मेरा प्रश्न यह है की जो औरते आज पुरुष पद पर है अर्थात उनके समान धन , बल , शोहरत प्राप्त कर चुकी है कभी किसी ने उनके जीवन का चित्रण किया गया है की वो पुरुष से कितना अलग अपना पुरुषत्व प्रदर्शित करती है , उनका मानक विचलन नही मद्द्य विचलन ही होता है ... उनके योन खुलेपन या पुरुष शोषण के तरीके कुछ अलग होते है क्या पुरुष से ??नोकरी , रोजगार , हर स्थान पर अपनी छदम आजादी के लिए देहिक समझोते करती नारी , आम बात है , कोन और कितने पुरुष उसे मजबूर कर रहे है , देह को वस्तु की तरह उपयोग करने की आजादी को किस प्रकार से तर्कसंगत बनाया जा सकता है .....
Tuesday, September 30, 2014
Monday, September 29, 2014
बाढ़ में बहा अलगाव वाद का नारा .. जम्मू काश्मीर
बाढ़ में बहा अलगाव वाद का नारा ..
जम्मू काश्मीर की यही नियति है आजादी के बाद से बनने बाली सारी सरकारे
राज्य हित में नही अपितु स्वं हित में कुर्सी लाभ लेने में ही लगी रही है
, इस बार की बाढ़ ने सारी पोल खोल दी है |
राज्य प्रशासन अपने लोगो और अपने को बचाने में ही लगी रह गयी निवासी राहत
और बचाव के लिए पूरी तरह केंद सरकार पर निर्भर नजर आये ,
और ये आपदा देश हित में एक सन्देश दे गयी , सम्पूर्ण देश ने एक होकर
कश्मीर के लोगो का साथ दिया और आपदा से लड़ाई लड़ी और दिल जीते !स्थानीय
नागरिको ने भी खुले दिल से प्रेम स्वीकार किया और अलगाववादी विचार धारा
इस बाढ़ के पानी के साथ मानो बह गयी |
अब राज्य और केंद सरकार पर भरपूर मोका है की , देश प्रेम और अखंडता की
जड़े पुनर्वास, विकास ,रोजगार और राहत की जमी में मजबूती से लगा दी जाये ,
ताकि कोई विदेशी ताकत फिर एक फूलो की घाटी में तेजाब की दुकान न खोल सके |देश एक भाव से तरक्की करे , शांत रहे !आतकवाद समाप्त हो |
!
अमन अन्गिरिशी ..
अमन अन्गिरिशी
जम्मू काश्मीर की यही नियति है आजादी के बाद से बनने बाली सारी सरकारे
राज्य हित में नही अपितु स्वं हित में कुर्सी लाभ लेने में ही लगी रही है
, इस बार की बाढ़ ने सारी पोल खोल दी है |
राज्य प्रशासन अपने लोगो और अपने को बचाने में ही लगी रह गयी निवासी राहत
और बचाव के लिए पूरी तरह केंद सरकार पर निर्भर नजर आये ,
और ये आपदा देश हित में एक सन्देश दे गयी , सम्पूर्ण देश ने एक होकर
कश्मीर के लोगो का साथ दिया और आपदा से लड़ाई लड़ी और दिल जीते !स्थानीय
नागरिको ने भी खुले दिल से प्रेम स्वीकार किया और अलगाववादी विचार धारा
इस बाढ़ के पानी के साथ मानो बह गयी |
अब राज्य और केंद सरकार पर भरपूर मोका है की , देश प्रेम और अखंडता की
जड़े पुनर्वास, विकास ,रोजगार और राहत की जमी में मजबूती से लगा दी जाये ,
ताकि कोई विदेशी ताकत फिर एक फूलो की घाटी में तेजाब की दुकान न खोल सके |देश एक भाव से तरक्की करे , शांत रहे !आतकवाद समाप्त हो |
!
अमन अन्गिरिशी ..
अमन अन्गिरिशी
Sunday, July 20, 2014
माता -पिता की सेवा
मानव संस्कृति हमें इस बात की प्रेरणा देती है कि हमें अपने माता-पिता की अच्छाईओं को ग्रहण करना चाहिये तथा उनके बताये सदमार्ग पर चलना चाहिये । कोई भी माता-पिता अपनी संतान केलिए कोई भी गलत रास्ता नही दिखाती है । माता -पिता की सेवा से बड़ा कोई तीर्थ स्थान नही है न ही कोई अन्य धर्म हैं । जब हम अपने माता-पिता की सेवा करेगें तो हमारे अन्दर अपने आप धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार जागृत होगें । हम घर-परिवार व समाज में सम्मान जनक स्थान प्राप्त करेगें । जो संतान माता -पता के उचित बचनों जो जीवन को सार्थक बनाने बाले है का पालन नहीं करते है वह अपना भबिष्य ख़राब तो करते है पारिवारिक संकट उठाते है एबं सामाजिक बहिष्कार सहते है। इसलिए माता -पिता ,के उपदेश -वचनो को विना विचार किये ही स्वीकार कर लेना चाहिए।
हमारी संस्कृति में माता-पिता का ऋण कोई संतान अदा नही कर पाती है लेकिन प्रत्येक संतान यही प्रयास करता है कि माता -पिता को हम अच्छी सेवा करें उन्हे सम्मान से जीने केलिए ऐसी व्यवस्था बनायें । जब तक संतान स्वंय माता-पिता नही बनती है जब तक वह माता-पिता के दायित्य को नही समझ पाते हे । इसलिए आप देंखते व सुनते होगें कि प्रत्येक कन्या भगवान के समक्ष यहीं प्रार्थना करती हैं उपवास करती हे कि उसे अच्छा बर (पति-स्वामी ) मिलें । जब कन्या परिवारिक जीवन में प्रवेश करती है तो वह भगवान से दूसरी इच्छा मात्र संतान प्राप्त करने की या कहें कि मॉ होने केलिए प्रार्थना करती है । प्रकृति या ईश्वर का बिधान है कि कोई भी व्यक्ति कितना ही गौरवशाली, स्वाभिमानी, उच्चपद पर पदासीन अधिकारी, राजा-महाराजा, नेता -अभिनेता, मजदूर-किसान सेना का जबान अपराधी होगा वह यदि मानव है या इंसानियत रखता है तो वह संतान से बिमुख नही हो पाता हे । संतान का प्यार व दुलार की तुलना किसी भी प्यार से नही की जा सकती है । संतान का मोह संसार का सबसे बड़ा मोह बताया गया है और बास्तविक रूप से होता ही है । जिस व्यक्ति को अपनी से स्नेह – प्यार नही है हम उसे सामाजिक प्राणी नही कह सकते है । प्रत्येक माता-पिता संतान केलिए कितने ही कष्ट उठाने को तैयार होते है । प्रत्येक दंपत्ति अपनी संतान केलिए दिन-रात उसके पालन पोषण में लगे रहते है ।
संतान के पालन – पोषण में माता का सर्वाधिक कार्य होता है , मॉ संतान के प्रत्येक सुख-दुःख का ध्यान रखती है प्रत्येक गल्तियों को माफ करती है। पिता को परिवार को संचालित करने केलिए आर्थिक बजट की व्यवस्था तथा भविष्य की व्यवस्था केलिए अपने कर्तव्य कार्य मजूदरी मेहनत करना होती है । या हम इस प्रकार से कहें कि कोई परिवार बिना पति-पत्नी के नही चलता है. परिवार की परिभाषा ही पति-पत्नी से बनी है । इसलिए पत्नी का दायित्य है कि वह घर-गृहस्थी का रख-रखाव, परिवारिक मर्यादायें, समाजिक सम्मान, नारी की लज्जा, इन सभी बातों को समझते हुये बाहन की तरह होती हैं. परिवार का मुखिया या पति तो बाहन चलाने बाला या आर्थिक बोझ उठाने बाला होता है । इसलिए प्रत्येक माता-पिता का अपनी संतान को गर्भ धारण से ष्क्षिित करने तक या आत्म निर्भर बनाने तक क्या क्या नही करता हैं यह संतान सोच नही पाती है जब संतान वयस्क हो जाती है और स्वयं परिवारिक बंधन में बंध जाती है तब वह बास्तविक स्वरूप को समझ पाती है । यदि संतान अपने होष सम्भालने के साथ ही माता-पिता के आर्दष पर चलने का प्रयास करें ,अच्छाईओं को ग्रहण करें, सदविचारों को गहण करें, धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन करें, संत महापुरूषों के बताये मार्ग को अपनाये का प्रयास करें तो ऐसे बालक-बालिकायें या संतान समाज में ही नही राष्ट्र के उच्च षिखर तक पहुॅच जाती हैं । हमें माता -पिता के अस्वस्थ्य होने या बृध्द अवस्था होने किस तरह की सेवा करना चाहिये । हर माता-पिता संतान की खुषी केलिए अन्तिम समय तक प्रयास करते रहते है । संतान का दायित्य बनता है कि वह जब तक माता-पिता स्वस्थ्य है उन्हे स्वतंत्र रूप से कार्य करने देना चाहिये उनके कार्यो में बाधा नही करना चायिहे उनके बताये रास्ता पर ही चलना चाहिये । लेकिन जब माता-पिता को किसी भी प्रकार से दुःख हो , कष्ट हो , कोई अचानक संकट आ जावें या प्रकृतिक शारीरिक बीमारी हो तो उनकी सेवा में कोई कसर नही छोड़नी चाहिये ।
माता जी हो या पिता जी उन्हे स्नेह व प्यार दें । उनके पास समय देकर उनकी सेवा करें । भोजन, पानी समय पर दें , दवा आदि की समय पर व्यवस्था करें तथा समय से दवा दें । स्वयं पुत्र को सेवा तो करना चाहिये साथ ही पुत्रबधू को सेवा में पूरी तरह से हाथ बटॉना चाहियें । हमारा तो यदि उद्देष्य है पुत्र से अधिक संस्कारित परिवारों में पुत्रबधू ही अपने सास-ससुर, माता-पिता की सेवा करती है ऐसी ही महिलायें दीर्धआयू व सौभाग्यवती रहती है । जो महिलायें अपने सास-ससुर की सेवा नही करती है या जो पुत्र-पुत्रियॉ अपने माता-पिता के साथ अन्याय या अत्याचार करती है वह हमेषा संकट व कष्ट उठाती है ।
