Sunday, September 29, 2013

निराशा राम .....

आसाराम ने साधू और संत परम्परा को बदनाम कर दिया है | उनके कुकृत्य संत समाज के लिए बेहद शर्मनाक है इस प्रकार के अपराध हर धर्म के ठेकेदार खुले आम करते रहे है पर जनता की आँखों पर कोन सी  पट्टी बंधी रहेती है अधिकतर साधू कॉर्पोरेट तरीके से काम करते है , हर सहर मे इनके खास चेले होते है जो आश्रम  चलाकर प्रचार से , बल ,धन - और तन की  अय्याशियों का इंतजाम करते है और जिसमे इनका निश्चित हिस्सा होता है | इसमे सहायक होते है राजनीतिक जो इनके पीछे जुटी भीड़ को देख कर, हर तरह की मदद करने मे आगे रहेते है |और एन अपराधियों को अपने फायदे के लिए सरक्षण देते है |
आसाराम ने साधू और संत परम्परा को बदनाम कर दिया है | उनके कुकृत्य संत समाज के लिए बेहद शर्मनाक है |जिस प्रकार संत होने का नाटक करके सम्पति और  बल का प्रदर्शन किया जाता था उससे ही पता चलता था की ये कितना पहुचा हुआ संत है | भागवत गीता के अनुसार  जिन संतों में निम्न चार विशेषताएँ हों , वे ही सच्चे संत कहलाने योग्य हैं :-
 [ १ ] त्याग - स्वरूप से पदार्थों का त्याग | जैसे संन्यासाश्रम में मान - बडाई , कंचन - कामिनी का त्याग |पर वर्तमान संत ? क्या त्याग पाए ?
 [ २ ] संयम - इन्द्रिय , मन अपने वश में रखना , इसका नाम संयम है |इनकी सारी इंद्रिय जरूरत से जाएदा तेज है
  [ ३ ] वैराग्य - वस्तुओं में जिसका राग नहीं है | संयम तो सकामी योगी भी कर सकते हैं बड़े - बड़े आश्रम सारी सुविधाए फिर वैराग्य कहा ? | मन , इन्द्रियों का संयम किये बिना समाधि नहीं होती | संयम का मतलब है वश में कर लेना | इन्द्रियों को वश में कर लेना एक चीज है , विषयों से हटाना एक चीज है , उनमें राग का अभाव कर देना एक चीज है | भगवान ने गीता [ २ / ५९ ] में कहा है " इन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण न करनेवाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत हो जाते हैं , परन्तु उनमें रहनेवाली आसक्ति निवृत नहीं होती | |
 [ ४ ] उपरामता - जैसे शाकाहारी का मन किसी मासाहारी भोज़न  की तरफ उसकी  वृति जाती ही नहीं , इस प्रकार की वृति का नाम ' उपरामता ' है |जब  स्वरूप से विषयों का त्याग कर देते हैं | वह त्याग है किन्तु विषयों में राग होने के कारण उपरामता नहीं है | जिसके साथ राग का अभाव होकर स्वत: उपरति होती है , वह उपरामता है | राग का अभाव हो वह उपरति है , तथा वैराग्ययुक्त उपरति हो , वही उपरामता है |
अब जब ये संत मद- और बल मे चूर होकर सत्ता  को ही नतमस्तक केर देते हो तो उनके लिए गीता उपदेश क्या मायने रखते है ?
 पर   इस प्रकार के अपराध हर धर्म के ठेकेदार हजारो सालो से  खुले आम करते रहे है पर पता नही की  जनता की आँखों पर कोन सी  पट्टी बंधी रहेती है जो इनके लिए अपनी तर्क शक्ति को भूल कर, इनकी भक्ति मे बर्बाद होते है | बास्तव मे इनकी भक्त  जनता को मनोचित्सक की जरुरत होती है पर सहारा इनका लेती है  अधिकतर  कपटी - साधू कॉर्पोरेट तरीके से काम करते है , हर सहर मे इनके खास चेले होते है जो आश्रम  चलाकर नियोजित चमत्कारों के  प्रचार से ,जनता पर प्रभाव बनाते है और इनके लिए  बल ,धन - और तन की  अय्याशियों का इंतजाम करते है और जिसमे सबका  निश्चित हिस्साबटन रूप मे  होता है | इसमे सहायक होते है राजनीतिक ताकते ,  जो इनके पीछे जुटी भीड़ को देख कर, हर तरह की मदद करने मे आगे रहेते है और इस कारन प्रशाशन भी नतमस्तक रहेता है  | और एन अपराधियों को अपने फायदे के लिए सरक्षण देते है |
सबसे बड़ी गलती तो जनता की है जो खुली आँखों से कुछ भी देखना ही नही चाहती , आंखे मुन्धे इनके भजन करती है |
 बड़े बड़े नेता इनके पास  शान्ति  जाते रहे है इनपर  पर विभिन्न आश्रमों से लगी ज़मीनें भी  गैरकानूनी रूप से दबाने के कई मामले आरोपित हैं. इन पर भी लगे हाथ कार्यवाही की जाना चाहिए. आसाराम सहित कुछ और कथित बाबाओं पर काले धन को सफ़ेद करने के आरोप लगे थे जिसमे बड़े उधोगपति और नेता लोग सामिल रहेते है |. इस विषय में जांच होनी जरुरी है और  जरूरी यह है कि सभी  अधर्मी, पाखंडी, दुश्चरित्र व्यक्ति पर उक्त तमाम आरोपों की गहरी छानबीन और जांच हो और सख्त सजा इसे दी जावे साथ ही इसकी साधू वेश में शैतान वाली छवि को व्यापक रूप से प्रसारित किया जावे ताकि यह फिर कभी जनता को मुंह दिखाने लायक न बचे.और जनता की सोच बदले !जनता अपना सुख कर्म  बाद मे देखे | एन दुस्क्रमियो के जल मे फास कर अपना घर  परिवार  बर्बाद न करे |अब एन संतो को राम राम बोलना जरूरी है !

