आज ,
फिर आपके सामने एक सच्ची घटना लेकर आया हु !जिस पर विश्वास करना या न करना आपकी इच्छा पर है ।कुछ पुरानी बात है जब में छोटा बच्चा था, बड़ी शरारत करता था, मेरी चोरी पकड़ी नही जाती! न रोशन होता बजाज !लगभग 10-15 लडको का दल था| जो गर्मियों की छुट्टियों में टाइम पास करने पास के बाग़ में या नये बनते मकानों में eye- spy खेलते थे| जिसे लुक्का छिपी भी कहते है ।ये वो दौर था, जब हर लड़का सम्यबादी होता था ।जैसे हर गरीब दिल से सम्याबादी /समाजबादी होता है .अमीर होने पर उनसे नफरत करता है,नीचा समजता है ।
उस दिन बहुत सारे कच्चे आम ,नाशपाती , लीची और घर से नमक लाकर दावत हो रही थी। एक बड़ी बनती पूँजीवादी की कोठी ,में सारे फल चोरी -सीनाजोरी से लाये गए थे ।कुछ लड़के बाहर को घूम रहे थे ।घर का प्रयोग उसी प्रकार कर रहे थे मानो सब कुछ तैयार हो ..जैसे शोचालय ! रसोई ! स्टोर !हमने खाने पीने की चीजे रसोई मै हो रखी थी ।
उस दिन पता चला की एक दिन पहले ही मकान मालिक हमारी हरकतों पर ,हवा मै गालिया दाग रहा था ।गुस्से में नीला -पीला (लाल -पीले से खतरनाक )होकर गया था ।हम भी तैय्यारी से थे ,अच्छा ही था अमीरों से लड़ने का कोई मोका हम छोड़ते कहा थे ?
वो क्या था ??????? कोई आपस में कुछ न बोल पाया। जमीन पर सरक कर बहार निकले घर तक कोई न कुछ बोला .......कुछ लड़ाके रो भी रहे थे पर जादातर गम थे ।आपको पता है बहा हमने क्या देखा ?
वो हवा में उड़ता, एक कटा, एक बड़ा सा सिर था ? जिसके आँखे बड़ी-बड़ी थी ? बाल रस्सियों के जैसे थे मुह लाल हुआ था कुछ -कुछ शेर जैसे था ? आज भी हम हनुमान भक्त ये सोचते है की अगर उसने हमें देखा होता तो क्या हुआ होता ?और जब हम सब मेरे घर पहुचे तो हमारी हालत देख कर , सब परेशान हो गए , पूरा मोहल्ला जमा हो गया था ।कुछ वरिष्ठ लड़ाके इक्कठे होके भा गए तो बहा कुछ न था ।पर कहा जाता है. बाग ,जंगल और सुनसान मे ही भूत होते है ।
एस घटना से पहले जब कोई भूत की कहानी सुनाता, तो में सबसे पहले हसता था ।अपने को पड़ा लिखा मानता था ।अब में वो पढाई करता हु जिसमे सब सच्ची कहानीया होती है..... भूत ,जिन्न, देवता, डायन, परी पर सबसे उपर है हमारे हनुमान जी अब भूतो से डर नही लगता .......अरे ! वो तो हवा है हम शरीर के साथ है ।
डर का नाम ही तो भूत है !अगर कोई भूत इस बलोंग को पढ़े तो मुझसे कभी भी , सम्पर्क करे ....सिर कटा भूत !को ये सुविधा नही है । सॉरी !
