Friday, June 29, 2012

आजाद लड़की !

                                                                         कहानी .
             
                                                       आजाद लड़की ! भाग - 1

        ये कहानी भी आपको असली सी  लगेगी ,यही आपकी जर्रानावाजी होंगी ।

ख़ुशी ,यही तो नाम है उसका जो हमारे सरकारी आवास परिसर में रहने आई है।किसी छोटे कस्बे  से , पर देखने में मेट्रो गर्ल थी । यु तो तो मात्र वो कुछ माह  के लिये प्रशिक्षण के लिए ही आई है हमारे सिचाई बिभाग में ,पर सहाब क्या खूब आई है ? मानो गर्मियों के मौसम में भी गार्डन रंगीन हो गया हो फूलो से ...
अब फूल खिला है ।तो भवरे तो आयेंगे ही . बहुत दिनों से खाली  जो थे .15 से 75 साल वाली  उम्र के हर पद /जाति /धर्म /काले -सफ़ेद /कमजोर /ताकतवर /विधुर /विवहित /सफल/ असफल /S .C /S ,T /O .B .C बिना किसी भेद -भाव के नये -नये से लग रहे थे ,सबको पता था मुकबला बड़ा मुश्किल है ..".ये सा... लड़के बड़े बेकार है सहाब !;
कुछ कम नही है ।बस खाली घूमते  रहते है अपनी मोटर साईकिल पर ,हर बुड्ढा  दीवाना यही सोच रहा था इन लडको को कालोनी से बहार होना था । (जबकी उनकी अपनी कन्याए बहार ही घुमती  रहती थी  )?
कुछ युवा बूढ़े तो अपने ही सुपुत्रों से चिढ़े हुए थे ,अपने नये कपडे देने बंद कर दिए सा ........ आवारा हो गया है कह  कर।
उधर परिसर के सभी जवान  लड़के भी नहा धोकर अपनी ,मांगी हुई  bikes पर चक्कर लगा रहे थे .पर वो सब बचपन से ही एक दल में  रहे थे ।
bikes /"विशेष किताबे /क्रिकेट बेट /G .F / खाली कमरा /पॉकेट मनी /सिगरेट /दारू /जींस /खाना सब एक साथ ही प्रयोग करते थे ।कद्दू कटेगा सब में बटेगा , टाइप कांट्रेक्ट था उनका ।
सबसे बड़े काले  कुत्ते तो वो थे ,जो किसी कद्दू को खा नही पा  रहे थे ,उनकी अपनी बीबी /या माता जी जेम्स बोंड की दादी जो थी ? या वो भी आजाद थे ,।

अचानक आवास परिसर में सुनामी आ गयी ,हर कोई तबहा हो गया था हुआ ये की बसंत पंचमी के दिन किसी हुए प्रोग्रम्म में ,एक -  काले कुते बाले दल के  मुखिया ने ख़ुशी को कुछ बोल दिया पर, छेड़ा नही था !जब वो , कुछ उम्र को धोका देती माताजी टाइप महिलायों के साथ MARRY -GO -ROUND खेल रही थी ।पर बोला क्या था ?शायद  उसे भी नही पता है .अगले ही दिन लिखित मै शिकायत कार्यालय में आ गयी।पर उस दिन एक बड़ी उम्र के सहयोगी भी जोर जोर से चिल्ला रहे थे माताजी टाइप पर , उनकी किसे ने सिकायत न की  क्यों ?साथ ही  ख्स्बू के अधिकारी महोदय, ललवानी सहाब  भी बहुत लाल -पीले हुये प्रसासनिक अधिकारी पर ।इस मुद्दे पर ।
6-7 लडको / पुरुषो  के नाम थे। कुछ तो एसे नाम थे जो  लोग उस दिन शहर में ही नही थे ,और कुछ तो उस इलाके में पैदा ही नही हुये अभी तक । अरे  हम गरीबो के नाम तो बस भगवान  ही जानता है दुःख देने को   ।इसलिए मामला उलझ गया । किस को किस अपराध में क्या सजा दे ? मामला द्वा  दे या सजा - ए - मौत दे डाले , फिर बड़े लोगो ने समझाने के नाम ,पर उसके साथ चाय -पानी की और PROBATION में चल रहे तीन चार  नये लोगो को बुला कर पहले डाटा फिर माफ़ी मंगवा दी, और उनमे  जो लोग बहा पर थे भी नही।  उन्हें भी मांगनी  पड़ी मज़बूरी में !  ।अगर किसी PERMANENT  कर्मचारी  से कहते  तो चपरासी भी माफ़ी न मांगता । यूनियन बाले भी हंगामा कर  डालते बात उपर तक जाती  ! साम-दाम-दंड-भेद के बिना कहा  कोई  अफसर बना रहे सकता है ?राज्य सरकार  में  ? तो मामला ठीक से बेठा  दिया गया  ।सब अफसर  खुश हो गए,  मानो  सरकार ने महगाई को काबू कर लिया हो। विदेश से काला धन बापस ले आये हो !

अब लड़की अपने को हिलेरी क्लिंटन जितनी ताकतवर समजने लगी थी ,सारे शहोदे डर गए थे ,ऐसे घूम रहे थे जैसे  कुत्तो को रेबीज  हो गयी हो, ये हालत थी उनकी । उधर अफसर हालचाल पूछते थे , कोई सलेब्रेटी हो जैसे !आमजन उसके चरित्र पर जीवनी लिखने लगे थे। पर पता नही क्यों हर सुख के बाद दुःख ! अच्छाई के बाद बुराई क्यों मिलती है ?
सभी काले कुत्तो ने अपने विशेष स्थान पर अति गोपनीय मिटिंग बुलाई !जिसमे वो ही लोग बुलाये गए थे। जो  मर्दों की इज्ज़त के लिए जान  पर भी खेल जाये !पर कोई हल न निकला ..............
पर अचानक 14 feb के महान  फेस्टिवल पर ,अरे ! अपना valentine  day !ख़ुशी की सारी खुशी पर पानी पड़ गया !
और पिटे हुए मोहरों को चेक के बिना ही मेट देने की चाल मिल गयी ।
ऐसा  क्या हुआ  यू। तो वेलेंटाइन  पर किसी को टाइम नही होता पर जो लोग दुसरो को देख कर रोते है। उन पर टाइम की कमी नही होती।बैठे  थे कुछ दिलजले 8pm के साथ ,तभी ख़बरी ने आकर लाखो की खबर दी की "खुशबू के साथ कोई बहार का लड़का है और दोनों कालोनी में अकेले है !घर जा रहे है ।
सुनते ही नशा चड़ने लगा ,तुरंत योजना बनी ,सबकी सहमति फ़ोन पर ले ली गयी ।