आज आवश्यकता है, प्रत्येक परिवारों में मॉ-बाप की सेवा करने का । क्योकि बदलते समय में माता-पिता सर्वाधिक परेशानी व संकटों से गुजर रहे है । जो संतान माता-पिता की सेवा नही करते है उसका कारण मंदबुध्दि, विवेक की कमी , स्वयं के विवेक से कार्य न करते हुये चरित्रहीन पत्नी के बहकावें में आकर ही अपने माता-पिता को ठुकराते हैं । जब माता-पिता की आत्मा को कष्ट होगा , उन्हे संकट होगा तो हमें कैसें सुखी हो सकते है ? हमें बार बार नही हजार बार इस बात पर ध्यान देना होगा कि यदि हमारी माता जी पिता जी ने हमें बचपन से आज तक लाखों संकट व परेशानियों से मुक्ति दिलाकर इस योग्य बनाया हम उनका ऋण कभी अदा नही कर सकते है ।
जिन परिवारों में सामाजिक संस्कारों की कमी, बदले की भावना , दहेज लालच, अपने पराये की भावनायें, संपत्ति लालच की भावनायें अपना स्थान बना लेतीं वह परिवार बिघटन, निर्धनता , संकटों से घिर जाते हैं । ऐसे ही परिवार की लड़कियॉ जब दूसरे परिवार या ससुराल में जाती है तो जिन संस्कारों में उनका पालन पोषण होता है उसी के कारण वह अपने पति को अपने कामुक जादू के मध्य अपने वश में करने के बाद जैसा वह चाहती है परिवार में बैसा ही होता है । हम उसे दूसरे रूप में जोरू का गुलाम भी संबोधित करते है । आज दूसरे परिवार से जो लड़की आई और वह पुत्र के लिए सब कुछ हो जाती है जो माता-पिता उसे संसार में आने के पूर्व से उसकी प्रत्येक सुरक्षा, संकट से मुक्ति दिलाता रहा वह कुछ नही रह जाता है । जब परिवार में इस प्रकार की महिलायें अपना बर्चस्य स्थापित करती है तो वह परिवार नरक की तरह हो जाता है । ऐसे ही परिवारों में माता-पिता को घर से बाहर कर दिया जाता है या वे स्वयं घर छोड़कर बृध्दाश्रम या अनाथ आश्रम में आश्रय लेकर अपना बुढ़ापा बिताने केलिए मजबूर हो जाते हे । लेकिन हम इस बात को जबानी में भूल जाते है कि आज हम जो अपने माता – पिता के साथ कर रहे है और उन्हे संकट व कष्ट दे रहे हैं आने बाले समय में हमारी संतान भी हमे उसी रास्ता पर जाने केलिए मजबूर करेगीं । आज आवश्यकता है कि प्रत्येक परिवार में मान-सम्मान बने, माता-पिता का सम्मान हो, उनकी सेवा की जावें । माता-पिता को तीर्थ स्थानों पर घुमाने ले जावें या वह जाने योग्य है तो उन्हे तीर्थ स्थान भेजें । रहने केलिए स्वस्थ्य मकान व पहनने केलिए स्वच्छ कपड़े दिये जावें । उनके भोजन की सर्व प्रथम व्यवस्था की जावें । बृध्द माता-पिता को धार्मिक पुस्तके, ग्रन्थ, बेद पुराण या जो वह साहित्य पढ़ सकें उन्हे उपलव्ध्य करायें । समय समय पर उनके स्वास्थ्य की देंख-रेंख कराते रहे । माता-पिता का आर्षीवाद यदि हो सकें संभव हो तो प्रतिदिन प्राप्त करने का प्रयास करें । उनके आशीर्वाद से दीर्धायू होती है और मन को परम सुख प्राप्त होता हैं । संसार के जितने भी महापुरुष हुए उन्होंने माता -पिता को ही पूज्यनीय ,माना। सभी जाति -धर्म व पंथो में भी माँ व पिता को उच्च स्थान दिया गया है।
वृद्ध माता-पिता के मन की शांति केलिए उनका मार्ग दर्शन लेते रहे , कोई भी घर-परिवार व समाज में कार्य हो तो उन्हे सम्मान देकर उनके मार्ग दर्शन में ही कार्य सम्पन्न करायें जावे । उनके अनुभव व उनका मार्ग दर्षन हमेषा परोपकारी, कुशलता परिवार की सुख समृध्दि से भरा होगा । घर व परिवार की खुशियों में परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपने अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिये और अपने से बड़ों का सम्मान करना चाहिये । व्यक्ति धन व बल से बड़ा हो सकता है लेकिन समाज से बड़ा नही हो सकता है । इसलिए सामाजिक सम्मान को ध्यान में रख कर ही परिवारिक व सामाजिक कार्य करना चाहिये।
मात-पिता,आचार्य को, सदा करो सम्मान।
इनके बिन मिलता नहीं, जग का कोई ज्ञान।।
Friday, June 20, 2014
काला धन ! सफेद जूठ !
सपनो के देश में सभी मुगेरी लाल जी के लिए खुश खबरी!
” काले – सफेद . लाल पीले धन की पनाहगाह स्विस बैंकों में भारतीयों की जमा दौलत में 40 फीसद का इजाफा हुआ है।
यह धन बढ़कर दो अरब स्विस फ्रैंक यानी करीब 14 हजार करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया है। स्विटजरलैंड के केंद्रीय बैंक स्विस नेशनल बैंक (एसएनबी) ने २०/०६ /१४ को अपने बैंकों में जमा धन पर आंकड़े जारी किए। ताजा आंकड़ों के अनुसार, 2012 में स्विस बैंकों में भारतीयों का करीब नौ हजार करोड़ रुपये जमा था। 2013 के दौरान इसमें बड़ा इजाफा हुआ। जबकी दुनिया के अन्य देशों से इन बैंकों में जमा होने वाली कुल दौलत में रिकॉर्ड गिरावट आई है ।
क्या ये पैसा बापस आ सकता है ……………………… नही कभी नही !( लिख लो मेरी बात एक रुपया भी बापस नही आयेंगा !)
हमारे देश की गरीबी दूर हो चुकी है , सारे गरीब चोर होते है | ये अमीरों ने सिद्ध कर ही दिया है !
यह धन बढ़कर दो अरब स्विस फ्रैंक यानी करीब 14 हजार करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया है। स्विटजरलैंड के केंद्रीय बैंक स्विस नेशनल बैंक (एसएनबी) ने २०/०६ /१४ को अपने बैंकों में जमा धन पर आंकड़े जारी किए। ताजा आंकड़ों के अनुसार, 2012 में स्विस बैंकों में भारतीयों का करीब नौ हजार करोड़ रुपये जमा था। 2013 के दौरान इसमें बड़ा इजाफा हुआ। जबकी दुनिया के अन्य देशों से इन बैंकों में जमा होने वाली कुल दौलत में रिकॉर्ड गिरावट आई है ।
क्या ये पैसा बापस आ सकता है ……………………… नही कभी नही !( लिख लो मेरी बात एक रुपया भी बापस नही आयेंगा !)
हमारे देश की गरीबी दूर हो चुकी है , सारे गरीब चोर होते है | ये अमीरों ने सिद्ध कर ही दिया है !
और जिनका पैसा है वो खतरा देखते ही अपने मोबाईल के एक क्लीक से सारा पैसा दुनिया के किसी भी कोने में खजाने की तरह गाड सकते है !
इतने पैसे जमा है कुछ तो गारंटी मिली होंगी न , उसी गारंटी का किराया दे रहे है वो , दुनिया का सबसे अच्छे दिमाग बालो को लगाया होंगा अपने पैसे को बचाने को , नही तो यह के लोगो को तो बैंक में पैसा जमा करवाना भी नही आता !
पर ये गरीब क्यों टेक्स देते है ? यहा के अमीर टेक्स देने लायक अमीर नही होते | इसलिए पैसा विदेश में रखना पड़ता है !
अमीर लोगो की कमाई को बापस लेने के सपने देखते है | ताकि वो भी अमिर हो सके मुफ्त में !
अगर पैसे को बाहर जाने से , पैदा होने से , रोका जा सके तो भी बहुत है !५६ इंच के सीने वाली सरकार अगले चुनाव में लोलीपोप दे सकती है !नही तो जनता उनको छोले – कुलचे खिलवा देंगी पुराने पापा जी के ढाबे के तरह !
इतना पैसा आयेंगा की ………. हर आदमी बिना काम करे बारेन वाफेत बन जायेंगा !मगर दिल बहलाने को ये ख्याल अच्छा है |सरकार बनाने के लिए ये गाना अच्छा है !
अगर सरकार सारे बेनामी पैसे को आतकवादी धन घोषित करने की अपने गाव के प्रधान जी यु न ओ ( UNO ) से गुहार करे , दुनिया के दरोगा अमेरिका से अनुरोध करे , और इन सारे काले धन रखने बाले बेंको के देशो से अपनी सुसराल जैसी रिश्तेदारी ख़त्म करने की बंदर भभकी दे ! तो शायद काली कमाई बाले जमाई को सोना, जमीन और दुसरे देश देखने होंगे !खजाने गाड़ने के लिए |पर काली कमाई कभी बंद नही होंगी ये भी पक्का है, पर लिखना मत !
पर ये गरीब क्यों टेक्स देते है ? यहा के अमीर टेक्स देने लायक अमीर नही होते | इसलिए पैसा विदेश में रखना पड़ता है !
अमीर लोगो की कमाई को बापस लेने के सपने देखते है | ताकि वो भी अमिर हो सके मुफ्त में !
अगर पैसे को बाहर जाने से , पैदा होने से , रोका जा सके तो भी बहुत है !५६ इंच के सीने वाली सरकार अगले चुनाव में लोलीपोप दे सकती है !नही तो जनता उनको छोले – कुलचे खिलवा देंगी पुराने पापा जी के ढाबे के तरह !
इतना पैसा आयेंगा की ………. हर आदमी बिना काम करे बारेन वाफेत बन जायेंगा !मगर दिल बहलाने को ये ख्याल अच्छा है |सरकार बनाने के लिए ये गाना अच्छा है !
अगर सरकार सारे बेनामी पैसे को आतकवादी धन घोषित करने की अपने गाव के प्रधान जी यु न ओ ( UNO ) से गुहार करे , दुनिया के दरोगा अमेरिका से अनुरोध करे , और इन सारे काले धन रखने बाले बेंको के देशो से अपनी सुसराल जैसी रिश्तेदारी ख़त्म करने की बंदर भभकी दे ! तो शायद काली कमाई बाले जमाई को सोना, जमीन और दुसरे देश देखने होंगे !खजाने गाड़ने के लिए |पर काली कमाई कभी बंद नही होंगी ये भी पक्का है, पर लिखना मत !
Monday, June 2, 2014
आम आदमी और उसकी महान शक्ति ...