फिर आपके सामने एक सच्ची घटना लेकर आया हु !जिस पर विश्वास करना या न करना आपकी इच्छा पर है ।कुछ पुरानी बात है जब में छोटा बच्चा था, बड़ी शरारत करता था, मेरी चोरी पकड़ी नही जाती! न रोशन होता बजाज !लगभग 10-15 लडको का दल था| जो गर्मियों की छुट्टियों में टाइम पास करने पास के बाग़ में या नये बनते मकानों में eye- spy खेलते थे| जिसे लुक्का छिपी भी कहते है ।ये वो दौर था, जब हर लड़का सम्यबादी होता था ।जैसे हर गरीब दिल से सम्याबादी /समाजबादी होता है .अमीर होने पर उनसे नफरत करता है,नीचा समजता है ।
उस दिन बहुत सारे कच्चे आम ,नाशपाती , लीची और घर से नमक लाकर दावत हो रही थी। एक बड़ी बनती पूँजीवादी की कोठी ,में सारे फल चोरी -सीनाजोरी से लाये गए थे ।कुछ लड़के बाहर को घूम रहे थे ।घर का प्रयोग उसी प्रकार कर रहे थे मानो सब कुछ तैयार हो ..जैसे शोचालय ! रसोई ! स्टोर !हमने खाने पीने की चीजे रसोई मै हो रखी थी ।
उस दिन पता चला की एक दिन पहले ही मकान मालिक हमारी हरकतों पर ,हवा मै गालिया दाग रहा था ।गुस्से में नीला -पीला (लाल -पीले से खतरनाक )होकर गया था ।हम भी तैय्यारी से थे ,अच्छा ही था अमीरों से लड़ने का कोई मोका हम छोड़ते कहा थे ?
अचानक !....हमें लगा कोई आया है हमने बहार के आवाजो को सुना तो सब शांत था। बहार के लड़के भाग गए लगता है ....डरपोक ... राजू फुसफुसाया !अंदर 6-7 लोग थे .अब हमें दुश्मन की ताकत का अंदाजा लगाना जरुरी था। तभी हमला हों !तब हाकी आज की पिस्तोल से भी अधिक खतरनाक होती थी। हम पर 5 -5 थी !रखनी पड़ती है भाई ! वो मेरठ शहर है ....उसे देखने हम चुप चाप साइड की गैलरी से बहार को सरके .........पर बड़ी खिड़की के पास पहुचकर हमने इशारा किया और अंदर झाक कर देखा ........फिर कुछ नही देखा .......सारे लड़ाके जमीन पर गीर गए !
वो क्या था ??????? कोई आपस में कुछ न बोल पाया। जमीन पर सरक कर बहार निकले घर तक कोई न कुछ बोला .......कुछ लड़ाके रो भी रहे थे पर जादातर गम थे ।आपको पता है बहा हमने क्या देखा ?
वो हवा में उड़ता, एक कटा, एक बड़ा सा सिर था ? जिसके आँखे बड़ी-बड़ी थी ? बाल रस्सियों के जैसे थे मुह लाल हुआ था कुछ -कुछ शेर जैसे था ? आज भी हम हनुमान भक्त ये सोचते है की अगर उसने हमें देखा होता तो क्या हुआ होता ?और जब हम सब मेरे घर पहुचे तो हमारी हालत देख कर , सब परेशान हो गए , पूरा मोहल्ला जमा हो गया था ।कुछ वरिष्ठ लड़ाके इक्कठे होके भा गए तो बहा कुछ न था ।पर कहा जाता है. बाग ,जंगल और सुनसान मे ही भूत होते है ।
एस घटना से पहले जब कोई भूत की कहानी सुनाता, तो में सबसे पहले हसता था ।अपने को पड़ा लिखा मानता था ।अब में वो पढाई करता हु जिसमे सब सच्ची कहानीया होती है..... भूत ,जिन्न, देवता, डायन, परी पर सबसे उपर है हमारे हनुमान जी अब भूतो से डर नही लगता .......अरे ! वो तो हवा है हम शरीर के साथ है ।
डर का नाम ही तो भूत है !अगर कोई भूत इस बलोंग को पढ़े तो मुझसे कभी भी , सम्पर्क करे ....सिर कटा भूत !को ये सुविधा नही है । सॉरी !
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