फील्डिंग  लगा दी गयी ,युवराज सिंह जैसे  अच्छे फिल्डर मेन  गेट कालोनी गार्ड के साथ और बेदम फील्डर मनिंदर जैसे उसके घर पर दूरबीन लगा कर, सिगरेट जला कर बेठेगे ।हर हालत में सबको 10.30 पर रूम पर मिलना था  रात को 10 बजे गेट बंद होना है विजिटर के लिए   ,दुआ सब यही कर  रहे थे की वो चला न  जाये !उसे जाना भी कहा  था ?सो वो न गया , मोका ही ऐसा  था , फिर क्या हुआ ? अंदर क्या हुआ ये तो पता नही पर बहार फरबरी के महा में भी गर्मी कड़ी थी सारा प्लान तेयार था पर कुछ लोग ये जता  रहे थे की कुछ नही होंगा उसका , कोई और फाएदा उड़ा लेंगा , चलो छोड़ो मरने दो जो करते है करने दो !फिर रात को 11 बजे सुरक्षा बल को बता दिया गया की परिसर का महोल गन्दा हो रहा है ।बच्चे बि ग ड़ रहे है।( ये बही बच्चे है जो बचपन से सलमान खान  है )आदि आदि ।

तुरंत कार्यवाही हुई सुरक्षा दल के सब लोग छापा मारने को पहुच गए मानो  इसी काम के लिए खाली  बेठे थे ।बैसे भारत में हर आदमी इस टाइप के  काम को खाली  रहेता है ।
बस सहाब ! मकान को चारो तरफ से घेरे में ले लिया गया। मानो अंदर लादेन टाइप कोई पाकिस्तान में  हो !गलती ये हुई की गार्ड के  साथ में कोई महिला नही थी ।बैसे आमतोर पर महिला गार्ड होती कहा  है ? अगर होती , तो कोई गार्ड  बहा  नही होता रात  को 11 बजे !पर उन्हें तो डर  था की मामला बड़े सहाब  तक न पहुच जाये ।
कुछ तो करना ही था ।पर मामला लड़की का था तो सोच समझ कर करना था जो करना था पर करे क्या ? दिलजले अपनी सासे बस सिगरेट पीने के लिए ही ले पा  रहे थे बाकि समय सासे  रुकी  थी उनका मोर्चा बिलकुल सही जगह पर था सब साफ - साफ देखाई  दे रहा था .टाइम ओर  कोहरा बढता जा रहा था ठण्ड तो जवानों को लगती नही है न फिर बोतले भी थी ही ।
 काफी देर तक कुछ न हुआ। फिर दो गार्ड़ हिम्मत करके आगे बढे और दरवाजा खुलवाया तथा पांच मिनट तक बात चीत की , कमरे की लाइट बंद थी . अचानक सब लोग अन्दर चले गए  और लाइट जल गयी और पन्द्र मिनट बात खाली  हाथ वापस आ गए ।  और अपनी गश्त पर निकल गए ।पर गश्त बार बार उसी स्थान पर लागते  रहे । दिलजलो का तन और मन दोनों जल गए । मोर्चे से बहार निकलने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी। उस रात सभी को वहीँ पर रहना पड़ा सिगरते और दो बोतल माँगा ली गयी खाने की बात भूल ही गए पूरी रात एक दुसरे को योजना की विफलता पर दोष देकर काटी सबसे बड़ा दुःख तो इस बात का था कि  valentine  मानाने से खुशबू को रोक नहीं पाए।|ये सबने देखा की  पर पूरी रात उसकी लाइट बंद ही रही थी ।बाद में पता चला की वो रेस्ट रूम में छिप गया था ।

 मनहूस सुबह, खुशखबरी लेकर, गुलाबी बनकर  आई। जबकि सभी लोग अँधेरे में ही अपने मुह छिपा कर  अपने अपने घर चले गए थे। योजना सफल रही थी परन्तु दुसरे तरीके से , सुबह पांच बजे ही खुशबू के मोबाइल से बॉस पर फ़ोन आया और उसने अपने valentine को आवास परिसर से बहार निकलने के लिए रोना धोना  किया , मांफी मांगी  और "मैं अभी तुमसे  मिलने को तैयार हूँ कह कर हथियार  डाल दिए । सभी के दिमाग के fuse उड़ गए । तत्काल में कबिनेट की बैठक बुलाई गयी गहन बाते हुई । जिसमे फिर वही गलती करी गयी जो हर गरीब करता है अपने को मिले मोके पर ! दया और माफ़ी । और valentine  महोदय को खुद अपनी गाडी में बिठा कर बहार तक छोड़ दिया गया।अगले ही दिन ,लिखित मै माफ़ी सहित पुराना आरोप बापस ले लिया खुशबू ने  ।बिल्ली के भाग से कुछ बंदर लोगो का छिका टूट ही गया ........उस बारे में कहानी के भाग - 2 में जरुर पड़े  ..........................अगर आप लोग इस पर अपनी राय  दे तो कहानी मे भाग 2 लिखने में मज़ा आजाये ........... अमन 


Thursday, June 28, 2012

चुनाव ! हा!