Tuesday, September 24, 2013

हिंदी ब्लोग्स .......

वर्तमान युग मे जहा किताबो से दूर होते पाठक और , पाठको तक न पहुच पाने बाले लेखक, धन और संशाधनो की कमी , पत्र - पत्रिकाओ के लेखको और मालिको के पद्युक्त बोधिकता से अपमानित होकर  हिंदी भाषा को मन दिलाने मे पिछड़ते जा रहे थे बही हिंदी मे नाममात्र के लेखक और पाठक हिंदी की सेवा कर पा  रहे थे |पत्रिकाए न  बिकने के कारण बंद हो रही थी तो गरीब पाठक कहा  जाये ?
एन हालातो मे उम्मीद की एक किरण नही पूर्ण सूरज उगा , वो है इन्टरनेट पर हिंदी ब्लोगिंग का , जिसने हिंदी भाषा को वो मान दिलबाया है जो विशेष है |
आज की तारीख मे  हिंदी भाषा में लगभग २५००० के आसपास ब्लोग्स हैं जिनमे २०००० के लगभग रोज साँस लेते है जबकि ५००० के लगभग कभी - कभी जिन्दा हो जाते है  ,तब भी यह संख्या अंग्रेजी की तुलना में बहुत कम है . अंग्रेजी भाषा  में  तो पाच  करोड़ के लगभग  ब्लोग्स  चल रहे है  .दुनिया भर मे चलने बाले ब्लोग्स मे जिसमे  अंग्रेजी में, जापानी भाषा मे और चीनी भाषा मे अधिकतम प्रयोग हुए है . अभी तुलनात्मक रूप से भले ही हिंदी ब्लॉग का विस्तार काफी कम है किन्तु हिंदी ब्लोगों पर एक से बढकर एक विद्या  प्रस्तुत की जा रही हैं ! समाज, राजनीति, मीडिया और साहित्य से संबंधित उच्च स्तरीय सृजन हिंदी ब्लॉग पर पर हो रहा है  !हिंदी में ब्लॉग कम होने का एक कारण यह भी हो सकता  है, कि अंग्रेजी में ब्लोगिंग १९९७ में ही शुरू हो गयी थी,  ऐसा मन जाता हैं की  हिंदी का पहला ब्लॉग ०२ मार्च २००३ को लिखा गया जिसे  हिंदी के पहले ब्लोगर के रूप में आलोक कुमार ने लिखा और जिनका ब्लॉग है नौ  दो ग्यारह जबकि  यह हिंदी ब्लोगिंग के विस्तार न होने का तथ्यपूर्ण  तर्क नहीं है, क्योंकि समय के लिहाज से अंग्रेजी और हिंदी के बीच मात्र छ: साल की दूरी है लेकिन ब्लॉग की संख्या के लिहाज से दोनों के बीच पीढियों का अंतर है !
साहित्य रचना के छेत्र मे ब्लोग्स अब अति महतवपूर्ण साधन बन गए है  तो आज का हिन्दी ब्लॉग  प्रोयोगाताम्क दौर में है , जिसमे  नित नए प्रयोग होते हैं।  जैसे समूह ब्लाग का चलन ज़्यादा हो गया है। ब्लागिंग प्रसिद्ध होने का माध्यम भी बन रहा   है।पर अब  लिखने की मर्यादा पर भी सवाल उठाए जाने लगे हैं। ब्लाग लेखन को एक समानान्तर मीडिया का दर्ज़ा भी हासिल हो गया है। हिंदी साहित्य के अलावा विविध विषयों पर विशेषज्ञ की हैसियत से भी ब्लाग रचे जा रहे हैं ।साहित्य ,समाज  विज्ञान , कला  ,सूचना , तकनीक , स्वास्थ्य और राजनीति कुछ भी अछूता नहीं है।