इस समय देश बदलाव की करवट ले रहा है। यह देश के भविष्य के लिए यह बहुत अनुकूल संकेत है। इस समय देश में दो बातें दिखाई दे रही हैं, पहली- पहले कोई कुछ भी करता था तो आम आदमी कहता था कि कुछ भी करने का कोई फायदा नहीं है। कुछ भी करने से कोई लाभ नहीं है। इस देश में कुछ नहीं हो सकता। अब दो बातें साफ उभरकर आई हैं। चाहे उसके पीछे अन्ना जी का आंदोलन कह लीजिए, चाहे बाबा रामदेव के आंदोलन की छाया या देश की जागरूकता कह लीजिए अथवा अनेक सामाजिक संस्थाओं के प्रयत्न। कुछ भी हो , दो बातें निकलकर आई हैं, एक तो इस देश में कुछ परिवर्तन होना चाहिए, अभी जो चल रहा है ऐसे नहीं चलना चाहिए। दूसरा- पहले कोई कितने भी आंदोलन कर ले, लोग कहते थे कि कितना भी कर लो, होना-जाना कुछ नहीं है। सब ऐसे ही चलेगा। अब दूसरी बात यह प्रकट हुई है कि आम व्यक्ति यह कहने लगा है कि अब कुछ होकर रहेगा। ये दो बातें इस देश के भविष्य के लिए बहुत अच्छे संकेत के रूप में उभरी हैं। परिवर्तन किसी संगठन से नहीं होता, किसी संगठनात्मक प्रक्रिया से नहीं होता, किसी संस्थागत व्यवस्था से नहीं होता। आम आदमी की आकांक्षा से परिवर्तन होता है।
हिमालय से कन्याकुमारी तक सारा देश यह चाहता है कि अब कुछ हो। अब कुछ होकर रहेगा। यह दो बातें अब देश में व्याप्त हो चुकी हैं।भगवान कृष्ण ने भी जब घोषणा की 'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत' उस समय वह सामान्य ग्वाले के पुत्र के रूप में थे और कंस जैसी महाशक्ति को उन्होंने पछाड़ा था। गोकुल से भी किसी सहायक को लेकर नहीं गए थे। कहने का अर्थ यह है कि परिवर्तन जब होता है तो वह साधनों से नहीं होता। युद्ध साधनों से नहीं जीते जाते, युद्ध संकल्प से जीते जाते हैं। शस्त्र सहायक हो सकते हैं, लेकिन जीत संकल्प की होती है। मनुष्य जब भीतर से संकल्प घोषित करता है तो उसकी वाणी में भगवान बोला करता है 'सात्विक शक्ति की वाणी में भगवान बोला करते हैं'। संकल्प जब आता है तो जीवन की सोई हुई सारी शक्तियां, सारी ऊर्जाएं व्यक्त होती हैं। एक सामान्य सा व्यक्ति भी असामान्य शक्तियां अपने अंदर प्रकट कर लेता है। कहने का अर्थ यह है कि यदि इस देश का आम नागरिक संकल्प ले ले कि अब हम भ्रष्टाचार सहन नहीं करेंगे, अब तक जो रीति-नीति-गति चलती आई है, अब इसे स्वीकार नहीं करेंगे, न सहन करेंगे, अब हम इसको बदलकर रहेंगे। यह तब होगा जब सामान्य सा काम करने वाला मजदूर और ऊंचे आसन पर बैठने वाला अधिकारी, इन सबकी शक्तियां एक हो जाएंगी। सात्विक शक्तियां जब तक इस देश में कमजोर रहेंगी तब तक असात्विक शक्तियों का बोलबाला रहेगा। असात्विक शक्तियां षड्यंत्रपूर्वक यह चाहती हैं कि सात्विक शक्तियां किसी प्रकार से एक न हों। भगवान राम ने यही किया। ज्ञानी महाराज जनक और धर्म-धुरंधर दशरथ आपस में लड़े जा रहे थे। नैसर्गिक घटना करने वाले विश्वामित्र और ब्रह्मा के मानस पुत्र महाराज वशिष्ठ में आपस में बोलचाल बंद थी। जब अच्छे लोगों की बोलचाल बंद होगी तो असात्विक शक्तियों का ही राज्य होगा। भगवान राम ने पहला काम यह किया कि विवाह को माध्यम बनाया, गुरु बनाए। असात्विक शक्तियों को डिगा दिया और सारी सात्विक शक्तियों को मिला दिया। सभी सात्विक शक्तियों का आशीर्वाद लिया, सहयोग नहीं लिया। सात्विक शक्तियों का नैतिक आशीर्वाद ही काफी होता है। ये सात्विक शक्तियां युद्ध क्षेत्र में हमारे साथ खड़ी होंगी, ऐसा सोचना भी नहीं चाहिए और यह संभव भी नहीं है। लेकिन सात्विक शक्तियों का नैतिक समर्थन ही बहुत बड़ा संबल होता है व्यक्ति का। राम के साथ यही था। सारे देश की शक्तियां चाहती थीं कि राम जीतें और रावण पराजित हो। लेकिन कोई लड़ने नहीं गया। देवताओं ने भी यह देख लिया था कि रावण की लगभग सारी सेना मारी जा चुकी थी और रावण अकेला रह गया था। भगवान देवताओं की रक्षा के लिए ही तो युद्ध कर रहे थे, फिर भी देवता नहीं लड़े। अब मुझे लगता है कि इस देश में राम और कृष्ण दोबारा से प्रकट होने जा रहे हैं सात्विक शक्ति के रूप में, धार्मिक शक्ति के रूप में, राष्ट्रीय शक्ति के रूप में, संकल्प की शक्ति के रूप में, परिवर्तन की शक्ति के रूप में। हो सकता है हाथ में सुदर्शन चक्र न हो, हो सकता है कोई तीर कमान न हो। लेकिन कोई न कोई संकल्प का शस्त्र इस देश की आम जनता के हाथ में होगा और वर्तमान में चलने वाली रीति-नीति, शासन और व्यवस्था धराशायी होगी और एक अच्छा व स्वस्थ, स्वच्छ और सुसम्पन्न, भारत की आत्मा को पोषित और रक्षित करने वाला, ऐसा कोई व्यवस्था पक्ष प्रकट होगा बदलाव का, जिससे भारत आनंद और उन्नयन के शिखर की ओर बढ़ेगा।
जब जब परिवर्तन के दौर चले, जैसे इस समय चल रहा है। लगता है परिवर्तन से कुछ नहीं हो पाता, ये बदलाव क्यों असफल होते हैं? इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारा देश अशिक्षित तो है, अज्ञानी नहीं है। इस देश में अभी तक ऐसा व्यक्ति प्रकट नहीं हुआ जो विश्वास दिला दे देश को कि ये मारे तो जा सकते हैं, खरीदे नहीं जा सकते। इनको विचलित नहीं किया जा सकता, इनको लोभ नहीं दिया जा सकता। सत्ता इनको दीवार में तो चुनवा सकती है, लेकिन डिगा नहीं सकती। अभी तक ऐसा कोई व्यक्तित्व प्रकट नहीं हुआ। अभी तक इस देश में किसी व्यक्ति के प्रति किसी को इतना विश्वास नहीं है। कहीं न कहीं आंदोलन करने वाले नेतृत्व की नींव चटकी हुई है। कहीं न कहीं उनमें भी धब्बे हैं, चाहे पद के हों, चाहे पद-लिप्सा के हों, चाहे अर्थ के हों, चाहे विदेशी एजेंसी के एजेंट के रूप में हों। कहीं न कहीं कुछ दाग-धब्बे हैं। इसके कारण देश धोखा खाता है, देश ने धोखा खाया है। अभी भी धोखा खाने की संभावनाएं हैं। ऐसा व्यक्ति जिस दिन देश देख लेगा कि ये मारे जा सकते हैं, लेकिन खरीदे नहीं जा सकते उसी दिन परिवर्तन हो जाएगा, फिर गड़बड़ नहीं हो सकती।
अभी तक हम लोग बदलाव करते थे केवल सत्ता के लिए। दल बदलने से, दलों की सत्ता बदलने से और शासक बदलने से इस देश में कुछ भी बदला नहीं जाएगा। क्योंकि चेहरे बदलते हैं, नीतियां, विधान, संविधान, वे सब प्रवृत्तियां वैसी की वैसी रहती हैं। हमने 1967 में एक बार यह परिवर्तन किया, हमने 1977 में परिवर्तन किया, 1989 में एक बार फिर परिवर्तन किया। अनुभव यह आया कि देश की जनता बार-बार छली गई। जनता ने अपना पूरा काम किया, लेकिन शासकों ने उसको छल लिया। द्रौपदी हर बार छली गई है इस देश के अंदर। मैं समझता हूं कि केवल व्यक्ति बदलने से, सत्ता बदलने से, शासन बदलने से और सत्ताधीश बदलने से काम नहीं चलेगा। पूरी की पूरी व्यवस्था बदली जाए। अभी दुर्भाग्य क्या है? इस देश में ऐसा नहीं है कि सभी भ्रष्ट हो चुके हैं, ऐसा नहीं है कि सभी अफसर रिश्वत लेते हैं। लोग अभी भी अपना कार्य प्रामाणिकता से करना चाहते हैं। लेकिन व्यवस्था ऐसी है कि प्रामाणिक व्यक्ति का जीना मुश्किल हो रहा है। उसकी मजबूरी हो रही है। या तो आप अप्रामाणिक बनिए या फिर , ग्लानि का जीवन जीते रहिए। आपको तंग किया जाएगा। इस देश में व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि अशिष्ट से अशिष्ट व्यक्ति भी शिष्ट होने के लिए मजबूर हो। जबकि आज शिष्ट भी अशिष्ट होने के लिए मजबूर हो रहा है। ईमानदार भी बेईमान होने के लिए मजबूर हो रहा है। हम नहीं चाहते कि हम बेईमान हों, लेकिन शासन की नीति ऐसी है कि हमको बेईमान होने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। होना यह चाहिए कि बेईमान बेईमानी करने की कोशिश करे, लेकिन वह कर न पाए। तो यह पूरा का पूरा 'सिस्टम' बदलना पड़ेगा, पूरा ढांचा बदलना पड़ेगा, पूरी नीतियां बदलनी पड़ेंगी, नीयत बदलनी पड़ेगी, वातावरण भी बदलना पड़ेगा। आम जनता जब तक स्वयं को दंडित करने की मानसिकता में नहीं आएगी, तब तक कोई भी बदलाव सुपरिणामकारी नहीं होगा। हम यह तो चाहते हैं कि हर अफसर ईमानदार हो, लेकिन जब अपना बेटा रिश्वत में फंसा होता है तो हम उसे बचाना चाहते हैं। जब तक अपराध के नाम पर पिता पुत्र को दंडित नहीं करेगा, पुत्र पिता को दंडित नहीं करेगा, गुरु शिष्य को दंडित नहीं करेगा, शिष्य गुरु को दंडित नहीं करेगा, तब तक कुछ ठीक नहीं हो सकता।
जनता की भूमिका है सबसे बड़ी :-
परिवर्तन में भूमिका तो जनता की ही होगी, क्योंकि जनता का ही देश है, जनता का ही शासन है, जनता के ही शासक हैं और जनता को ही, उन शासकों की नीतियां पालन करनी पड़ती हैं। जनता यह तय कर ले कि हम सब सहन कर लेंगे, लेकिन गलत नीतियों के आधार पर सुविधाएं नहीं भोगेंगे। यहां पर जनता को शुरुआत करनी होगी कि यदि हमारे पास अन्याय करने वाला, अनीति करने वाला शासन हो तो हम उसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। इसकी शुरुआत हमें अपने घर से करनी होगी। हर पिता को कहना होगा-बेटा, हमारे घर में अब अनीति का पैसा प्रवेश नहीं करेगा, रिश्वत का पैसा हम स्वीकार नहीं करेंगे। ऐसा होना चाहिए। लेकिन हो क्या रहा है, हमारे यहां? गोस्वामी जी ने कहा, हमारे यहां धर्म की शिक्षा तो दी जाती है- 'मात-पिता बालक न बुलावे, उदर भरै सो धर्म सिखावे'। जिस प्रकार भी पेट भरता हो, उस धर्म की शिक्षा देते हैं। नहीं, जिस प्रकार से नैतिकता भरती हो, जिस प्रकार से जीवन में चरित्र भरता हो, जिस प्रकार से जीवन में धर्म भरता हो, जिस प्रकार से जीवन में संस्कृति भरती हो, जिस प्रकार से जीवन में सदाचार भरता हो, जिस प्रकार से जीवन में संवेदनशीलता भरती हो, जिस प्रकार से जीवन में राष्ट्रीयता भरती हो, जिस प्रकार से जीवन में परोपकार भरता हो, उस धर्म की शिक्षा अब माता-पिता को देनी पड़ेगी। केवल धर्माचार्यों के शिक्षा देने से काम नहीं चलेगा। शिक्षा नीति में भी ऐसा परिवर्तन करना पड़ेगा। सबसे बड़ा शिक्षा केन्द्र है हमारे घर का आंगन, जहां पहले माता-पिता बैठकर सिखाते थे। आज बेटा रिश्वत लाता है तो पिता को प्रसन्नता होती है, पिता उस दिन रोए जिस दिन पुत्र रिश्वत के पैसे लेकर घर आए। यहां से जनता की भूमिका शुुरू होगी। मुझे लगता है कि तब सब ठीक होगा। दंड के कड़े कानून भी हों। अभी क्या हो रहा है कि जिन लोगों ने घोटाले किए उन्हें जेल तो हो गई लेकिन घोटाले वैसे के वैसे ही हैं। जो पैसा खा गए उनसे बाकायदा पैसा वसूल किया जाए और उनको सार्वजनिक रूप से दंडित किया जाए। जो अपराधी है, उसे कठोर से कठोर दंड दिया जाए। सभ्य व्यक्ति भयभीत है, सुशिक्षित भयभीत है। आज गुंडे, अपराधी, लुटेरे, ये लोग अभय प्राप्त हैं। इनको किसी प्रकार का भय नहीं है। ऐसा लगता है कि शासन ने इनको संरक्षण दिया हुआ है। जब सभ्य, सज्जन की सुरक्षा होगी और गुंडे, अपराधी दंडित होंगे और सार्वजनिक रूप से दंडित होंगे तो मुझे लगता है कि सबको दंडित करने की आवश्यकता नहीं होगी। 2-4 जगह जब सार्वजनिक रूप से कुछ लोग दंडित हो गए तो बहुत सारे तो अपने आप ही ठीक हो जाएंगे।
और अंत में यही सार निकलता है की दुनिया के हर देश में बड़ी क्रांति आप आदमियों ने ही करी है और क़र रहे है |भारत में भी यही होता देखा है ,
और अंत में यही सार निकलता है की दुनिया के हर देश में बड़ी क्रांति आप आदमियों ने ही करी है और क़र रहे है |भारत में भी यही होता देखा है ,
Thursday, January 23, 2014
एक बालिका की अभिलाषा ...