चुनाव ! हा!
 मेरे मेरठ में 24 /06/2012 को बार्ड और नगर प्रमुख के चुनाव हो रहे थे ,प्रजातंत्र में ये मेले कभी कभी लगते है ,जिसमे दुकानदार अपनी दुकान में जूठे बादों का सामान  दिखा कर , पैसे से भी जाएदा कीमती वोट कमा लेते है ओर फिर वो हमारे मालिक ,भागवान बन जाते है ।ओर हम भिखारी ,फिर भी मज़ा आता है एन सब खेलो में ।हमारे बार्ड में पुराने विजेता शर्माजी और नए खिलाडी तेवतिया जी मैदान में प्रमुख थे ,पर बीजेपी पार्टी के पक्के वोटो ,और अपनी जाति  संख्या के दम पर त्यागी जी भी जीत के आकडे लगा रहे थे ।
चुनाव में यही तो खास बात होती है एक जीत से पहेले सब जीतते है ,चमचे जैसे नेता जी को जीत के आकडे बताते है उन के दम पर नेता जी फूलकर कुप्पा रहेते है ,जमीनी हकीकत जानने बाले नेता अब कहा  मिलते है ?और आखिर के समय तक कुछ भी तो पता नही चलता , गरीब भी अब तेज हो गए है ,पीते सब की है ,वोट
उसे ही देते है जहा उनका दिल करता है .ओर् देते भी जरुर है .चाहे खाने को रोटी न मिले ! पूरे 5 साल तक ...
हमारे बार्ड की दशा भी हिंदुस्तान की असली तस्वीर को दिखाती है जहां एक तरफ करोर्पति , अरबपति का ऐशगाह है वही दूसरी तरफ इतने गरीब है  की खाने को भी न मिले बीच में समाजवादी  मध्य वर्ग आवास कालोनी है इसलिए चुनाव लड़ना महाभारत जितना मुश्किल है

हमारे एक प्रत्याशी पूंजीवादी वर्ग से हैं तो एक बहुत गरीब, लेकिंन गरीबो में आत्म सम्मान ज्यादा होता है और गरीबी अपने आप में एक जाति है इसलिए उसके जीतने की संभावना ज्यदा थी

चुनाव के दिन सुबह ही गरीब प्रत्याशी के पोलिंग एजेंट बहुत व्यस्त थे जबकि अमीरों के पास वोट डालने का समय नहीं था उनके लिए ये दिन छुट्टी का था जिस कारण  अधिकतर लोग घुमने निकल गए थे

दो तीन घंटो बाद पूंजीवादी प्रत्याशियों ने पैसो का रंग दिखाना शुरू किया और गरीबों के जवान लडको को अपने इशारो पे नाचने लगे जिससे उनकी भी हवा बनने लगी  जो युवा कालेज राजनीती से शुरुआत करके ऊपर बढ़ना चाहते थे वो सब बूथ एजेंट बन गए थे और जिनका रेट 1500 रुपए प्रतिदिन पार्टी द्वारा निश्चित किया गया .   अपना मोहित भी अब बड़ा हो गया है ,है तो बीजेपी में पर वोट अपनी जाती के नेता को देने के लिए बोलरहा है ।मेरठ शहर की यही खास बात है चुनाव के दिन 12 बजे तक कुछ एसे  अखवार बट दिए जाते है जिनको पहेले कभी नही देखा होंगा ? खबर\बही की मुस्लिम वोट एक ही जगह पड़  रहे है 90% तक वोटिंग हो रही है ... आदि आदि पर सब जूठ  होता है ,                   

पर अब अगर मतदान को जरुरी न बनाया गया तो लोकतंत्र पर खतरा हो रहा है ।मतादेश का हरण हो रहा है ।
10-15 प्रतिशत से चुनाव जीते जा रहे है ..टीवी / अखवार के अभियान कारगर नही रहे ।
सरकार पर ही भरोसा नही तो वोट देकर ही क्या होंगा ।अब या तो 50 साल से उपर के लोग या 18-25 तक के युवा ही मतदान करते है ।उनमे भी तथाकथित आधुनिक युवा लडकिय तो .......what  is this  nonsence ? what  is the use of my vote ?कहकर जोर से हस कर लोकतंत्र को चुनोती देती है ।
kya  होगा अब ????/