जिस प्रकार हिंदी ब्लॉगर साधन और सूचना की कमी के बावजूद भाषा - समाज और देश के हित में  जन चेतना को विकसित करने में सफल हो रहे हैं बह भी बड़ी उपलब्दी ही है  । अपनी सामाजिक भूमिका  को निभाने  की प्रतिबद्धता के कारण आज हिंदी के अनेक  ब्लोग्स सामाजिक  मीडिया की दृष्टि से समाज में सार्थक भूमिका निभाने में सफल रहे हैं । हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय स्वरुप देने में हर  ब्लॉगर की महत्वपूर्ण भूमिका  है | जो बोल्गर अपने  बेहतर प्रस्तुतिकरण,सधी हुई भाषा  गंभीर चिंतन, समसामयिक विषयों पर सूक्ष्मदृष्टि, सृजनात्मकता, समाज की कुसंगतियों पर प्रहार और साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से अपनी बात रखने में सफल हो रहे हैंबो एक मायने मे समाज सेवी ही है । ब्लॉग लेखन और वाचन के लिए सबसे सुखद पहलू तो यह है कि हिन्दी में बेहतर ब्लॉग लेखन की शुरुआत हो चुकी है जो हिंदी समाज  के लिए शुभ संकेत का  है । आने बाला समय    हिंदी ब्लॉगिंग को एक नया आयाम  मिलेंगा ऐसी उम्मीद की जा रही है ।अनेक समाचार पत्रों के ब्लोग्स है जो अच्छे ब्लोगर्स को अपने पत्र मे स्थान देते है मंच प्रदान करते है |
माना जाता है कि ब्लोगिंग की दुनिया पूरी तरह आजाद ,आत्म निर्भर और खिलंदड  है ! यहाँ हर कोई यहा लेखक, प्रकाशक और संपादक की भूमिका में  खुद ही होता  हैं ! ब्लॉग की दुनिया  अत्यंत विस्तृत और व्यापक है !यहाँ केवल राजनीतिक कहानियों और साहित्यिक रचनाएँ ही नहीं प्रस्तुत नही है  वल्कि  स्तरीय पुस्तकों  का ओन लाइन  प्रकाशन तथा अन्य सामग्रियां भी प्रकाशित की जाती है .आज हिंदी में भी फोटो ब्लॉग, म्यूजिक  ब्लॉग, विडिओ ब्लॉग,समाचार पत्र ब्लोग्स बिज्ञान ब्लॉग ज्ञान  ब्लॉग, प्रोजेक्ट ब्लॉग, कारपोरेट ब्लॉग आदि का प्रचलन तेजी से बढ़ा है ! यानी हिंदी  आज मानवीय संवेदनात्मकता के विकास के  दौर में है |
अर्थात  हिंदी ब्लोगिंग का भविष्य उज्जवल है  और ये  बाज़ार का हिस्सा नही है क्युकी इसमे वो लोग जुड़े  है जो हिंदी प्रेमी है जीन को सही  मंच की तलाश थी जो मोका अब मिला हुई और आने वाले दिनों में अंग्रेजी भाषा  की तरह इसका भी एक बड़ा और समृद्ध संसार होगा,इसमें कोई संदेह नहीं है ! सबसे सुखद बात तो यह है कि आज हिंदी ब्लोगिंग समानांतर मीडिया का स्वरुप ले चुका है , आने वाले समय में निश्चित रूप से इसका एक वृहद् संसार देखने को मिलेगा इसमें कोई संदेह नहीं !जरूरत केवल इस बात की है सकारात्मक नव  लेखन को बढ़ावा दिया जाए और नकारात्मक लेखन को महत्व न दिया जाए,क्योंकि हिंदी ब्लोगिंग में ऐसे लोगों बहुत अधिक है जो अशुद्ध भाषा और तकनिकी अकुशलता के कारण अभी तक अपने को मन से जोड़ नही पाए है | हमें इस ओर विशेष ध्यान देना होगा , तभी हम हिंदी ब्लोगिंग के माध्यम से एक सुन्दर और खुशहाल संसार के निर्माण को रूप देने में सफल हो सकेंगे |
अत स्पस्ट है हिंदी  ब्लोगिंग ही अब हिंदी को मुख्य धारा मे मान दिलबा सकती है |नही तो पुराने तौर - तरीको से हिंदी अब अधोगामी दिशा मे ही जा रही है .....

