भारत के आम नागरिक इतिहासिक रूप से गरीब रहे है |इसलिए आज भी आजीविका के रूप मे मिली सरकारी नोकरी हो या कोई अन्य सावर्जनिक पद , वे उस को हर प्रकार से अपने फायदों के लिए अधिकतम और सम्पूर्ण उपभोग करने के विशेष प्रवत्ति रखते है | और सेवा भाव के स्थान पर मेवा भाव आ जाने के कारण लापरवाही और भारस्ताचार का बोलबाला चारो और है |मिड डे मील जैसे कार्यक्रम शिक्षा देने और शिक्षित करने मे कितने सफल है ये तो बक्त बतायेंगा, पर एसी योजनायो से कितने सलंग्न लोगो के लेट नाईट डिनर बन रहे है यह सोच का विषय है !जिसका खामियाजा इन मासूमो को अनचाये भुगतना पड़ा | दुःख तो यह है की योजना की कमियों , बच्चो की मौत से जाएदा जरुरी वोटो की राजनीती हो गयी है |उसी के लिए सारी कवायत होती दिख रही है !
Thursday, July 25, 2013
लेट नाईट डिनर
भारत के आम नागरिक इतिहासिक रूप से गरीब रहे है |इसलिए आज भी आजीविका के रूप मे मिली सरकारी नोकरी हो या कोई अन्य सावर्जनिक पद , वे उस को हर प्रकार से अपने फायदों के लिए अधिकतम और सम्पूर्ण उपभोग करने के विशेष प्रवत्ति रखते है | और सेवा भाव के स्थान पर मेवा भाव आ जाने के कारण लापरवाही और भारस्ताचार का बोलबाला चारो और है |मिड डे मील जैसे कार्यक्रम शिक्षा देने और शिक्षित करने मे कितने सफल है ये तो बक्त बतायेंगा, पर एसी योजनायो से कितने सलंग्न लोगो के लेट नाईट डिनर बन रहे है यह सोच का विषय है !जिसका खामियाजा इन मासूमो को अनचाये भुगतना पड़ा | दुःख तो यह है की योजना की कमियों , बच्चो की मौत से जाएदा जरुरी वोटो की राजनीती हो गयी है |उसी के लिए सारी कवायत होती दिख रही है !
Tuesday, July 16, 2013
भारत भाग्य विधाता .....
बास्तव मे भारत की वर्तमान राजनीती बड़े उधोग मे बदल गयी है ! जिसका लक्ष्य असीम धन और शक्ति है और हर दल अपनी कम्पनी को अलग ब्रांड नेम से चला रहा है |
कोई समाजवाद के नाम राजनीती शुरू करके अब पर परिवार वाद चला रहा है तो कोई दलित उत्थान के नारे को बेच कर स्मारक बना, पैसा कम रहे है| तो कोई मन्दिर - मस्जिद पकड कर अभी तक बेठा है |तो कोई बंश वाद के सहारे सत्तासीन है |हर राज्य से लेकर केंद्र मे ये लोकतंत्र के सत्ताहड़प राजा अपनी कंपनी चला रहे है पर लक्ष्य सबका एक ही है वो है येन -केन- प्रकरण सत्ता पर कब्ज़ा करना असीम धन- सत्ता सुख के सागर मे डुबकी लगाना | इनके परिवार तो क्या इनके दूर -दूर के रिश्तेदार भी इनकी बाटी रेवड़ीया खाते है | पर दोष कही न कही इनके जूठे नारों के सुनहरे जाल मे फस कर , तडपते लोगो का है| जो इन्हे सिर आँखों पर बिठाते है |और कभी धर्म तो कभी जाति तो कभी भाषा के विज्ञापन से भाबुक और मजबूर होकर इनको फिर मजबूत बनाते है
कोई समाजवाद के नाम राजनीती शुरू करके अब पर परिवार वाद चला रहा है तो कोई दलित उत्थान के नारे को बेच कर स्मारक बना, पैसा कम रहे है| तो कोई मन्दिर - मस्जिद पकड कर अभी तक बेठा है |तो कोई बंश वाद के सहारे सत्तासीन है |हर राज्य से लेकर केंद्र मे ये लोकतंत्र के सत्ताहड़प राजा अपनी कंपनी चला रहे है पर लक्ष्य सबका एक ही है वो है येन -केन- प्रकरण सत्ता पर कब्ज़ा करना असीम धन- सत्ता सुख के सागर मे डुबकी लगाना | इनके परिवार तो क्या इनके दूर -दूर के रिश्तेदार भी इनकी बाटी रेवड़ीया खाते है | पर दोष कही न कही इनके जूठे नारों के सुनहरे जाल मे फस कर , तडपते लोगो का है| जो इन्हे सिर आँखों पर बिठाते है |और कभी धर्म तो कभी जाति तो कभी भाषा के विज्ञापन से भाबुक और मजबूर होकर इनको फिर मजबूत बनाते है
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