भारत की बेटी
मैं हु भारत कि बेटी , इस देश को मैं बनाउंगी !
कोई न आना राह मे मेरी , हर दुश्मन को मार भगाउंगी !!
मैं हु झांसी कि रानी , मैं हु आहिल्या , गार्गी !
इन्दिरा, रज़िया ,हु कल्पना चावला , जो बनी गगन की मार्गी !!
माता टेरेसा सा दिल है मेरा ,मीराबाई जैसा प्रेम !
सायना नेहवाल ,पी टी उषा ,खेल में मेरीकॉम !!
जीजा बाई जैसी माँ हु ! तो किरण बेदी सी बहन !
सीमा पर हो या देश मे हु! हँसकर, सब मुश्किल की है सहन !!
मुझको जन्म लेने दो , मै माँ ! बहन ! हु आपकी बेटी ! सब सुंदर सपने सजाउंगी !
हर मोके पर आगे हु मै ! अब जीने दो मुझको तो , मैं भी जी जाउंगी !! ,
देश का नाम ऊचा कर दूंगी , सर्व समाज को आगे बढ़ाऊंगी !
मैं हु भारत माता कि बेटी ,इस देश को मै बनाउंगी !!
आज उनका जन्मदिवस है जिनको हम "नेता जी" बोलते है ,जो वास्तव मे देश के नेताओ मे आग्रिम थे । जिनका जीवन सच्चे देशभक्त कि कहानी था । एक किताब कि तरह था , उनका जन्म 23 जनवरी, सन 1897 ई. में कटक उड़ीसा में और पिता का नाम 'जानकीनाथ बोस' और माँ का नाम 'प्रभावती' था।जो एक मशहूर वक़ील थे।
कांग्रेस के अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस ने कहा-
नेताजी' के नाम से विख्यात सुभाष चन्द्र ने सशक्त क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर, 1943 को 'आज़ाद हिन्द सरकार' की स्थापना की तथा 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का गठन किया। इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था।
सुभाष भारतीयता की पहचान ही बन गए थे और भारतीय युवक आज भी उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हैं। वे भारत की अमूल्य निधि थे। 'जयहिन्द' का नारा और अभिवादन उन्हीं की देन है।
उन्होंने कहा था कि- "स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। आपने आज़ादी के लिए बहुत त्याग किया है, किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है। आज़ादी को आज अपने शीश फूल चढ़ा देने वाले पागल पुजारियों की आवश्यकता है। ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है, जो अपना सिर काट कर स्वाधीनता देवी को भेट चढ़ा सकें। तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा। इस वाक्य के जवाब में नौजवानों ने कहा- "हम अपना ख़ून देंगे।" उन्होंने आईएनए को 'दिल्ली चलो' का नारा भी दिया।
* छात्र बृत्ति हुई भेद - भाव के कारण बोस ने मिशनरी स्कूल को छोड़ दिया ।
एक समय अरविन्द घोस ने बोस जी से कहा- "हम में से प्रत्येक भारतीय को डायनमो बनना चाहिए, जिससे कि हममें से यदि एक भी खड़ा हो जाए तो हमारे आस-पास हज़ारों व्यक्ति प्रकाशवान हो जाएँ। अरविन्द के शब्द बोस के मस्तिष्क में गूँजते थे।
इनकी शिक्षा कलकत्ता के 'प्रेज़िडेंसी कॉलेज'और 'स्कॉटिश चर्च कॉलेज' से हुई, और उसके बाद 'भारतीय प्रशासनिक सेवा' (इण्डियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के 'कॅम्ब्रिज विश्वविद्यालय' भेज दिया। सन 1920 ई. में बोस ने 'इंडियन सिविल सर्विस' की परीक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन अप्रैल सन 1921 ई. में भारत में बढ़ती और शीघ्र मार्त भूमि कि सेवा के लिए उसे छोड़ कर लौट आए। बोस को अपने बड़े भाई शरतचंद्र बोस (1889-1950 ई.) का भरपूर समर्थन मिला, वर्तमान कोलकाता के एक वक़ील होने के साथ-साथ प्रमुख कांग्रेसी राजनीतिज्ञ भी थे।
। वे चाहते तो उच्च अधिकारी के पद पर आसीन हो सकते थे। परन्तु उनकी देश भक्ति की भावना ने उन्हें कुछ अलग करने के लिए प्रेरित किया।
उनकी युवा अबस्था में कटक मे हैजे का प्रकोप हो गया था। शहर के कुछ कर्मठ एवं सेवाभावी युवकों ने ऐसी विकट स्थिति में एक दल का गठन किया। यह दल शहर की निर्धन बस्तियों में जाकर रोगियों की सेवा करने लगा सुभाषचंद्र बोस इस सेवादल के ऊर्जावान नेता थे।
हमारी सामाजिक स्थिति बदतर है, जाति-पाँति तो है ही, ग़रीब और अमीर की खाई भी समाज को बाँटे हुए है। निरक्षरता देश के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। इसके लिए संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता है। -सुभाष चंद्र बोस पूरे देश को सुभाष अपने साथ ले चल पड़े। वे गाँधी जी से मिले। वे चितरंजन दास जी के पास गए। उन्होंने सुभाष को देश को समझने और जानने को कहा। सुभाष देश भर में घूमें और निष्कर्ष निकाला-कांग्रेस के अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस ने कहा-
मैं अंग्रेज़ों को देश से निकालना चाहता हूँ। मैं अहिंसा में विश्वास रखता हूँ किन्तु इस रास्ते पर चलकर स्वतंत्रता काफ़ी देर से मिलने की आशा है।
सुभाषचंद्र बोस एक महान नेता थे। नेता अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करते, सो, नेता जी में यह गुण कूट-कूट कर भरा था। दरअसल, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अलग-अलग विचारों के दल थे। ज़ाहिर तौर पर महात्मा गाँधी को उदार विचारों वाले दल का प्रतिनिधि माना जाता था। वहीं नेताजी अपने जोशीले स्वभाव के कारण क्रांतिकारी विचारों वाले दल में थे।
लेकिन वे यह अच्छी तरह जानते थे कि महात्मा गाँधी और उनका मक़सद एक है, यानी देश की आज़ादी। वे यह भी जानते थे कि महात्मा गाँधी ही देश के 'राष्ट्रपिता' कहलाने के सचमुच हक़दार हैं।और बो उनका बहुत सम्मान करते रहे । गाँधीजी ने भी उनकी देश की आज़ादी के प्रति लड़ने की भावना देखकर ही उन्हें देशभक्तों का देशभक्त कहा था।सबसे पहले गाँधी को राष्ट्रपिता कहने वाले नेताजी ही थे।सुभाषचंद्र बोस एक युवा प्रशिक्षक, पत्रकार व बंगाल कांग्रेस के स्वयंसेवक बने। 1923 ई. में चितरंजन दास द्वारा गठित स्वराज्य पार्टी का सुभाष चन्द्र बोस ने समर्थन किया। 1923 ई. में जब चितरंजन दास ने 'कलकत्ता नगर निगम' के मेयर का कार्यभार संभाला तो उन्होंने सुभाष को निगम के 'मुख्य कार्यपालिका अधिकारी' पद पर नियुक्त किया। 25 अक्टूबर, 1924 ई. को उन्हें गिरफ़्तार कर बर्मा की 'माण्डले' जेल में बंद कर दिया गया।जहा एक समय तिलक को रखा गया था । सन् 1927 ई. में रिहा होने पर बोस कलकत्ता लौट आए, जहाँ चितरंजन दास की मृत्यु की खबर मिली । 1928 ई. में प्रस्तुत 'नेहरू रिपोर्ट' के विरोध में उन्होंने एक अलग पार्टी 'इण्डिपेन्डेन्ट लीग' की स्थापना की। 1928 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 'कलकत्ता अधिवेशन' में उन्होंने 'विषय समिति' में 'नेहरू रिपोर्ट' प्रकाशित प्रादेशिक स्वायत्ता के प्रस्ताव का डटकर विरोध किया। 1931 ई. में हुए 'गाँधी-इरविन समझौते' का भी सुभाष ने विरोध किया। सुभाष उग्र विचारों के समर्थक थे। उन्हें 'ऑल इण्डियन यूनियन कांग्रेस' एवं 'यूथ कांग्रेस' का भी अध्यक्ष बनाया गया था।
बोस बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए गए। सन् 1930 ई. में जब सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हुआ, बोस कारावास में थे। रिहा और फिर से गिरफ़्तार होने व अंतत: एक वर्ष की नज़रबंदी के बाद उन्हें यूरोप जाने की आज्ञा दे दी गई। निर्वासन काल में, उन्होंने 'द इंडियन स्ट्रगल' पुस्तक लिखी और यूरोपीय नेताओं से भारत पक्ष की पैरवी की। सन् 1936 ई. में यूरोप से लौटने पर उन्हें फिर एक वर्ष के लिए गिरफ़्तार कर लिया गया। सन् 1938 ई. में 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' का अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद उन्होंने 'राष्ट्रीय योजना आयोग' का गठन किया, जिसने भारत की औद्योगिक नीति को सूत्रबद्ध किया।
सन् 1939 ई. में बोस के प्रति समर्थन की अभिव्यक्ति एक गाँधीवादी पत्तामिसितारम्मैया को दुबारा हुए चुनाव में हरा देने के रूप में प्रकट हुई। लेकिन गाँधी जी के विरोध प्रकट करने के चलते इन्होने पद त्याग दिया ।
१९४० 'फ़ारवर्ड ब्लॉक' की स्थापना की, सन् 1940 ई. में वह पुन: बंदी बना लिए गए। आमरण अनशन के कारण घबराकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया। कड़ी निगरानी के बावज़ूद वह 26 जनवरी सन् 1941 ई. को अपने कलकत्ता के आवास से वेश बदलकर निकल भागे और काबुल व मॉस्को के रास्ते अंतत: अप्रैल में जर्मनी पहुँच गए।
पूर्वी एशिया पहुँचकर सुभाष ने सर्वप्रथम वयोवृद्ध क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस से भारतीय स्वतन्त्रता परिषद का नेतृत्व सँभाला। सिंगापुर के एडवर्ड पार्क में रासबिहारी ने स्वेच्छा से स्वतन्त्रता परिषद का नेतृत्व सुभाष को सौंपा था।
जापान के प्रधानमन्त्री जनरल हिदेकी तोजो ने नेताजी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्हें सहयोग करने का आश्वासन दिया। नेताजी ने जापान की संसद (डायट) के सामने भाषण भी दिया।
21 अक्तूबर 1943 के दिन नेताजी ने सिंगापुर में आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द (स्वाधीन भारत की अन्तरिम सरकार) की स्थापना की। वे खुद इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री और युद्धमन्त्री बने। इस सरकार को कुल नौ देशों ने मान्यता दी। नेताजी आज़ाद हिन्द फौज के प्रधान सेनापति भी बन गये।