Friday, June 22, 2012

गर्मी

दोस्तों !
            बहुत  गर्मी हो रही है आजकल , मानसून अभी भी पश्चमी उत्तर प्रदेश से रुठा   है !बिजली तो आती ही नही ! आये भी तो . क्या गरीब पंखा ही तो चला पाता  है , वो तो हाथो बाले पंखो  से ही काम चला लेता है पर आमीर  को  जनरेटर  का सहारा है अपने कूलर और A .C के लिए ?और एस गर्मी में  चुनाव ? एक तो करेला उपर से नीमचढ़ा , दिनाक 24/06/2012 को नगर निगम एवम नगरप्रमुख के चुनाव होने थे ।में  वोट डालने के लिए 23 को ही चला सुबह 6.30 के बस मै रूडकी से मेरठ के लिए !
 ,ये चुनावी  मेला यु तो 5 सालो में ही  लगता है पर अब तो हर दो सालो में  कोई न कोई सा इलेक्शन होता ही है ।बस चल पड़ी काफी तेज गति से , पर मंगलौर में अचानक एक मुल्ला जी बस से उतरे और मोबाइल पर जोर जोर से बोलने लगे .बस रुक गयी थी ।लगभग 5 मिनट तक यही होता रहा , लोगो ने पुछा  तो परिचालक बोला इनकी सबारी आ रही है उनका टिकट लिया है ।एक भाई बोला मुझे रेल का टिकट दिलवादे में  रेल घर तक ले जाऊंगा ।अभी तक सब हस रहे थे ,पर एक तकड़ा,( लड़के से कुछ जायदा ,आदमी से कुछ कम )पुरुष जिसे सन्नी देयोल  का U .P . रूपांतरण  कहना  उचित होंगा ,5.10" की लम्बाई  . तकड़ा सरीर , ढाडी . और सर पर टोपी सब कुछ था सन्नी भाई जैसा  , उठकर जोर जोर से लड़ने लगा ।परिचालक को धक्का लगा वो नीचे गिर गया ।
बस खड़ी  थी, में  चुप था ,बात बड  गई ,स्त्रीलिंग सूचक सब्दो का प्रयोग होने लगा !जोह्नी लीवर टाएप  चालक भी आया और मारपीट मे उतारू  होने लगा पर उस पुरुस को देखकर चुप रह गया शायद डर  गया  ।उसने दोनों को पीछे दकेल दिया कुछ  लोग  समझाने लगे , कुछ चुप  थे  ,में  भी चुप था ।उसका कोई रिश्तेदार हॉस्पिटल में  था तो जल्दी थी ...परिचालक बोला। थाने  चलो ! इसने कैश लूटा है मेरा !( पर आत्मविश्वास नही था ) उसने अपना सबसे बड़ा हथियार चला दिया ।पर सन्नी पर कोई फर्क नही पड़ा ।सबको लगा देर हो सकती है ,एसलिये  सब लोग  दोनों तरफ समजाने  लगे,अब मुल्ला जी के परिजन भी आ गये , बस चल पढ़ी पर गति आधी रह गयी ।चालक अपनी पिटाई का बदला अपने तरीके से ले रहा था ।मुझे लगा गरीबो में अपनी अलग ताकत होती है बस प्रयोग करने की बात है जो चालक ने बस चलाने में दिखा दी है ।बस मंसूरपुर मै  आई तो सन्नी  उतरने को बहार निकल कर  आया ।
पता नही क्यों ? अब में बोला कोन  बीमार है ? वो चकित रह गया ,और में भी चकित था बोल कर ।वो  हडबडा कर  बोला ताऊ जी ? सबने मुझे देखा ,मुझे देखा मानो  किसी आतकवादी से बात कर रहा हु।  और मुझे लगा की चालक -परिचालक और सन्नी
इन  सबका मवाद का रिसना जरुरी है ,नही तो नासूर बना रहँगा ,जिन्दगी भर ,और.......पर  दोनों फिर लड़ने लगे ।पर अब मेने दोनों को डाट दिया ! और भाषण की घुट्टी पीलाने लगा , सही बक्त पर चोट की थी मेने ।फिर सन्नी उतर गया ।मुझे पता था अगर एस लड़ाई में संन्नी  की पिटाई होती तो इसी रस्ते मे 5-10 लड़के जरुर मिलते जो उसका बादला  तत्काल सेवा में लेते ।बस के शीशे टूटते ! हमें दूसरी बस में जाना पड़ता ,पर अच्छा हुआ जो ऐसा न हुआ ,उसके जाने पर मैंने कंडक्टर को डराया ,की एक रूपये के लिए कैसे एक बूढ़े  शरीफ आदमी ने फ़ोन पर ,लड़के बुला कर कंडक्टर की पिटाई करवाई थी । रोडवेज़ के सामने मुजफरनगर में , कोई यूनियन काम  न आई ।सब चुप रहे ! मेरी इज्ज़त बड  गयी । रोब जम गया ।सबको इस इलाके के खेती ओर पैदावार के इतिहास  की जानकारी जो थी ।
अब बस ढाबे पर रुकी तो कंडक्टर ने मुझे चाय के लिए कहा !" धन्यबाद कह  कर में  बुक्स देखने लगा ।
                        गर्मी मोसम में  कम  दिमाग में जायदा रहती है !

                                                   WAR BEGIN IN THE BRAIN OF THE MEN 



Tuesday, June 19, 2012

....सिर कटा भूत !

आज ,
      फिर आपके सामने एक सच्ची घटना लेकर आया हु !जिस पर  विश्वास करना या न करना आपकी इच्छा पर है ।कुछ पुरानी  बात है जब में छोटा बच्चा था, बड़ी शरारत करता था, मेरी चोरी पकड़ी नही जाती! न रोशन होता बजाज !लगभग 10-15 लडको का दल था| जो गर्मियों की छुट्टियों में  टाइम पास करने पास के बाग़ में या नये बनते मकानों में eye- spy  खेलते थे| जिसे लुक्का छिपी भी कहते  है ।ये वो दौर था, जब हर लड़का सम्यबादी होता था ।जैसे हर गरीब दिल से सम्याबादी /समाजबादी  होता है .अमीर होने पर उनसे नफरत करता है,नीचा समजता है ।
उस दिन बहुत सारे कच्चे आम ,नाशपाती , लीची और घर से नमक लाकर दावत हो रही थी। एक बड़ी बनती  पूँजीवादी की कोठी ,में सारे फल चोरी -सीनाजोरी से लाये गए थे ।कुछ लड़के बाहर को घूम रहे थे ।घर का प्रयोग उसी प्रकार कर रहे थे मानो सब कुछ तैयार हो ..जैसे शोचालय ! रसोई ! स्टोर !हमने खाने पीने की चीजे रसोई मै हो रखी थी ।
उस दिन पता चला की एक दिन पहले ही मकान मालिक हमारी हरकतों पर ,हवा मै गालिया  दाग रहा था ।गुस्से में नीला -पीला (लाल -पीले से खतरनाक )होकर गया था ।हम भी तैय्यारी से थे ,अच्छा ही था अमीरों से लड़ने का कोई मोका हम छोड़ते कहा थे ?
अचानक !....हमें लगा कोई आया है हमने बहार के आवाजो को सुना तो सब शांत था। बहार के लड़के भाग गए लगता है ....डरपोक  ... राजू फुसफुसाया !अंदर 6-7 लोग थे .अब हमें दुश्मन की ताकत का अंदाजा लगाना जरुरी था। तभी हमला हों !तब हाकी आज की पिस्तोल से भी अधिक खतरनाक होती थी। हम पर 5 -5 थी !रखनी पड़ती है भाई ! वो मेरठ शहर है ....
 उसे देखने हम चुप चाप साइड की गैलरी से बहार को सरके .........पर बड़ी खिड़की के पास पहुचकर हमने इशारा किया और अंदर झाक कर देखा ........फिर कुछ नही देखा .......सारे लड़ाके  जमीन पर गीर  गए !
वो क्या था ??????? कोई आपस में कुछ न बोल पाया। जमीन पर सरक कर बहार निकले घर तक कोई न कुछ बोला .......कुछ लड़ाके रो भी रहे थे पर जादातर गम थे  ।आपको पता है बहा हमने क्या देखा ?
वो हवा में उड़ता, एक कटा, एक बड़ा सा  सिर  था ? जिसके आँखे बड़ी-बड़ी थी ? बाल रस्सियों के जैसे थे मुह लाल हुआ था कुछ -कुछ शेर  जैसे था ? आज भी हम हनुमान भक्त ये सोचते है की अगर उसने हमें देखा होता तो क्या हुआ होता ?और जब हम सब मेरे घर पहुचे तो  हमारी हालत देख कर , सब परेशान हो गए , पूरा मोहल्ला जमा हो गया था ।कुछ वरिष्ठ लड़ाके  इक्कठे होके भा गए तो  बहा कुछ न था ।पर कहा  जाता है. बाग ,जंगल और सुनसान मे ही भूत होते है   ।
एस घटना से पहले जब कोई भूत की कहानी  सुनाता, तो में  सबसे पहले  हसता  था ।अपने को पड़ा लिखा मानता था ।अब में वो पढाई करता हु जिसमे सब सच्ची  कहानीया होती है..... भूत ,जिन्न, देवता, डायन, परी पर सबसे उपर है हमारे हनुमान जी अब भूतो से डर नही लगता .......अरे ! वो तो हवा है हम शरीर के साथ है ।

