चुनाव ! हा!
मेरे मेरठ में 24 /06/2012 को बार्ड और नगर प्रमुख के चुनाव हो रहे थे ,प्रजातंत्र में ये मेले कभी कभी लगते है ,जिसमे दुकानदार अपनी दुकान में जूठे बादों का सामान दिखा कर , पैसे से भी जाएदा कीमती वोट कमा लेते है ओर फिर वो हमारे मालिक ,भागवान बन जाते है ।ओर हम भिखारी ,फिर भी मज़ा आता है एन सब खेलो में ।हमारे बार्ड में पुराने विजेता शर्माजी और नए खिलाडी तेवतिया जी मैदान में प्रमुख थे ,पर बीजेपी पार्टी के पक्के वोटो ,और अपनी जाति संख्या के दम पर त्यागी जी भी जीत के आकडे लगा रहे थे ।
चुनाव में यही तो खास बात होती है एक जीत से पहेले सब जीतते है ,चमचे जैसे नेता जी को जीत के आकडे बताते है उन के दम पर नेता जी फूलकर कुप्पा रहेते है ,जमीनी हकीकत जानने बाले नेता अब कहा मिलते है ?और आखिर के समय तक कुछ भी तो पता नही चलता , गरीब भी अब तेज हो गए है ,पीते सब की है ,वोट
उसे ही देते है जहा उनका दिल करता है .ओर् देते भी जरुर है .चाहे खाने को रोटी न मिले ! पूरे 5 साल तक ...
हमारे बार्ड की दशा भी हिंदुस्तान की असली तस्वीर को दिखाती है जहां एक तरफ करोर्पति , अरबपति का ऐशगाह है वही दूसरी तरफ इतने गरीब है की खाने को भी न मिले बीच में समाजवादी मध्य वर्ग आवास कालोनी है इसलिए चुनाव लड़ना महाभारत जितना मुश्किल है
हमारे एक प्रत्याशी पूंजीवादी वर्ग से हैं तो एक बहुत गरीब, लेकिंन गरीबो में आत्म सम्मान ज्यादा होता है और गरीबी अपने आप में एक जाति है इसलिए उसके जीतने की संभावना ज्यदा थी
चुनाव के दिन सुबह ही गरीब प्रत्याशी के पोलिंग एजेंट बहुत व्यस्त थे जबकि अमीरों के पास वोट डालने का समय नहीं था उनके लिए ये दिन छुट्टी का था जिस कारण अधिकतर लोग घुमने निकल गए थे
दो तीन घंटो बाद पूंजीवादी प्रत्याशियों ने पैसो का रंग दिखाना शुरू किया और गरीबों के जवान लडको को अपने इशारो पे नाचने लगे जिससे उनकी भी हवा बनने लगी जो युवा कालेज राजनीती से शुरुआत करके ऊपर बढ़ना चाहते थे वो सब बूथ एजेंट बन गए थे और जिनका रेट 1500 रुपए प्रतिदिन पार्टी द्वारा निश्चित किया गया . अपना मोहित भी अब बड़ा हो गया है ,है तो बीजेपी में पर वोट अपनी जाती के नेता को देने के लिए बोलरहा है ।मेरठ शहर की यही खास बात है चुनाव के दिन 12 बजे तक कुछ एसे अखवार बट दिए जाते है जिनको पहेले कभी नही देखा होंगा ? खबर\बही की मुस्लिम वोट एक ही जगह पड़ रहे है 90% तक वोटिंग हो रही है ... आदि आदि पर सब जूठ होता है ,
पर अब अगर मतदान को जरुरी न बनाया गया तो लोकतंत्र पर खतरा हो रहा है ।मतादेश का हरण हो रहा है ।
10-15 प्रतिशत से चुनाव जीते जा रहे है ..टीवी / अखवार के अभियान कारगर नही रहे ।
सरकार पर ही भरोसा नही तो वोट देकर ही क्या होंगा ।अब या तो 50 साल से उपर के लोग या 18-25 तक के युवा ही मतदान करते है ।उनमे भी तथाकथित आधुनिक युवा लडकिय तो .......what is this nonsence ? what is the use of my vote ?कहकर जोर से हस कर लोकतंत्र को चुनोती देती है ।
kya होगा अब ????/
