी सब बहेने की होती है
था | घर की आंतरिक सज्जा मे अपना कौशल दिखाने की |
शादी के बाद अपना बुटिक भी खोला , अच्छा चल निकला उनकी सरल आदत के कारण , पर बच्चो के चलते बंद भी कर दिया |बिना मुनाफा सोचे !
पा - माँ ने सदा दीदी को जाएदा प्यार किया हम तीनो भाइयो से ,\सबसे बड़ी जो है हमसे .....
आज तो खुल कर बोलते भी है ये बात !
आज भी पा-माँ कही भी हो रोज़ ३० मिनिट बात फ़ोन पर दीदी से ही होती है बाकि हम लोग खुद उनसे बात करते है ,,,,,
याद आता है! उनकी शादी मे टेंट लगाने के लिए पड़ोसियों से हुए जगड़े मे ,
मर -पीट के दौरान ,जब अचानक दीदी भागती आई और एक लम्बा डंडा पूरी ताकत से उनके सर पर दे मारा ..........
हम लड़ाई भूल कर हसने लगे !
हर रक्षा बंदन पर भैया से उनका किसी न किसी बात झगड़ा होता और हम मनाते थे दोनों को , आज तक यही होता है |भोपाल शादी को उनके १६- १७ साल हो गए है |
पर जब वो भोपाल से नही आ पाती तो फ़ोन के बाद फौजी अफसर भाई सहित सबकी आँखे गीली होती देखी है मैंने !
अब तो लगता है हम सब के बीच का बन्धन है वो .......परिवार का फेविकोल का जोड़ !.......
पता नही , मम्मी ने बताया या अपने आप ,अपने परिवार को उन्होंने जोड़ा है सुसराल मे बड़ी भू के रूप मे इज्जत कमाई ,नही तो हमारे पापा जी का दबंग स्वभाव भोपाल शहर तक , हर रिश्तेदार को मालूम था |
सदा आगे .रही है वो लोगो के साथ मे ................
प्यार मे , एस बार भी अकेली बच्चो के साथ भोपाल से रूडकी आ गयी . अपनी लक्ष्मी बाई !
दोनों भाइयो की शादी का काम , हो या किसी का कोई दुःख सब जगह ,,,,होती थी वो !भाइयो की ख़ुशी के लिए ज़माने से लड़ी और जीती , दोनों के प्रेम विवहा का एक मात्र सहारा वो ही तो थी ......
भाइयो के लिए पेडुलम बनी रहेती पा - माँ और हमारे बीच ,
आज भी इतनी उष्मा भरा रिश्ता है की अपने को भूल कर जीती है वो हमारे लिए ....
जब भी भोपाल जायो पेट मे और दिल मे स्थान नही रहेता | किसी और के लिए ......
आज भी जब पा- माँ से कुछ कहेना हो तो ...... माध्यम दीदी ही है .......उनको वो कभी नही कुछ कहेते !उनकी मान भी लेते है ............. अब की बार राखी , तिलक सब आया है पोस्ट से ....
दिल भर आता है |उसकी याद मे .......
रक्षा बन्धन की ढेरो मुबारक बाद .......
बहेने तो छोटी माँ के समान होती है , माँ के काम मे हाथ बटाना रसोई और पढाई दोनों को संभल लेना , माँ को कहा ? कभी छोले - भटूरे , इडली -डोसा ,आलू छोले की चाट , लिट्टी - चोखा , केक , शाही - पनीर ,नमकीन के परांठे , रस्गूले , तमाम गुजराती पंजाबी भोजन बनाने मे रूचि थी ? वो तो ही दीदी थी जो हमे ये सब कभी भी खाने को मिल जाता था |
दुपहर की चाये बस हम दोनों भाई इतना बोलते थे की " बना ले " और वो बना कर ले आती , कभी कभी समस्या होती जब वो सो रही होती .........हम बाल खीच कर परेशान करते बना ले ,
बस वो जोर से बोलती मम्मी .....!...........!..................
मम्मी डंडा लेकर हमारे पीछे , पर चाय बन जाती थी|
घर के समान का नक्शा हर सप्ताह बदलना उसकी आदत थी सब बहेने की होती है
था | घर की आंतरिक सज्जा मे अपना कौशल दिखाने की |
शादी के बाद अपना बुटिक भी खोला , अच्छा चल निकला उनकी सरल आदत के कारण , पर बच्चो के चलते बंद भी कर दिया |बिना मुनाफा सोचे !
पा - माँ ने सदा दीदी को जाएदा प्यार किया हम तीनो भाइयो से ,\सबसे बड़ी जो है हमसे .....
आज तो खुल कर बोलते भी है ये बात !
आज भी पा-माँ कही भी हो रोज़ ३० मिनिट बात फ़ोन पर दीदी से ही होती है बाकि हम लोग खुद उनसे बात करते है ,,,,,
याद आता है! उनकी शादी मे टेंट लगाने के लिए पड़ोसियों से हुए जगड़े मे ,
मर -पीट के दौरान ,जब अचानक दीदी भागती आई और एक लम्बा डंडा पूरी ताकत से उनके सर पर दे मारा ..........
हम लड़ाई भूल कर हसने लगे !
हर रक्षा बंदन पर भैया से उनका किसी न किसी बात झगड़ा होता और हम मनाते थे दोनों को , आज तक यही होता है |भोपाल शादी को उनके १६- १७ साल हो गए है |
पर जब वो भोपाल से नही आ पाती तो फ़ोन के बाद फौजी अफसर भाई सहित सबकी आँखे गीली होती देखी है मैंने !
अब तो लगता है हम सब के बीच का बन्धन है वो .......परिवार का फेविकोल का जोड़ !.......
पता नही , मम्मी ने बताया या अपने आप ,अपने परिवार को उन्होंने जोड़ा है सुसराल मे बड़ी भू के रूप मे इज्जत कमाई ,नही तो हमारे पापा जी का दबंग स्वभाव भोपाल शहर तक , हर रिश्तेदार को मालूम था |
सदा आगे .रही है वो लोगो के साथ मे ................
प्यार मे , एस बार भी अकेली बच्चो के साथ भोपाल से रूडकी आ गयी . अपनी लक्ष्मी बाई !
दोनों भाइयो की शादी का काम , हो या किसी का कोई दुःख सब जगह ,,,,होती थी वो !भाइयो की ख़ुशी के लिए ज़माने से लड़ी और जीती , दोनों के प्रेम विवहा का एक मात्र सहारा वो ही तो थी ......
भाइयो के लिए पेडुलम बनी रहेती पा - माँ और हमारे बीच ,
आज भी इतनी उष्मा भरा रिश्ता है की अपने को भूल कर जीती है वो हमारे लिए ....
जब भी भोपाल जायो पेट मे और दिल मे स्थान नही रहेता | किसी और के लिए ......
आज भी जब पा- माँ से कुछ कहेना हो तो ...... माध्यम दीदी ही है .......उनको वो कभी नही कुछ कहेते !उनकी मान भी लेते है ............. अब की बार राखी , तिलक सब आया है पोस्ट से ....
दिल भर आता है |उसकी याद मे .......
रक्षा बन्धन की ढेरो मुबारक बाद .......
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