डर का नाम ही  तो भूत है !अगर कोई भूत इस  बलोंग  को पढ़े तो मुझसे कभी भी , सम्पर्क  करे ....सिर कटा भूत !को ये  सुविधा नही है ।  सॉरी !

Monday, June 18, 2012

गर्मी की छुट्टिया !

गर्मी की छुट्टिया !
बच्चो ही नही ,बड़ो को भी बहुत  राहत देती है ।पापा जी को अब स्कूल छोड़ने नही जाना , मम्मी को जल्दी उठकर ब्रेकफास्ट के साथ लंच नही बनाना , ड्रेस ,जूते , P .T .M . का जंजाल भी अब नही ,रोज़ जाने का तनाव ,लेट होने के समस्या रोज़ रोज़ की जिख -जीख लड़ाई - जगड़े अब चलो कही  चलते है जहा दिल को अच्छा लगे , या तो खी घुमने, या अपने परिवार के पास, अपनों के पास ,
नानी के घर के मज़े आज भी याद आते  है हमे , दादी-दादा , बुआ- फूफा ,मौसा मौसी  चाचा चाची  ताऊ जी - ताई जी  सब से मिलना , हसने रोने याद करने ,शादी बर्वादी सब की बाते हो जाती है ,सबकी सहूलियत  बलि तारीखे तय  हो जाती है ।

हमारी भी बहन घर पर आई ,थोरी मोटी है , पता नही क्यों ?शादी के कुछ टाइम बाद बहन मोटी  क्यों हो जाती है? या जितनी भी मोटी महिलाये है ,वो किसी न किसी भाई  की बहन है ,ऐसे  ही मौसा जी भी मोटे होते है , मेरे हो या किसी बच्चे के ,जीजा जी सबके पतले ही होते है ( क्या मोटे लोग किसी  के जीजा नही होते?
कभी कभी लगता है मंटो सहाब बोल रहे है में  लिख नही रहा, उनकी किसी रचना को पड़ रहा हु । )पर हम भी तो मेहमान ही थे मम्मी के घर ,क्योकि 6 सालो से बाहर  ही रहते है ।
भी पुराने तरीके , कभी ताई जी छोले भटूरे बना रहे होती है तो कभी छोटी चाची ब्रेकफास्ट  बेर्गेर। बच्चे किताबे जरुर ले जाते है ,ये होलीडे  होमवर्क क्या होता है जी ? खोलते कभी नही, अगर कुछ बोला तो अम्मा जी, बाबाजी होते ही है ।काश ! हम भी छोटे हो जाये ! और किसी बड़े के आचल में छुप  जाये ! और मांगने पर आपनो से सब कुछ जरूरत से जाए दा  मिल जाये !
पर यारो इस  बार गर्मी बहुत  है। सबके साथ गोल मार्किट जाकर डोसा , पस्ट्री केक का छोटा चेतन  ,चोवमिन ( भारतीय चाट के स्वाद बाली ) मोमोस  (ये क्या होते है? बस सुना ही है, बच्चो के मुख  से,ये   अमृत , अभी तक मुझ  जैसे मनुष्य को नही मिला  ) पेटिस - समोसा , इनमे मेल नही पर आलू खाने के वेदेशी - देशी तरीके है ,30 साल से निचे बाले लोगो के लिए पेटिश सास  उसके बाद बाले समोषा चटनी के साथ , आदि आदि ।खाने थे पर ये सरीर के दुश्मन बहार की गर्मी पर भरी पड़े !
  अब   खूब खाने के दिन खा रहे ?अब तो खाना पचाने के लिए भी योजना बनानी पड़ती है ।.........
पर स्कूल बालो ने छुट्टिया कम कर दी है ।उनको भी पता है की न अब जाने का टाइम है न न आने बाले को रखने का दिल ! न हम जाये , न तुम आओ , शादी -विवहा एक दिन में  निबटाओ !
नाना जी नानी जी को खुद अपने घर में कोई नही पूछ  रहा बेटी को क्या कहे ?
दादा जी- दादी जी जिस भाई के पास है वो ही परेशान है रोता रहेता है ?


Thursday, June 14, 2012

माँ मुसकरा रही थी |


माँ !
       जब माँ थी, तब बड़ी बोझ लगती थी ,उसकी बीबी को,बड़े होते बच्चो को ,खुद उसको भी हर बार गुस्सा आ ही जाता था जब भी किसी  की गलती होती, लड़ाई माँ से ही होती थी ।
अरे  वो कहा,?  किसी पर  बोझ थी ? उसके पापा जी की पेन्सन से ही, घर का दूध , बिजली बिल ,अख़बार .राशन बच्चों  का ज़ेब  खर्च  तो पापा जी के टाइम से ही आ रहा था ।जिस पर सबका बराबर  हक था ।पर माँ को सब ही अवांछित मानते रहे थे ।
पर माँ का क्या हक था ? ये कभी न सोचा गया ।जिन्दगी यू ही ही चलती गयी ..............
और एक दिन माँ भी आज़ाद हो गयी ......पर खर्चा बड़ा गयी ,उनका पुराना घर था सो एक कमरे में  उनका पुराना सामान बंद करके, बाकि किराये पर दे दिया गया ।पेंसन जो बंद हो गयी थी ।
।उस सामान में  माँ की तस्वीर थी ।जो  उसकी  शादी से पहले बड़ी ममतामयी ,तेजोमय दिखती रही ।
शादी के बाद अचानक तस्वीर मे  माँ का चेहरा ,धूमिल हो गया था ।साफ़  करने पर ,कुछ दुखी पन का भाव लगने लगा था ।
आज माँ के जाने के 20 साल बाद ,जब उसके सुपुत्र ने उसे घर से निकला तो , रहने के लिये भी यही तो कमरा बचा था , पुत्र के बंगले में, वो नोकरों  के माँ -बाप जैसे लगते थे  , जिनकी जगह घरो में नही होती ।ओल्ड होम में होती है ।
कमरे को साफ करने में , माँ के  बही पुरानी  तस्वीर मिली .....पर ! माँ तस्वीर मे  मुसकरा  रही थी !पहली  बार ............पर वो रो रहा था ।