Sunday, September 22, 2013

मुज्फ्फर नगर दंगा .लाशो की राजनीति

मुज्फ्फर नगर दंगा


 नारी अपराध के प्रतिशोध मे पहेले एक हत्या फिर दो हत्या फिर एक टी वी पत्रकार की हत्या पंचायत से लोटते लोगो पर सुनियोजित  हमला , और उसकी प्रतिकिर्या से उपजे दंगे  फिर तो  आकड़े ही नही मिलते है की कहा पर ? कितने लोग मरे ? किसने मारे ?कितने गायब है ? क्यों मारे ? खबरों पर रोक जो लगी थी |
प्रशन यह है की क्यों लोग ऐसा करते है और कोन है बे  लोग जो हमला करके छुप जाते है ?और मरते निर्दोष ही है | सारे दलों के नेताओ की भूमिका इस मामले मे दोषी है , किसी ने  समाज को जोड़ने की बात नही करी सब मरने बालो के कफ़न , और बचने बालो के वोट  का इंतजाम करते देखे गए पर सही बात किसी ने नही उठाई |दिल को जोड़ने के नाटक होते रहे , 
लोकतंत्र के कितना गलत फायदा उठा रहे है लोग , मुद्दो की नही , लाशो की राजनीति हो रही है गद्धी के लिए |
इस  देश का यह दुभाग्य ही है की एक बिभाज़न होने के बाद भी जनमानस को धर्म की  राजनिति के चलते आज भी लड़ाया जा सकता है | जबकि  नुकसान दोनों वर्गों के निर्बल बर्गो  को ही झेलना पड़ता है ।जिसका  फायदा तथाकथित रहनुमा राजनितिक दलों  को चुनावो मे  मिलता है । प्रसाशन की असंवेदनशीलता , चुक और तुस्तिकर्ण  के चलते और सरकार के दबाब के कारण , सही समय पर उचित प्रसाशनिक   कार्य बहाई  नही करी गयी और ये सुनियोजित  दंगा फेला , जिससे  जगल राज कायम हुआ पर अभी तक किसी स्तर से  कोई ठोस कदम नही उठाया गया है । जिससे आपसी  विस्बास बड़े और अपराधियों पर निस्कपक्ष कार्यबही  हो  इसलिए ये मामला अभी ख़तम नही माना  जा सकता। अब भी अगर जनता नही जागी  अब तो चुनाव तक यही सब होना , इस प्रदेश की नियति बन गयी है । जरुरत यह है की जनता ही धर्म आधरित राजनीती का बहिष्कार करे और विकास, रोजगार , रोटी , कपडे और मकान इमानदारी की बात पर नेता चुने नही तो अब इस देश का लोकतंत्र ही इसके लिए घातक सिद्ध होंगा !लाशो पर राजनीती की रोटिया सेकने से बात आगे बाद गयी है अब तो बोटिया सकी जा रही है |