आज़ाद हिन्द फौज में जापानी सेना ने अंग्रेजों की फौज से पकड़े हुए भारतीय युद्धबन्दियों को भर्ती किया था। आज़ाद हिन्द फ़ौज में औरतों के लिये झाँसी की रानी रेजिमेंट भी बनायी गयी।
जर्मनी में नेताजी एडम वॉन ट्रौट जू सोल्ज़ द्वारा नवगठित 'स्पेशल ब्यूरो फ़ॉर इंडिया' के संरक्षण में आ गए। जनवरी सन् 1942 ई. में उन्होंने और अन्य भारतीयों ने जर्मन प्रायोजित 'आज़ाद हिंद रेडियो' अंग्रेज़ी,हिन्दी, बांग्ला, तमिल , तेलुगु, गुजराती और पश्तो में नियमित प्रसारण करना शुरू कर दिया। सफ़र करते हुए, सन् 1943 में टोक्यो पहुँचे। 4 जुलाई को उन्होंने पूर्वी एशिया में चलने वाले भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृव्य संभाला ।
21 अक्टूबर को उन्होंने प्रतिज्ञा की-
। उन्होंने एक सभा में कहा- 'यदि भारत ब्रिटेन के विरूद्ध लड़ाई में भाग ले तो उसे स्वतंत्रता मिल सकती है।' उन्होंने गुप्त रूप से इसकी तैयारी शुरू कर दी। 25 जून को सिंगापुर रेडियो से उन्होंने सूचना दी कि आज़ाद हिन्द फ़ौज का निर्माण हो चुका है। अंग्रेज़ों ने उनको बन्दी बनाना चाहा, पर वे चकमा देकरनिकल गए।
मैं अपने देश भारत और भारतवासियों को स्वतंत्र कराने की प्रतिज्ञा करता हूँ।लोगों ने तन, मन और धन से इनका सहयोग किया। उन्होंने एक विशाल सभा में घोषणा की- तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा। कतार लग गई।खून बहाने बालो की
दक्षिण-पूर्वी एशिया से जापान द्वारा एकत्रित क़रीब 40,000 भारतीय स्त्री-पुरुषों की प्रशिक्षित सेना का गठन शुरू कर दिया।
नेताजी' के नाम से विख्यात सुभाष चन्द्र ने सशक्त क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर, 1943 को 'आज़ाद हिन्द सरकार' की स्थापना की तथा 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का गठन किया। इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था।
क़दम-क़दम बढाए जा, खुशी के गीत गाए जा-इस संगठन का वह गीत था, जिसे गुनगुना कर संगठन के सेनानी जोश और उत्साह से भर उठते थे।जो आज भी भारतीय सेना गीत है ।और जापानी सैनिकों के साथ उनकी आज़ाद हिंद फ़ौज रंगून (अब यांगून) से होती हुई थल मार्ग से भारत की ओर बढ़ती, 18 मार्च सन् 1944 ई. कीकोहिमा और इम्फ़ाल के भारतीय मैदानी क्षेत्रों में पहुँच गई। जापानी वायुसेना से सहायता न मिलने के कारण एक भीषण लड़ाई में भारतीयों और जापानियों की मिली-जुली सेना हार गई और उसे पीछे हटना पड़ा। लेकिन आज़ाद हिंद फ़ौज कुछ अर्से तक बर्मा (वर्तमान म्यांमार) और बाद में हिंद-चीन में अड्डों वाली मुक्तिवाहिनी सेना के रूप में अपनी पहचान बनाए रखने में सफल रही। इसी सेना ने 1943 से 1945 तक शक्तिशाली अंग्रेज़ों से युद्ध किया था तथा उन्हें भारत को स्वतंत्रता प्रदान कर देने के विषय में सोचने के लिए मजबूर किया था। सन् 1943 से 1945 तक 'आज़ाद हिन्द सेना' अंग्रेज़ों से युद्ध करती रही।अपनी फौज को प्रेरित करने के लिये नेताजी ने " दिल्ली चलो" का नारा दिया। दोनों फौजों ने अंग्रेजों से अंदमान और निकोबार द्वीप जीत लिये। यह द्वीप आर्जी-हुकूमते-आज़ाद-हिन्द के अनुशासन में रहे। नेताजी ने इन द्वीपों को "शहीद द्वीप" और "स्वराज द्वीप" का नया नाम दिया। दोनों फौजों ने मिलकर इंफाल और कोहिमा पर आक्रमण किया। लेकिन बाद में अंग्रेजों का पलड़ा भारी पड़ा और दोनों फौजों को पीछे हटना पड़ा।
सुभाष भारतीयता की पहचान ही बन गए थे और भारतीय युवक आज भी उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हैं। वे भारत की अमूल्य निधि थे। 'जयहिन्द' का नारा और अभिवादन उन्हीं की देन है।
उन्होंने कहा था कि- "स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। आपने आज़ादी के लिए बहुत त्याग किया है, किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है। आज़ादी को आज अपने शीश फूल चढ़ा देने वाले पागल पुजारियों की आवश्यकता है। ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है, जो अपना सिर काट कर स्वाधीनता देवी को भेट चढ़ा सकें। तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा। इस वाक्य के जवाब में नौजवानों ने कहा- "हम अपना ख़ून देंगे।" उन्होंने आईएनए को 'दिल्ली चलो' का नारा भी दिया।
तुम मुझे ख़ून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा। सुभाष चंद्र बोसजिस व्यक्तित्व ने इसे देश हित में सबके सामने रखा वह किस जीवट का व्यक्ति होगा।
आज इतने वर्षों बाद भी जन मानस उनकी राह देखता है।क्युकी उनके अंतिम समय का कुछ प्रमाण नही है ' वे रहस्य थे ना, और रहस्य को भी कभी किसी ने जाना है?
ताजी सुभाष चंद्र बोस सर्वकालिक नेता थे जिनकी ज़रूरत कल थी, आज है और आने वाले कल में भी होगी। वह ऐसे वीर सैनिक थे, इतिहास जिनकी गाथा गाता रहेगा। उनके विचार, कर्म और आदर्श अपना कर राष्ट्र वह सब कुछ हासिल कर सकता है जिसका हक़दार है। स्वतंत्रता समर के अमर सेनानी, मां भारती के सच्चे सपूत थे। नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उन योद्धाओं में से एक हैं जिनका नाम और जीवन आज भी करोड़ों देशवासियों को मातृभमि के लिए समर्पित होकर कार्य करने की प्रेरणा देता है। उनमें नेतृत्व के चमत्कारिक गुण थे जिनके बल पर उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान संभाल कर अंग्रेज़ों को भारत से निकाल बाहर करने के लिए एक मज़बूत सशस्त्र प्रतिरोध खड़ा करने में सफलता हासिल की। नेता जी के जीवन से यह भी सीखने को मिलता है कि हम देश सेवा से ही जन्मदायिनी मिट्टी का कर्ज़ उतार सकते हैं। उन्होंने अपने परिवार के बारे में न सोचकर पूरे देश के बारे में सोचा। नेता जी के जीवन के कई और पहलू हमे एक नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। वे एक सफल संगठनकर्ता थे। उनकी वाक्- --शैली में जादू था और उन्होंने देश से बाहर रहकर 'स्वतंत्रता आंदोलन' चलाया। नेता जी मतभेद होने के बावज़ूद भी अपने साथियो का मान सम्मान रखते थे। नेता जी की व्यापक सोच आज की राजनीति के लिए भी सोचनीय विषय है।
Thursday, January 9, 2014
हमे प्रेम से रहेने दो ....
जम्मू-कश्मीर के सोपोर इलाके में स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) की सर्च टीम पर हुए आतंकी हमले में जहां एक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर (एएसआई) शहीद हो गया, वहीं तीन जवान बुरी तरह जख्मी हो गए।जहां एएसआई कफील अहमद ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। पर बड़ी खबर नही बनी जबकि एसओजी के घायल कांस्टेबल मंजूर अहमद, जाकिर और इरफान अहमद का उपचार चल रहा है। डाक्टरों के अनुसार उनकी हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है। हर भारत बासी इस देश भक्तो के जल्दी ठीक होने की कामना कर रहा है | पर नेता और उनके दल मुज्ज़फ्र्नगर के दंगो पर राजनीति क़र रहे है | खुले मे पड़े लोगो पुनर्वास की मदद करते , दंगो की निष्पक्ष जाँच , अपराधियों को सख्त सज़ा मिलती तो भविष्य मे दंगे होने से बचा जा सकता था | मुस्लिमो के रहनुमा माँने जाने बाले समाजवादी लोग भद्दे न्रत्य और रस -रास का उत्सव मना रहे है |
शहीदों का कोई धर्म नही होता , उनकी तो भावना होती है , जज्वा होता है,, मोका होता है ,सोच होती देश होता है सबसे पहले |
पर मुझे लगता है देश की सत्ता के लिए लड़ते खास और आम आदमियों पर इनका कोई फर्क नही पड़ा | रोज़ लोग मरते है , पर वतन पर सहीद कितने होते है ?
अब मे मोदी जी ., राहुल जी और आम आदमी पार्टी के लोगो के सामने ये निवेदन रखता हु की सहीद के परिवारो को इतनी राशी की राहत तो मिले जो भारत देश पर मरने बालो की शान के मुताबिक हो !,देश सेवा मे शहीद होने बालो सुरक्षा बलो,और नागरिको के परिबार के लिए राहत और पुनर्वास के साधन बढाये जाये विशेष कोष बनाया जाये
और आतंकवादियो को खतमे के लिए लोग अपने पीछे सरकार को खड़ा देखे तब एस देश के दुश्मन भी हमले से पहले हजार बार सोचेंगा ………..
शहीदों का कोई धर्म नही होता , उनकी तो भावना होती है , जज्वा होता है,, मोका होता है ,सोच होती देश होता है सबसे पहले |
पर मुझे लगता है देश की सत्ता के लिए लड़ते खास और आम आदमियों पर इनका कोई फर्क नही पड़ा | रोज़ लोग मरते है , पर वतन पर सहीद कितने होते है ?
अब मे मोदी जी ., राहुल जी और आम आदमी पार्टी के लोगो के सामने ये निवेदन रखता हु की सहीद के परिवारो को इतनी राशी की राहत तो मिले जो भारत देश पर मरने बालो की शान के मुताबिक हो !,देश सेवा मे शहीद होने बालो सुरक्षा बलो,और नागरिको के परिबार के लिए राहत और पुनर्वास के साधन बढाये जाये विशेष कोष बनाया जाये
और आतंकवादियो को खतमे के लिए लोग अपने पीछे सरकार को खड़ा देखे तब एस देश के दुश्मन भी हमले से पहले हजार बार सोचेंगा ………..
यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा, सब मिट गए जहाँ से ।
अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा ||
अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशाँ हमारा ||
कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी ।
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा ।।
हां तो लेख का जो विषय था वो ये की इस देश के लिए अब सबसे जरुरी है धार्मिक एकता बाकि बाते तो बेकार हो जाती है जब लोग सडको पर आकर मरते है मारते है , डर और भय से घर मे भी नही रह पाते | लगता है सारी राजनीति ही अब दोनों को लड़ाने के लिए होती है |पर फिर भी कुछ उम्मीद अभी बाकि है ,अभी लाखो करोड़ो लोग प्रेम से साथ रहेते है और अभी भी लोग प्रेम से रहना पसंद करते है |जिसके कुछ उद्धरण इस प्रकार से है …
वाराणसी के एक मदरसे में सांप्रदायिक सौहार्द का एक बेमिसाल उदाहरण देखने को मिलता है, जहां छात्रों को कुरान के साथ-साथ भगवत गीता की भी शिक्षा दी जा रही है। यह आदर्श स्थिति शहर के छतरपुर इलाके स्थित 45 साल पुराने बहरूल-उलूम मदरसा में देखने को मिल रही है, जहां छात्र कुरान की आयतों के साथ-साथ गीता के श्लोक भी पढ़ रहे हैं। मदरसा संचालक 60 वर्षीय हाजी मुख्तार अहमद ने बताया, कुरान के साथ हिंदू शास्त्रों को पढ़ाने के पीछे हमारा उद्देश्य छात्रों को दोनों धार्मिक पुस्तकों में बताई गई बातें बताना हैं, ताकि उन्हें जीवन में ढालकर वे अपना भविष्य बेहतर बना सकें। अहमद के मुताबिक, इससे वे दोनों धर्मग्रंथों में बताई बातों को एक-दूसरे से जोड़े सकेंगे और उनके मन में कुरान के साथ-साथ भगवत गीता के लिए भी सम्मान जागृत होगा। उन्होंने कहा, इस कदम के पीछे हमारा उद्देश्य सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी भाईचारे को मजबूत करना है। दोनों धर्मग्रंथों में एक ही बात बताई गई है कि ईश्वर एक है।
वर्ष 1964 में स्थापित हुए इस मदरसे में करीब एक साल पहले भगवत गीता व अन्य हिंदू शास्त्रों की पढ़ाई शुरू हुई थी। अहमद के अनुसार, हमारा उद्देश्य मदरसे में पढ़ने वाले छात्रों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना और उन्हें एक बेहतर इंसान बनाना है।
मदरसा पदाधिकारियों के मुताबिक, यहां छात्रों को चारों वेद- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद की भी शिक्षा दी जाती है। यहां करीब 2500 छात्र पढ़ते हैं। लड़कियों के लिए 12वीं तक शिक्षा की व्यवस्था है, जबकि लड़कों के लिए आठवीं तक पढ़ाई की सुविधा है। मदरसे में कई हिन्दू शिक्षक भी है |
उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के मुमताज नगर गांव में नसीम की तरह दूसरे मुसलमान भी रामलीला के आयोजन में दिल खोलकर चंदा देकर सालों से चली आ रही इस परम्परा को संजोए हुए हैं। दशकों से मुसलमान इस रामलीला का आयोजन करते आ रहे हैं।
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा ।।
हां तो लेख का जो विषय था वो ये की इस देश के लिए अब सबसे जरुरी है धार्मिक एकता बाकि बाते तो बेकार हो जाती है जब लोग सडको पर आकर मरते है मारते है , डर और भय से घर मे भी नही रह पाते | लगता है सारी राजनीति ही अब दोनों को लड़ाने के लिए होती है |पर फिर भी कुछ उम्मीद अभी बाकि है ,अभी लाखो करोड़ो लोग प्रेम से साथ रहेते है और अभी भी लोग प्रेम से रहना पसंद करते है |जिसके कुछ उद्धरण इस प्रकार से है …
वाराणसी के एक मदरसे में सांप्रदायिक सौहार्द का एक बेमिसाल उदाहरण देखने को मिलता है, जहां छात्रों को कुरान के साथ-साथ भगवत गीता की भी शिक्षा दी जा रही है। यह आदर्श स्थिति शहर के छतरपुर इलाके स्थित 45 साल पुराने बहरूल-उलूम मदरसा में देखने को मिल रही है, जहां छात्र कुरान की आयतों के साथ-साथ गीता के श्लोक भी पढ़ रहे हैं। मदरसा संचालक 60 वर्षीय हाजी मुख्तार अहमद ने बताया, कुरान के साथ हिंदू शास्त्रों को पढ़ाने के पीछे हमारा उद्देश्य छात्रों को दोनों धार्मिक पुस्तकों में बताई गई बातें बताना हैं, ताकि उन्हें जीवन में ढालकर वे अपना भविष्य बेहतर बना सकें। अहमद के मुताबिक, इससे वे दोनों धर्मग्रंथों में बताई बातों को एक-दूसरे से जोड़े सकेंगे और उनके मन में कुरान के साथ-साथ भगवत गीता के लिए भी सम्मान जागृत होगा। उन्होंने कहा, इस कदम के पीछे हमारा उद्देश्य सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी भाईचारे को मजबूत करना है। दोनों धर्मग्रंथों में एक ही बात बताई गई है कि ईश्वर एक है।
वर्ष 1964 में स्थापित हुए इस मदरसे में करीब एक साल पहले भगवत गीता व अन्य हिंदू शास्त्रों की पढ़ाई शुरू हुई थी। अहमद के अनुसार, हमारा उद्देश्य मदरसे में पढ़ने वाले छात्रों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना और उन्हें एक बेहतर इंसान बनाना है।
मदरसा पदाधिकारियों के मुताबिक, यहां छात्रों को चारों वेद- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद की भी शिक्षा दी जाती है। यहां करीब 2500 छात्र पढ़ते हैं। लड़कियों के लिए 12वीं तक शिक्षा की व्यवस्था है, जबकि लड़कों के लिए आठवीं तक पढ़ाई की सुविधा है। मदरसे में कई हिन्दू शिक्षक भी है |
उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के मुमताज नगर गांव में नसीम की तरह दूसरे मुसलमान भी रामलीला के आयोजन में दिल खोलकर चंदा देकर सालों से चली आ रही इस परम्परा को संजोए हुए हैं। दशकों से मुसलमान इस रामलीला का आयोजन करते आ रहे हैं।
नसीम खान ने कहा, “हमें गर्व है कि हम इस तरह की परम्परा निभा रहे हैं, जो सही अर्थो में आपसी भाईचारे को मजबूत करती है। हर साल दशहरे पर जब हम लोग रामलीला का आयोजन करते हैं तो हम में ऐसी भावनाएं उमड़ती हैं कि जैसे हम ईश्वर की सेवा कर रहे हैं। आखिरकार हिंदू भाई भी तो उसी ईश्वर की संतान हैं।”
रामलीला का आयोजन रामलीला रामायण समिति के बैनर तले होता है। अब से करीब 47 साल पहले गांव के मुसलमानों ने मिलकर आपसी भाईचारे को मजबूत करने के उद्देश्य से इस समिति का गठन किया था। मुमताजनगर गांव की आबादी करीब 600 है जिसमें से तकरीबन 65 फीसदी मुसलमान समुदाय के लोग हैं।
मधुबन (मऊ) : लगभग सौ सालों से लगातार स्थानीय तहसील के ग्राम सभा दरगाह में आयोजित होने वाले ऐतिहासिक रामलीला की बुनियाद एक मुस्लिम व्यक्ति ने रखी थी।
मुजफ्फरनगर के रैदासपुरी में रहने वाली माधोराम शास्त्री सींचपाल के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। उन्होंने बगैर किसी प्रचार के पिछले 10 वर्षो से एक अनूठी मुहिम चला रखी है। वह इस्लाम धर्म का समान कर उसके त्योहारों को उसी तरह मानते हैं, जिस तरह मुसलिम भाई मनाते हैं।
जब एस देश के मुस्लिम भाई देश के लिए आवाज़ बुलंद करके इसके दुश्मनो के आगे खड़े हो कर कह देंगे की ये देश उनका भी है तो किसकी हिम्मत है? की कुछ गलत सोच भी सके
और हिन्दुयो को भी आपसी विश्वास बड़ाने के लिए आगे आना होंगा सुरक्षा का महोल बनाना होंगा , सबसे बड़ी समस्या है राजनीति जो हमे बाटती है , दोनों तरफ के नेता अपनी दूकान चलाए के लिए विकास की नही डर की राजनीति करते है |आजादी के इतने सालो बाद भी अल्प्सख्यको का विकास क्यों नही हो पाया ? क्युकी उनको वोट ही समझा गया इंसान नही |मुस्लिमो को ये सोचना होंगा की ये देश उनका है जिसके निर्माण मे उनकी भी भूमिका महत्वपूर्ण है | और हिन्दुयो को भी ये मानना होंगा की साथ मिलकर ही सर्व विकास हो सकता है |
मुस्लिमो को हर स्तर की शिक्षा , रोजगार मिले और उनको मुख्य धरा और धारा से जोड़ा जाये तब देश मजबूत बनेंगा |दोनों मतो के लोग जब मिलकर काम करंगे तब एस देश और समाज के साथ ही सबका विकास होगा | नही तो गन्दी राजनीति इस देश को बर्बादी के राह पर ले जाने मे कमी नही करेंगी |
अब चुनाव आने है इनमे सबको सोचना है की देश को किस दिशा मे ले जाना है ……
मधुबन (मऊ) : लगभग सौ सालों से लगातार स्थानीय तहसील के ग्राम सभा दरगाह में आयोजित होने वाले ऐतिहासिक रामलीला की बुनियाद एक मुस्लिम व्यक्ति ने रखी थी।
मुजफ्फरनगर के रैदासपुरी में रहने वाली माधोराम शास्त्री सींचपाल के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। उन्होंने बगैर किसी प्रचार के पिछले 10 वर्षो से एक अनूठी मुहिम चला रखी है। वह इस्लाम धर्म का समान कर उसके त्योहारों को उसी तरह मानते हैं, जिस तरह मुसलिम भाई मनाते हैं।
जब एस देश के मुस्लिम भाई देश के लिए आवाज़ बुलंद करके इसके दुश्मनो के आगे खड़े हो कर कह देंगे की ये देश उनका भी है तो किसकी हिम्मत है? की कुछ गलत सोच भी सके
और हिन्दुयो को भी आपसी विश्वास बड़ाने के लिए आगे आना होंगा सुरक्षा का महोल बनाना होंगा , सबसे बड़ी समस्या है राजनीति जो हमे बाटती है , दोनों तरफ के नेता अपनी दूकान चलाए के लिए विकास की नही डर की राजनीति करते है |आजादी के इतने सालो बाद भी अल्प्सख्यको का विकास क्यों नही हो पाया ? क्युकी उनको वोट ही समझा गया इंसान नही |मुस्लिमो को ये सोचना होंगा की ये देश उनका है जिसके निर्माण मे उनकी भी भूमिका महत्वपूर्ण है | और हिन्दुयो को भी ये मानना होंगा की साथ मिलकर ही सर्व विकास हो सकता है |
मुस्लिमो को हर स्तर की शिक्षा , रोजगार मिले और उनको मुख्य धरा और धारा से जोड़ा जाये तब देश मजबूत बनेंगा |दोनों मतो के लोग जब मिलकर काम करंगे तब एस देश और समाज के साथ ही सबका विकास होगा | नही तो गन्दी राजनीति इस देश को बर्बादी के राह पर ले जाने मे कमी नही करेंगी |
अब चुनाव आने है इनमे सबको सोचना है की देश को किस दिशा मे ले जाना है ……
Thursday, January 2, 2014
सफदर हाशमी की मौत नही हो सकती ....