मेरे मेरठ में 24 /06/2012 को बार्ड और नगर प्रमुख के चुनाव हो रहे थे ,प्रजातंत्र में ये मेले कभी कभी लगते है ,जिसमे दुकानदार अपनी दुकान में जूठे बादों का सामान दिखा कर , पैसे से भी जाएदा कीमती वोट कमा लेते है ओर फिर वो हमारे मालिक ,भागवान बन जाते है ।ओर हम भिखारी ,फिर भी मज़ा आता है एन सब खेलो में ।हमारे बार्ड में पुराने विजेता शर्माजी और नए खिलाडी तेवतिया जी मैदान में प्रमुख थे ,पर बीजेपी पार्टी के पक्के वोटो ,और अपनी जाति संख्या के दम पर त्यागी जी भी जीत के आकडे लगा रहे थे ।
चुनाव में यही तो खास बात होती है एक जीत से पहेले सब जीतते है ,चमचे जैसे नेता जी को जीत के आकडे बताते है उन के दम पर नेता जी फूलकर कुप्पा रहेते है ,जमीनी हकीकत जानने बाले नेता अब कहा मिलते है ?और आखिर के समय तक कुछ भी तो पता नही चलता , गरीब भी अब तेज हो गए है ,पीते सब की है ,वोट
उसे ही देते है जहा उनका दिल करता है .ओर् देते भी जरुर है .चाहे खाने को रोटी न मिले ! पूरे 5 साल तक ...
हमारे बार्ड की दशा भी हिंदुस्तान की असली तस्वीर को दिखाती है जहां एक तरफ करोर्पति , अरबपति का ऐशगाह है वही दूसरी तरफ इतने गरीब है की खाने को भी न मिले बीच में समाजवादी मध्य वर्ग आवास कालोनी है इसलिए चुनाव लड़ना महाभारत जितना मुश्किल है
हमारे एक प्रत्याशी पूंजीवादी वर्ग से हैं तो एक बहुत गरीब, लेकिंन गरीबो में आत्म सम्मान ज्यादा होता है और गरीबी अपने आप में एक जाति है इसलिए उसके जीतने की संभावना ज्यदा थी
चुनाव के दिन सुबह ही गरीब प्रत्याशी के पोलिंग एजेंट बहुत व्यस्त थे जबकि अमीरों के पास वोट डालने का समय नहीं था उनके लिए ये दिन छुट्टी का था जिस कारण अधिकतर लोग घुमने निकल गए थे
दो तीन घंटो बाद पूंजीवादी प्रत्याशियों ने पैसो का रंग दिखाना शुरू किया और गरीबों के जवान लडको को अपने इशारो पे नाचने लगे जिससे उनकी भी हवा बनने लगी जो युवा कालेज राजनीती से शुरुआत करके ऊपर बढ़ना चाहते थे वो सब बूथ एजेंट बन गए थे और जिनका रेट 1500 रुपए प्रतिदिन पार्टी द्वारा निश्चित किया गया . अपना मोहित भी अब बड़ा हो गया है ,है तो बीजेपी में पर वोट अपनी जाती के नेता को देने के लिए बोलरहा है ।मेरठ शहर की यही खास बात है चुनाव के दिन 12 बजे तक कुछ एसे अखवार बट दिए जाते है जिनको पहेले कभी नही देखा होंगा ? खबर\बही की मुस्लिम वोट एक ही जगह पड़ रहे है 90% तक वोटिंग हो रही है ... आदि आदि पर सब जूठ होता है ,
पर अब अगर मतदान को जरुरी न बनाया गया तो लोकतंत्र पर खतरा हो रहा है ।मतादेश का हरण हो रहा है ।
10-15 प्रतिशत से चुनाव जीते जा रहे है ..टीवी / अखवार के अभियान कारगर नही रहे ।
सरकार पर ही भरोसा नही तो वोट देकर ही क्या होंगा ।अब या तो 50 साल से उपर के लोग या 18-25 तक के युवा ही मतदान करते है ।उनमे भी तथाकथित आधुनिक युवा लडकिय तो .......what is this nonsence ? what is the use of my vote ?कहकर जोर से हस कर लोकतंत्र को चुनोती देती है ।
kya होगा अब ????/
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