Wednesday, September 18, 2013

हिंदी नही है बिन्दी ......वो है दिलो की रानी ( हिंदी बाज़ार का हिस्सा नही बनेगी ) कॉन्टेस्ट

कोई भी  भाषा हमारे लिए बोलचाल का एक  माध्यम होती है|मानव भाव के  संप्रेषण का एक  माध्यम होती है। इसके द्वारा हम अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं और सम्पूर्ण प्राणी जगत और  लोगों के विचार जान सकते हैं| जब से मानवजाति का उदय हुआ  तब से ही  बह कोई न कोई भाषा  का उपयोग कर रहा है चाहे वह ध्वनि के रूप में हो या सांकेतिक रूप जिसमे लिखित या चित्रित हो सकते है  में या अन्य किसी रूप में विचारों को व्यक्त करने के लिए उसे भाषा की आवश्यकता होती है। हा कभी कभी अमेल भाषी होने पर संकेतो या भावो का प्रयोग भी किया जाता है |हिंदी भी विश्व की प्रमुख भाषा है जिसको अभी तक देश की मुख्य धारा मे नही माना जाता जबकि इसको बोलने बाले दुनिया मे दुसरे सबसे बड़े वर्ग मे है |

आज  हिन्दी भारत के प्रमुख राज्य जैसे मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार   राजस्थान, हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश में प्रमुख रूप से बोली जाती है और महारास्त्र गुजरात उड़ीसा जम्मू कश्मीर  जैसे प्रान्तों मे समझी और अल्प मात्रा प्रयोग करी जाती है |
कोई  राष्ट्रभाषा संपूर्ण देश में भावात्मक तथा सांस्कृतिक एकता स्थापित करने का प्रधान साधन होती है। इसे बोलने वालों की संख्या सबसे अधिक होती है।

कोई एक भाषा किसी एक राष्ट्र के लिए आवश्यक है । भाषा राष्ट्र की एकता, खंडता तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि राष्ट्र को एक रखना है मजबूत  बनाना है तो उसकी  एक भाषा हो जो नागरिको को स्वीक्रत  होनी चाहिए। इससे धार्मिक  सामाजिक तथा सांस्कृतिक एकता बढ़ती है। यह शक्तिशाली  राष्ट्र के लिए आवश्यक है। इसलिए हर  विकसित तथा स्वा‍भिमानी देश की अपनी एक भाषा अवश्य होती है जिसे राष्ट्रभाषा का गौरव प्राप्त होता है।