आज सफदर हाशमी की पुण्यतिथि है | उस घटना को तिथि बार याद नही करना चाहता जो रोज होती है | पर २५ वर्ष हो गये है | कबीर से लेकर मखदूम मोहियुद्दीन होते हुये बाबा नागार्जुन तक हर युग में प्रतिरोध के संघर्षों को सांस्कृतिक कर्मियों ने ऊर्जा दी है, शब्द दिये हैं, तो संघर्षों ने भी ऐसे हजारों हजार रचनाकार दिये हैं। सकारात्मक संघर्षों की कोख से साहित्य, गीत, नाटक व रचनाएँ प्रसूत हुयी हैं। संघर्षों की बड़ी उथल-पुथल ने बड़ी-बड़ी रचनाएँ दी हैं। चालीस से सत्तर तक का दशक साहित्य और यहाँ तक कि फिल्म माध्यम का सर्वश्रैष्ठ दौर ऐसे ही नहीं था। फैज अहमद फैज, मंटो, मजाज, ख्वाजा अहमद अब्बास आदि की जन्म हुआ था |
उनका जन्म १२ अप्रैल १९५४ को में हनीफ और कौमर आज़ाद हाशमी के घर दिल्ली मे हुआ था। उनका शुरुआती जीवन अलीगढ़ और दिल्ली में गुज़रा, यही से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। दिल्ली के सेंट स्टीफेन्स कॉलेज से अंग्रेज़ी में ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होने दिल्ली यूनीवस्र्टी से अंग्रेजी में एमए किया। यही वह समय था जब वे स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की सांस्कृतिक यूनिट से जुड़ गए, और इसी बीच इप्टा से भी उनका जुड़ाव रहा।
वो जन नाट्य मंच (जनम) के संस्थापक सदस्य थे। यह संगठन १९७३ में इप्टा से अलग होकर बना, ये सड़क रोड पर आम जन को नाट्यकला से जोड़ने जैसा काम करते रहे | सीटू जैसे मजदूर संगठनो के साथ जनम का अभिन्न जुड़ाव रहा। इसके अलावा जनवादी छात्रों, महिलाओं, युवाओं, किसानो इत्यादी के आंदोलनो में भी इसने अपनी सक्रिय थे । १९७५ में आपातकाल के लागू होने तक सफदर जनम के साथ नुक्कड़ नाटक करते रहे,और देश बहार मे चर्चा का कारण बन गये और उसके बाद आपातकाल के दौरान वे गढ़वाल, कश्मीर और दिल्ली के विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी साहित्य के व्याख्याता के पद पर रहे। आपातकाल के बाद सफदर वापिस राजनैतिक तौर पर सक्रिय हो गए और १९७८ तक जनम भारत में नुक्कड़ नाटक के एक महत्वपूर्ण संगठन के रूप में उभरकर आया।
एक नाटक ‘मशीन’ को दो लाख मजदूरों की विशाल सभा के सामने आयोजित किया गया था । इसके बाद और भी बहुत से नाटक आते रहे |
जिनमे निम्र वर्गीय किसानों की समस्या और बेचैनी का दर्शाता हुआ नाटक ‘गांव से शहर तक’,
सांप्रदायिक फासीवाद को दर्शाते(हत्यारे और अपहरण भाईचारे का),
बेरोजगारी पर बना नाटक ‘तीन करोड़’,
घरेलू हिंसा पर बना नाटक ‘औरत’
और मंहगाई पर बना नाटक डीटीसी की धांधली इत्यादि प्रमुख रहे।
खुद सफदर हाशमी ने लिखा था कि जब कोई मजदूर नुक्कड़ नाटक देख रहा होता है तब वह सिर्फ भीड़ का हिस्सा नहीं होता। उसे देखते हुये जब वह हॅंसता है या तालियाँ बजाता है तो दरअसल वह एक तरह से प्रतिरोध की कार्यवाही में हिस्सा ले रहा होता है।
सफदर ने बहुत से वृत्तचित्रों और दूरदर्शन के लिए एक धारावाहिक ‘खिलती कलियों का निर्माण भी किया’। उन्होने बच्चों के लिए किताबें लिखीं, और भारतीय थिएटर की आलोचना में भी अपना योगदान दिया।उनके गीत दूरदर्शन पर बहुत प्रसिद्ध हुए जिनमे ” पड़ना लिखना सीखो ” ” किताबे ”
“ मुद्दा यह नहीं है कि नाटक कहाँ आयोजित किया जाए (नुक्कड नाटक, कला को जनता तक पंहुचाने का श्रेष्ठ माध्यम है), बल्कि मुख्य मुद्दा तो तो उस अवश्यंभावी और न सुलझने वाले विरोधाभास का है, जो कला के प्रति ‘व्यक्तिवादी बुर्जुवा दृष्टिकोण’ और ‘सामूहिक जनवादी दृष्टिकोण’ के बीच होता है।
- सफदर हाशमी, अप्रैल 1983
सफदर ने जनम के निर्देशक की भूमिका बखूबी निभाई, उनकी मृत्यु तक जनम २४ नुक्कड़ नाटकों को ४००० बार प्रदर्शित कर चुका था। इन नाटकों का प्रदर्शन मुख्यत: मजदूर बस्तियों, फैक्टरियों और वर्कशॉपों में किया गया था। सफदर हिंदुस्तान की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सदस्य थे। १९७९ में उन्होने अपनी कॉमरेड और सह नुक्कड़ कर्मी ‘मल्यश्री हाशमी’ से शादी कर ली। बाद में उन्होंने प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया और इक्रोमिक्स टाइम्स के साथ पत्रकार के रूप में काम किया, वे दिल्ली में पश्चिम बंगाल सरकार के ‘प्रेस इंफोरमेशन ऑफिसर’ के रूप में भी तैनात रहे। १९८४ में उन्होने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और खुद का पूरा समय राजनैतिक सक्रियता को समर्पित कर दिया। सफदर ने दो बेहतरीन नाटक तैयार करने में अपना सहयोग दिया, मक्सिम गोर्की के नाटक पर आधारित ‘दुश्मन’ और प्रेमचंद की कहानी ‘मोटेराम के सत्याग्रह’ पर आधारित नाटक जिसे उन्होने हबीब तनवीर के साथ १९८८ में तैयार किया था। इसके अलावा उन्होने बहुत से गीतों, एक टेलीवीज़न धारावाहिक, कविताओं, बच्चों के नाटक, और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों की अमोल विरासत हमें सौंपी। रैडिकल और पॉपुलर वामपंथी कला के प्रति अपनी कटिबद्धता के बावजूद उन्होने कभी भी इसे व्यर्थ की बौद्धिकत्ता का शिकार नहीं बनने दिया और निर्भीकतापूर्वक प्रयोगों में भी जुटे रहे।
किन्तु १ जनवरी १९८९ को जब दिल्ली से सटे साहिबाबाद के झंडापुर गांव में ग़ाज़ियाबाद नगरपालिका चुनाव के दौरान नुक्कड़ नाटक ‘हल्ला बोल’ का प्रदर्शन किया जा रहा था तभी जनम के ग्रुप पर कांग्रेस (आई) से जुड़े कुछ लोगों ने हमला कर दिया।इस हमले में सफदर बुरी तरह से जख्मी हुए। उसी रात को सिर में लगी भयानक चोटों की वजह से सफदर की मृत्यु हो गई।पर वो जिन्दा है हर गरीब के दिल मे और दो दिन बाद, ४ जनवरी १९८९ को मल्यश्री हाशमी,उनकी पत्नी जनम की टोली के साथ उस स्थान पर वापिस लौटीं और अधूरे छूट गए नाटक को खत्म किया।आज तक वहा पर उनकी याद मे लोग एक होकर उनको याद करते है | इस घटना के १४ साल बाद गाजियाबाद की एक अदालत ने १० लोगों को हत्या के मामले में आरोपी करार दिया,
सफदर ‘राज्य की तानाशाही’ के खिलाफ भारतीय वामपंथी आंदोलन के लिए एक सांस्कृतिक प्रतिरोध का प्रतीक बनकर उभरे। जनम ने दिल्ली में अपना कार्य जारी रखा। फरवरी १९८९ में भीष्म साहनी और अन्य बुद्धिजीवियों ने मिलकर ‘सफदर हाशमी मैमोरियल ट्रस्ट’(सहमत) का निर्माण किया। सफदर का संगठन जन नाट्य मंच १९८९ की उस घटना के बाद से हर बरस १ जनवरी को झंडापुर के उसी शहादत स्थल पर एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन करता है। इस कार्यक्रम की दर्शक होती है आसपास के औद्योगिक क्षेत्र के सैकड़ों मजदूरों की विशाल भीड़। इसी तरह के एक कार्यक्रम का आयोजन ‘सहमत’ भी दिल्ली के बुद्धिजीवी तबके के बीच विट्ठलभाई पटेल हाउस में करता है। आज सफदर जनवादी तबके के लिए प्रतिरोध के एक बहुत बड़े प्रतीक के रूप में जाना जाता है, बहुत से लोग, गैर सरकारी संस्थान उसकी इस विरासत का इस्तेमाल अपने निजी हित साधने में कर रहे हैं, लेकिन इस सबके बावजूद भी सफदर की अमिट ज्योति इन प्रयासों को धूमिल कर देती हैं।उनसे सबक लेकर जहाँ अपने बीच से बौद्धिक- सांस्कृतिक कर्मी तैयार करने होंगे वहीं अन्य वर्गों से आये जागृत व चेतना सम्पन्न बुद्धिजीवियों को भी स्थान, समय, सुविधा व गुँजाइश देनी होगी।यही उनको असली श्रदांजलि होंगी | अगर शासक वर्गों के लिये खतरनाक नहीं होता तो वे सफदर हाशमी को नहीं मारते। एम.एफ.हुसैन की गैलरी पर तोड़-फोड़ नहीं करते, वली दकनी की मजार को जमीदोंज नहीं करते, ईराक में बगदाद की हजारों साल पुरानी लाइब्रेरी से लेकर मुम्बई की भण्डारकर लाइब्रेरी तक को आग नहीं लगाते, बुद्ध के स्तूपों और ग्रन्थों के पीछे लाठी फावड़े लेकर नहीं दौड़ते। मनु, गौतम और शुक्र महाराजों को स्मृतियाँ और संहिताएँ नहीं लिखनी पड़ती ! अगर इस माध्यम की इतनी प्रामाणिकता व मारकता है तो इसकी हिफाजत व विस्तार आन्दोलन के लिये उतना ही जरूरी है | उनको मरने मत देना | सफ़दर अभी मत जाना भाई …..