Wednesday, June 13, 2012

और एक तालाब मर गया ,,,,,

दोस्तों , नमस्कार ,
                        आज मै  आपसे 4 दिनों के बाद बाते कर रहा हु ! में  अपने  घर गया था ।एस बार रूरकी से 22 km  मु . नगर रोड पर एक छोटी सी  जगह है , पुरकाजी , जो आजकल  रोज़ लगने बाले लम्बे- लम्बे जाम  के लिए जाना जाता है , वैसे  तो एक कारन और भी है बहा  की चाट , बड़ी सु -सुवाद होती है ,आगरा के पंछी की पेठे  की मिठाई , दिल्ही में नाथू , कानपूर के ठग्गू ,मेरठ bypass पर पंडित जी का ढाबा ,मोदीनगर मे  जैन  शिकंजी ,की तरहा यहा  गुप्ताजी famous है पर 10-15 गुप्ता  जी तो  है  ही !पर   कोन  कहे कि  असली कोन ?
पर जाम  इतना जानलेवा होता है की मसूरी और देहरादून जाने बाले लोगो ने अब  अपना रास्ता बदल लिया है !
पर भारत माँ के सपूत, चाहे कही  भी हो ?पर एक बार हरिद्वार मे , गंगा माँ के पास  जरुर आते है ?मुस्लिम भाई भी पिरान  कलियर सहाब के दर पर  जियारत करने जाते है जो रूरकी के पास है  ,कुछ देशी  -विदेशी पैसे बाले भी  ऋषिकेश  में योग ओर भारत  की संस्कृति सीखने आ रहे  है ! AC  गाड़ियों में ,पर पता नही क्यों ? धर्म यात्रा पर निकले लोग, अपना रास्ता बदल कर जाना पसंद नही करते ,नही तो, देबबंद से भी एक रास्ता है। जहा  से roadways बाले जाते है ।बस  को उड़ा कर ले जाते है ।पर ये रास्ता थोरा सुनसान सा है ।
.

पर यह समस्या  जाम  से भी बड़ी थी ,पुरकाजी से रूरकी जाते समय बहार की और , एक तालाब  होता था ,जिसे में  पिछले 7 सालो से,आखिरी सांसों पर जीते / मरते हुए देख रहा था ।कभी उसमे पानी इतना था की आसपास  के खेत, गर्मी  में  भी पानी नही मांगते थे। सिगाड़े के फसल  होती थी मछलिया  थी , जानबर नहाते ओर पानी पीते थे ?       पर आज  वो मर गया !!
पुरकाजी bypass उस को आधा पाटकर बनाया जा रहा है ।आज उसमे एक  बूँद पानी नही है! जबकि बरसात का मौसम चल रहा है । उसका  तला  इतना ऊपर हो गया  है की पानी रोकने की ताकत अब उसमे नही , बरसात से पहले  खुदाई  जरुरी है , नही तो .......
अभी मानव इतना समजदार नही है की किसी तालाब  के ख़तम होने से कहा?  कहा ?  क्या, क्या ? असर होंगा
उसकी कल्पना  भी कर सके ।
क्या समस्या थी ? कोन  जिम्मेदार थे ? क्या हल हो सकते थे ? किस किसका ? नुकसान होंगा ? हम भी कही  न कही ,,,,,,,,,,,,,,,,,कहा  है सरकार  की मनरेगा योजना ?जिसमे तालाब की खुदाई भी हो सकती है ।पर होती नही है ।

सभार गूगल चित्राबली 
और एक तालाब  मर गया ,,,,,

Wednesday, June 6, 2012

वो कोन थी?

आज में  आपके साथ एक  कहानी  /घटना  पर विचार करना चहाता हु !
कुछ  पुरानी बात है ,
में और चचा , निकले मेरठ की और ,बस में  बेठे करीब श्याम 6 बजे |, हमारे चचा  बड़े बडबोले , खुले दिमाग और जुबान के,काम  और नाम  से  बकील है ,तभी तो दोस्त होकर भी चचा है सबके !
 मेरठ कचेहरी, उनकी कर्मभूमि,धर्मभूमि ,अर्थभूमि है , कभी लगता है की जन्मभूमि भी यही है ,वो लिविंग legend  है ।इस  कहानी में  ये introduction जरुरी <था नही तो कहानी में मज़ा नही आता , और मेरी तो हर दूसरी कहानी  में चचा होते ही है , पर समस्या ये है की , मेरे ऐसे  चचा बहुत  है, आप सबके भी होंगे बस समजने  की बात है ?होती तो चची  भी है पर किसी को कहने  की हिम्मत किसी में  नही !
बस अभी  रूरकी में  ही थी। की चचा  2 समोसे लेकर आये , एक अपना, एक मेरा ( जबकि उन्हें मालूम है की में  समोसा नही पसंद करता )।बस मे  आसपास का नजारा लिया तो कुछ सुंदर चेहरे दिखे !कुछ खुले थे , कुछ नकाब में  थे ,चाचागिरी शुरू हो गयी उनकी ,अरे ! बोबी  (मै )" जब हम लखनऊ गए तब हाई कोर्ट के जज भी मेरी बहस पर चुप हो गए थे !;दुसरे बकीलो को  पसीने अ गए थे , किस्मत ने साथ न दिया नही तो आज हम भी ( जेसे अकेले वो, में नही ) हाई कोर्ट जज होंते,मेरे पढाये 20 लोग जज है ( जबकी सबको हिंदी . engilish  और G .S .बोबी ने पढाये थे ) अब इतना सुन कर लोग उनसे प्रभावित होने ही थे , सो हो गए । तीर चल गया !पर बात  खाली तुक्के बाली  भी नही थी , L .LB के बाद हम दोनों ही, दो बार हुए, EXAM में साक्षात्कार तक पहुचे थे ,फिर एक प्रयास नाम  से कोचिंग भी खोली थी ।
पर न थी किस्मत की विसाले यार होता  ............   और हम जज होते  !
सभी का ध्यान खीचकर ,जिसमे खुले और नकाब बालिया  दोनों थी , सायद बस में, सभी से ज्यदा योग्य हम ही साबित हो गए थे ।अब चचा  ने पूरा ध्यान नकाब ,और उनके पीछे बैठी सुंदर कन्या पर दे दिया !पर कन्या अकेली कहा  जाती है ?..... दोनों के साथ हमारे दुसमन थे !जो समज नही पा  रहे थे की क्या प्रतिकिया दे ? एसे योग्य लडको पर? पर अचानक, मु. नगर में, सुंदर कन्या और नक़ाब बाली के, वो जिन्हें हम अब्बा समजे बेठे थे ।बस से उतर गए !हमने एक दुसरे को देखा , आँखों से मुस्कराए , हाथो को दवाया , मानो जैसे लड़के दुल्हन को घर ले जाते  हुए खुस होते है । अभी तक वो 5-6 बार हमें देखकर मुस्करा चुकी थी ( देख तो न पाए पर हमारे दिल को ये लगा जिसका हमरी आँखों से कोई सत्यापन नही हुआ था )देख चुकी थी ।सीट खाली  देख कर पीछे बता एक शिकारी उठा और आगे बड़ा , पर वहा ! रे चचा ,पलक जपकाने से पहले ही चचा उसके साथ   सीट पर थे ! रात  के 8 बजे थे !बस मु.नगर के भीड़ में फ़सी थी ,जिन्दगी में  पहली बार दिल ने कहा " काश हम लेट होते जाये । अब बस ख़राब हो जाये !जाम  लगा रहे !खतोली में ढाबे पर रुक जाये ! हजारो आरजू ऐसी ........हर एक पर दम निकले , बड़े बे आबरू होकर तेरे कुचे से हम निकले ...................

अचानक वो खुलने लगी , पहले  नकाब खोल कर आजादी महसूस की फिर चचा  और बोबी (मुझे) को  परखा , लगने लगा की बिल्ली के भाग्य से छेका आज जरुर टूट रहा है ,हमने उसके सभी SUBJECT  जाच लिए ।अरे !बला की खुबसुरत ,एक बाला , 22-23 साल की उम्र ,बिना बात के मुसकरा  रही हो तो , कोन  ? अपनी जान  ना  दे! दे !चचा  ने नाम पूछते हुए ....भरपूर खूबसूरती का नज़ारा किया ." शमा: उसने कहा ,तो चचा फस गएकी नाम क्या बताये , कही  लव जिहाद न हो जाये , बिरयानी खाने से पहले मुर्गी ने भाग जाये   ..उस संमय में भी बोल पड़ा ,मेरा नाम अमन ( किस धर्म का है ?अमन कोई न समज सकता है ये बात तो ) है !और ये हमारे  खास दोस्त है नाम  नही बोला ," आप कहा जा रही है ?चचा  ने बात पलटी ,
वो बोली, पल्लाम्पुरम , फिर फालतू बाते होने लगी .धीरे - धीरे बस आगे बदने लगी , उसने बताया की सहेली के छोटे भाई का birth -day  है।  बही पर जा रही है , पर जाना कहा है? उसे भी नही पता था और उस पर मोबाइल भी नही था ।  (या हमें नही बता रही थी ) अपना गाव -शहर का पता नही बताया ,,उसने।पर बिलकुल वेफिक्र !बिन्दास !
फिर अचानक पल्लामपुराम  से पहेले  ही< वो उतरने के लिए खड़ी  हो गयी ! हमने ,conductor,अन्य रक्षकों  ने सबने बहुत  समजाया की यहा  तो कुछ नही है । जंगल है ! बस स्टैंड तक चलो !बहा से किसे को बुला लेना ! रात  के 10.30 बजे है ,, मेरठ शहर  है ये ? पर अचानक उसने जोर से कहा "रोको ! बस  रुक गयी ! चचा  और में  उलझन में  ही रह गए ! इसके साथ उतरे ? इसे रोके ?मर जाये क्या करे ?

क्या करे , पर ........................... कुछ न हुआ। वो जंगल , में ही उतर गई .....अगले दिन सबसे पहेले  अखवार पड़ा , पर कोई इसी खबर नही थी ........ आज तक भी नही है .....उसका क्या हुआ ? सच क्या था ?वो कोन थी?चचा  चुप थे ...पूरे  सफ़र मे .........अब भी उस बात पर चुप ही है ।

 जो भी दोस्त इस  ब्लॉग को पड़ते है। कृपया एस कहानी पर अपनी राय  जरुर दे .........



Tuesday, June 5, 2012

MINI - SAMUND (SEA ) KI वारिश !

दोस्तों ,    कल रूरकी के आप-पास सायं  5;45 पर तेज़ वारिश  हुई ,\
बहुत  गर्मी थी 15-20 दिनों से, पर मौसम के जानकर बोल रहे थे ,अभी कोई उम्मीद नही है राहत  की ,बस .......
ये statement  आना ,था की वरिश होनी थी, सदा के तरह ... पता नही क्या जादू है? जो  हमारा  मौसम विभाग जो  बोलता है उसका उल्टा क्यों हो जाता है ....( कोई टोटका है क्या ?)
पर सहाब, खुब वारिस हुई ! सब तन ,मन, धरती और आकाश  की गर्मी निकल गयी .
दिल ने कहा  की सो जाऊ ! ....पता नही क्यों ? पर जब वरिश होती है तो मन करता है की सो जाऊ । आराम की सबसे आसान  तरकीब ?
पर थोरी देर मे  ही , वारिश  रुक गयी ।मानो किसी की प्यास शांत करनी थी , और उसने अब बस बोल दिया हो .