उनका जन्म १२ अप्रैल १९५४ को में हनीफ और कौमर आज़ाद हाशमी के घर दिल्ली मे हुआ था। उनका शुरुआती जीवन अलीगढ़ और दिल्ली में गुज़रा, यही से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। दिल्ली के सेंट स्टीफेन्स कॉलेज से अंग्रेज़ी में ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होने दिल्ली यूनीवस्र्टी से अंग्रेजी में एमए किया। यही वह समय था जब वे स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की सांस्कृतिक यूनिट से जुड़ गए, और इसी बीच इप्टा से भी उनका जुड़ाव रहा।
वो जन नाट्य मंच (जनम) के संस्थापक सदस्य थे। यह संगठन १९७३ में इप्टा से अलग होकर बना, ये सड़क रोड पर आम जन को नाट्यकला से जोड़ने जैसा काम करते रहे | सीटू जैसे मजदूर संगठनो के साथ जनम का अभिन्न जुड़ाव रहा। इसके अलावा जनवादी छात्रों, महिलाओं, युवाओं, किसानो इत्यादी के आंदोलनो में भी इसने अपनी सक्रिय थे । १९७५ में आपातकाल के लागू होने तक सफदर जनम के साथ नुक्कड़ नाटक करते रहे,और देश बहार मे चर्चा का कारण बन गये और उसके बाद आपातकाल के दौरान वे गढ़वाल, कश्मीर और दिल्ली के विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी साहित्य के व्याख्याता के पद पर रहे। आपातकाल के बाद सफदर वापिस राजनैतिक तौर पर सक्रिय हो गए और १९७८ तक जनम भारत में नुक्कड़ नाटक के एक महत्वपूर्ण संगठन के रूप में उभरकर आया।
एक नाटक ‘मशीन’ को दो लाख मजदूरों की विशाल सभा के सामने आयोजित किया गया था । इसके बाद और भी बहुत से नाटक आते रहे |
जिनमे निम्र वर्गीय किसानों की समस्या और बेचैनी का दर्शाता हुआ नाटक ‘गांव से शहर तक’,
सांप्रदायिक फासीवाद को दर्शाते(हत्यारे और अपहरण भाईचारे का),
बेरोजगारी पर बना नाटक ‘तीन करोड़’,
घरेलू हिंसा पर बना नाटक ‘औरत’
और मंहगाई पर बना नाटक डीटीसी की धांधली इत्यादि प्रमुख रहे।
खुद सफदर हाशमी ने लिखा था कि जब कोई मजदूर नुक्कड़ नाटक देख रहा होता है तब वह सिर्फ भीड़ का हिस्सा नहीं होता। उसे देखते हुये जब वह हॅंसता है या तालियाँ बजाता है तो दरअसल वह एक तरह से प्रतिरोध की कार्यवाही में हिस्सा ले रहा होता है।
सफदर ने बहुत से वृत्तचित्रों और दूरदर्शन के लिए एक धारावाहिक ‘खिलती कलियों का निर्माण भी किया’। उन्होने बच्चों के लिए किताबें लिखीं, और भारतीय थिएटर की आलोचना में भी अपना योगदान दिया।उनके गीत दूरदर्शन पर बहुत प्रसिद्ध हुए जिनमे ” पड़ना लिखना सीखो ” ” किताबे ”
“ मुद्दा यह नहीं है कि नाटक कहाँ आयोजित किया जाए (नुक्कड नाटक, कला को जनता तक पंहुचाने का श्रेष्ठ माध्यम है), बल्कि मुख्य मुद्दा तो तो उस अवश्यंभावी और न सुलझने वाले विरोधाभास का है, जो कला के प्रति ‘व्यक्तिवादी बुर्जुवा दृष्टिकोण’ और ‘सामूहिक जनवादी दृष्टिकोण’ के बीच होता है।
- सफदर हाशमी, अप्रैल 1983
सफदर ने जनम के निर्देशक की भूमिका बखूबी निभाई, उनकी मृत्यु तक जनम २४ नुक्कड़ नाटकों को ४००० बार प्रदर्शित कर चुका था। इन नाटकों का प्रदर्शन मुख्यत: मजदूर बस्तियों, फैक्टरियों और वर्कशॉपों में किया गया था। सफदर हिंदुस्तान की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सदस्य थे। १९७९ में उन्होने अपनी कॉमरेड और सह नुक्कड़ कर्मी ‘मल्यश्री हाशमी’ से शादी कर ली। बाद में उन्होंने प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया और इक्रोमिक्स टाइम्स के साथ पत्रकार के रूप में काम किया, वे दिल्ली में पश्चिम बंगाल सरकार के ‘प्रेस इंफोरमेशन ऑफिसर’ के रूप में भी तैनात रहे। १९८४ में उन्होने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और खुद का पूरा समय राजनैतिक सक्रियता को समर्पित कर दिया। सफदर ने दो बेहतरीन नाटक तैयार करने में अपना सहयोग दिया, मक्सिम गोर्की के नाटक पर आधारित ‘दुश्मन’ और प्रेमचंद की कहानी ‘मोटेराम के सत्याग्रह’ पर आधारित नाटक जिसे उन्होने हबीब तनवीर के साथ १९८८ में तैयार किया था। इसके अलावा उन्होने बहुत से गीतों, एक टेलीवीज़न धारावाहिक, कविताओं, बच्चों के नाटक, और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों की अमोल विरासत हमें सौंपी। रैडिकल और पॉपुलर वामपंथी कला के प्रति अपनी कटिबद्धता के बावजूद उन्होने कभी भी इसे व्यर्थ की बौद्धिकत्ता का शिकार नहीं बनने दिया और निर्भीकतापूर्वक प्रयोगों में भी जुटे रहे।
किन्तु १ जनवरी १९८९ को जब दिल्ली से सटे साहिबाबाद के झंडापुर गांव में ग़ाज़ियाबाद नगरपालिका चुनाव के दौरान नुक्कड़ नाटक ‘हल्ला बोल’ का प्रदर्शन किया जा रहा था तभी जनम के ग्रुप पर कांग्रेस (आई) से जुड़े कुछ लोगों ने हमला कर दिया।इस हमले में सफदर बुरी तरह से जख्मी हुए। उसी रात को सिर में लगी भयानक चोटों की वजह से सफदर की मृत्यु हो गई।पर वो जिन्दा है हर गरीब के दिल मे और दो दिन बाद, ४ जनवरी १९८९ को मल्यश्री हाशमी,उनकी पत्नी जनम की टोली के साथ उस स्थान पर वापिस लौटीं और अधूरे छूट गए नाटक को खत्म किया।आज तक वहा पर उनकी याद मे लोग एक होकर उनको याद करते है | इस घटना के १४ साल बाद गाजियाबाद की एक अदालत ने १० लोगों को हत्या के मामले में आरोपी करार दिया,
सफदर ‘राज्य की तानाशाही’ के खिलाफ भारतीय वामपंथी आंदोलन के लिए एक सांस्कृतिक प्रतिरोध का प्रतीक बनकर उभरे। जनम ने दिल्ली में अपना कार्य जारी रखा। फरवरी १९८९ में भीष्म साहनी और अन्य बुद्धिजीवियों ने मिलकर ‘सफदर हाशमी मैमोरियल ट्रस्ट’(सहमत) का निर्माण किया। सफदर का संगठन जन नाट्य मंच १९८९ की उस घटना के बाद से हर बरस १ जनवरी को झंडापुर के उसी शहादत स्थल पर एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन करता है। इस कार्यक्रम की दर्शक होती है आसपास के औद्योगिक क्षेत्र के सैकड़ों मजदूरों की विशाल भीड़। इसी तरह के एक कार्यक्रम का आयोजन ‘सहमत’ भी दिल्ली के बुद्धिजीवी तबके के बीच विट्ठलभाई पटेल हाउस में करता है। आज सफदर जनवादी तबके के लिए प्रतिरोध के एक बहुत बड़े प्रतीक के रूप में जाना जाता है, बहुत से लोग, गैर सरकारी संस्थान उसकी इस विरासत का इस्तेमाल अपने निजी हित साधने में कर रहे हैं, लेकिन इस सबके बावजूद भी सफदर की अमिट ज्योति इन प्रयासों को धूमिल कर देती हैं।उनसे सबक लेकर जहाँ अपने बीच से बौद्धिक- सांस्कृतिक कर्मी तैयार करने होंगे वहीं अन्य वर्गों से आये जागृत व चेतना सम्पन्न बुद्धिजीवियों को भी स्थान, समय, सुविधा व गुँजाइश देनी होगी।यही उनको असली श्रदांजलि होंगी | अगर शासक वर्गों के लिये खतरनाक नहीं होता तो वे सफदर हाशमी को नहीं मारते। एम.एफ.हुसैन की गैलरी पर तोड़-फोड़ नहीं करते, वली दकनी की मजार को जमीदोंज नहीं करते, ईराक में बगदाद की हजारों साल पुरानी लाइब्रेरी से लेकर मुम्बई की भण्डारकर लाइब्रेरी तक को आग नहीं लगाते, बुद्ध के स्तूपों और ग्रन्थों के पीछे लाठी फावड़े लेकर नहीं दौड़ते। मनु, गौतम और शुक्र महाराजों को स्मृतियाँ और संहिताएँ नहीं लिखनी पड़ती ! अगर इस माध्यम की इतनी प्रामाणिकता व मारकता है तो इसकी हिफाजत व विस्तार आन्दोलन के लिये उतना ही जरूरी है | उनको मरने मत देना | सफ़दर अभी मत जाना भाई …..
पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो
पढ़ना-लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालो
पढ़ना-लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालो
क ख ग घ को पहचानो
अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो
अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो
ओ सड़क बनाने वालो, ओ भवन उठाने वालो
खुद अपनी किस्मत का फैसला अगर तुम्हें करना है
ओ बोझा ढोने वालो ओ रेल चलने वालो
अगर देश की बागडोर को कब्ज़े में करना है
खुद अपनी किस्मत का फैसला अगर तुम्हें करना है
ओ बोझा ढोने वालो ओ रेल चलने वालो
अगर देश की बागडोर को कब्ज़े में करना है
क ख ग घ को पहचानो
अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो
अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो
पूछो, मजदूरी की खातिर लोग भटकते क्यों हैं?
पढ़ो,तुम्हारी सूखी रोटी गिद्ध लपकते क्यों हैं?
पूछो, माँ-बहनों पर यों बदमाश झपटते क्यों हैं?
पढ़ो,तुम्हारी मेहनत का फल सेठ गटकते क्यों हैं?
पढ़ो, लिखा है दीवारों पर मेहनतकश का नारा
पढ़ो, पोस्टर क्या कहता है, वो भी दोस्त तुम्हारा
पढ़ो, अगर अंधे विश्वासों से पाना छुटकारा
पढ़ो, किताबें कहती हैं – सारा संसार तुम्हारा
पढ़ो, कि हर मेहनतकश को उसका हक दिलवाना है
पढ़ो, अगर इस देश को अपने ढंग से चलवाना है
पढ़ो,तुम्हारी सूखी रोटी गिद्ध लपकते क्यों हैं?
पूछो, माँ-बहनों पर यों बदमाश झपटते क्यों हैं?
पढ़ो,तुम्हारी मेहनत का फल सेठ गटकते क्यों हैं?
पढ़ो, लिखा है दीवारों पर मेहनतकश का नारा
पढ़ो, पोस्टर क्या कहता है, वो भी दोस्त तुम्हारा
पढ़ो, अगर अंधे विश्वासों से पाना छुटकारा
पढ़ो, किताबें कहती हैं – सारा संसार तुम्हारा
पढ़ो, कि हर मेहनतकश को उसका हक दिलवाना है
पढ़ो, अगर इस देश को अपने ढंग से चलवाना है
क ख ग घ को पहचानो
अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो
उनको लाल सलाम !
अलिफ़ को पढ़ना सीखो
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो
उनको लाल सलाम !
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