मेरे गार्डेन मे  भी पानी की कमी पूरी हो गयी , अब मेरे यह नाशपाती , आम और लीची के फलो  में  रस भर जायेंगा।
कुछ दिन A .C /COOLER  की जरूरत नही होंगी ।ये वर्षा का मौसम कब आयेंगा ?
चाये ,पकोड़ी के साथ बरामदे मे बैठे रहे कर टाइम पास होंगा ?
पर ये वेर्षा हुई क्यों ... अभी तो मानसून भी नही आया ?
प्री मानसून की भी कोई खबर नही .... सोचा तो एक नयी बात समज मे  आई . हमारे उत्तराखण्ड मे ,
कई मिनी समुंद बने है , जैसे टीहरी dam का जलाशय, जब भी गर्मी होती है, तो समुँद किनारे के इलाकों की
मानिद तुरंत वारिश हो जाती है। पिछले वर्षो मे  यह परिवेर्तन मुझे लगा है ,की पानी के बड़े -बड़े जलाशय्र भी मौसम पर असर डाल  रहे है !इस का असर अच्छा है या बुरा ?
ये समय की बात है ..........
इस बार सोचने का सब्द है ---- मिनी -समुंद  = dam के जलाशय  


Reservoir
Capacity2.6 km3 (2,100,000acre·ft)
Surface area52 km2 (20 sq mi)


5 जून विश्वापर्यावरण दिवस ,

आज 5 जून है ! विश्वापर्यावरण   दिवस ,
सबसे महतवपूर्ण दिवस , जिन्दा रहना है अगर हमें और हमारे बच्चो को तो सबको मिलकर काम करना होंगा \
नही तो अभी से ही प्राकर्ति ने अपना विकराल रूप दिखाना शुरू कर दिया है ।
अधिक् तम  तापमान बढता जा रहा है और नदियओ मे  पानी कम, जाएदा हो रहे है ।भूमिजल स्तर इतना नीचे जा रहा है की 15 दिनों पहले की धुल की आंधी उसी कारन से आई थी , दिल्ही और उत्तर प्रदेश मे ,सरकार हमअरे  घर -परिवार,समाज को ,देश  को बचाने आये ,ये उम्मीद नही करना ,.........
ये मेरा काम है .. जिन्दगी जितनी जरुरी , आपका , सबका  काम है ,
में  ये नही कहेता की सस्साधन कम प्रयोग करो !!!! ना ! ना !ना
मै ये नेवेदन करता हु की इनका उपभोग करो ,.......इनका नाश न करो ,
बिजली ,पानी ,उर्जा ,कागज़ ,लकड़ी ,भूमि,कृषि उत्पाद, पट्रोल ,कोयेला  ,जैसे प्राकृतिक चीजों को बचओ ,
कृतिम प्लास्टिक ,धातु ,गैस,प्रदूषण कर चीजों को बंद करो ...........
वाहन का प्रयोग कम से कम करे , यदि हो सके तो पैदल ,साइकिल का प्रयोग .... ( स्वास्थ भी ठीक रहेंगा )
जीरो कार्बन क्रेडिट के कोशिस करे ... ( थोडा  नया शब्द है )
तो सायद कुछ हो सके .......... कार्बन बचाओ ,परिवार बचेंगा ,समाज बनेगा ,आगे बड़ेंगे ..
आज के एक कदम से हम अपनी आने वाली पीड़ियो का भविष्य बना /बिगड़ सकते है .................



कृपया  खोजे क्या है कारबन क्रेडिट ............... टिपणी दे !!!!!

Monday, June 4, 2012

जय अन्ना !जय भारतमाता !

 इ स बार जब मै  मे र ठ  मे , टीवी पर बाबा रामदेव , अन्ना ,अरविन्द , किरण बेदी को देख रहा था तो वो जोश नही आपाया,  जो पिछले वर्ष अन्ना जी के अनशन के समय आया था ,ल ग ता है मुद्दा मर रहा है ,
आम जन को लगता है की कुछ बदल नही सकते , ये लोग इतने राजनितिज नही है जो नेताओ से bhrastachar खत्म करवाने की कोई एक भी ग़लती करवा सके ,
वो तो अंग्रेज ही थे, जिनके सामने ghadhi  जी ,ने अहिंसा के सहारे हमारी लड़ाई लड़ कर जीते !
आज तो वो भी सम्भव  नही है ,
अन्ना ज़ी , मुर्दों की लड़ाई लड़ रहे है ,क़िस को परेशानी है ?  कोन  हटाना पसंद करेंगा ? सभी तो शामिल है !बस जो लोग इससे दूर है वो आपके पास है ..
स्टुडेंट को डिस्को जाना है ! 2000/-पर day
पत्नी को पार्लर जाना है ,kitty डालनी है 5000/-पर month
कार/bike /scooty .........5000/-
gold /funiture भी छ माह मे  बदलना होता है .....200000/-
बच्चे /बीबी की जेब खर्च .....20000/-
इतना पैसा कहा से आयेंगा ???
कोंन आपका साथ देंगा ?
बही न जिन्हें ये सब नही मिल रहा ...
कितने सरकारी अधिकारी /नेता /व्येपारी यो के परिवारजन ?
अब क्रांति तो गरीब आदमी को लानी है ....या बेरोजगार ????(नोकरी से पहेले का )हम तो खोज रहे है .......
गाँधी जी भी देख रहे होंगे ,.... अब आन्दोलन हो तो सम्पूरण क्रांति !!!!!जयप्रकाश नारायण की याद आ रही है !!
खली करो सिंहासन ! की अब जनता आती है !! जय अन्ना !जय भारतमाता !






Sunday, June 3, 2012

yatra ....

kal jab mai meerut mai rat ko 8 baze bus se utara to dekha lalkurti ke zero mile stone ka name .... SHIVAJI CHOWKE MAI badla ja rha thaa.
bjp party ka bolbala thaa
.....tabh dimag mai aaya ki RAJ & BAL THAKRE ES GHATNA per kya bolte .. agar unhe pata chalta ki up mai shivaji mharaj ke name per choraha bana hai ...