क्या किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाया जा सकता है। किसी भी देश की राष्ट्रभाषा उसे ही बनाया जाता है जो उस देश में व्यापक रूप में फैली होती है। संपूर्ण देश में यह संपर्क भाषा व्यवहार में लाई जाती है। हम सभी इस बात को मानते हैं कि हिन्दी भाषा बोलने में, लिखने में, पढ़ने में सरल है। हिन्दी की साहित्यिक गरिमा और लिपि की वैज्ञानिकता से सभी सहमत हैं। अनेक बाधाओं, व्यवधानों और उतार-चढ़ाव के बावज़ूद भी आज हिन्दी विश्व-मंच पर अपना स्थान बनाती जा रही है, यह हमारे देश के लिए बहुत ही गर्व की बात है। हिन्दी भाषा आज के युग की भाषा बने, विज्ञान और नई तकनीक की भाषा बने, यह आज के युग की माँग है 
भारत प्राचीन  काल से ही साहित्यिक,सामाजिक , सांस्कॄतिक और वैज्ञानिक दॄष्टि से अति समृद्ध रहा है, लेकिन उसके इस समृद्ध-कोश को विदेशियों द्वारा कभी चुराया गया तो कभी जलाया गया है। आज आवश्यकता है कि हम अपने पुराने गौरव को प्राप्त करे और  फ़िर से दुनिया के साथ आगे बढ़ें और भारत की उस गरिमा को प्राप्त करे जो उस समय  में थी।
आज  हिन्दी बहुगम्य भाषा होती जा रही है और विश्व में धीरे धीरे  अपना स्थान बना रही है तो  उसके माध्यम से  विभिन्न विषयों सम्बन्धी ज्ञान को सरल भाषा में विकसित करना होंगा । हिन्दी मंच पर न केवल साहित्यिक विद्वानों को वरन् वैज्ञानिक, सामाजिक और शैक्षिणिक विद्वानों को भी स्थान मिलना चाहिए,

वैसे हिंदी के प्रयोग मे आने बाली कई समस्याओं का हल काफ़ी हद तक हो रहा है, परंतु उनकी गति अभी  बहुत ही धीमी है। जो लोग  विदेशों में कार्यरत हैं और जिनका हिन्दी- भाषा पर पूरा अधिकार है, वे ऐसे मार्ग खोज सकते हैं।जिससे उन देशो मे प्रचार हो और प्रयोग एवं प्रचार  करने का प्रयास कर सकते है  आमतौर पर  हिन्दी- भाषा को उसके  साहित्य से ही  जाना जाता है, विभिन्न भाषाओं से अनुवाद भी अधिकांशत: साहित्य का ही होता हैं, जबकि कि विज्ञान और तकनीकी विषयों का अनुवाद हिन्दी में सरल, मानक और बोधगम्य रूप में जरूरी हो गया है । क्लिष्ट शब्द और त्रुटिपूर्ण अनुवाद लोगों को हिन्दी से दूर कर रहे हैं। कितने ही ऐसे विषय हैं जिनका हिन्दी में ठीक से अनुवाद नहीं हो पा रहा है, जो वर्तमान युग के लिए महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि अंग्रेज़ी हर व्यक्ति की ज़रूरत बनती जा रही है। अत: हमारा प्रयत्न यह होना चाहिए कि नई पीढ़ी सक्षम अनुवादकों/भाषान्तरकारों की होनी चाहिए जिनका अंग्रेज़ी-हिन्दी पर समानाधिकार हो, साथ ही उन्हें विज्ञान और तकनीकी की पूर्ण जानकारी हो।

। हिन्दी भाषा का मौखिक स्वरूप तो बहु-लोकप्रिय है। परंतु जो लेखन और लिपि से सम्बन्धित है, उसमें सरलता और सहजता की अत्यन्त आवश्यकता है, जिससे लिखने में  भी इसका प्रयोग अधिकाधिक हो सके। इसके लिए यद्यपि काफ़ी कार्य हुआ है, मानक रूप भी तैयार हुआ है तथापि अभी तक भी वह इतना सरल नहीं हुआ है कि लोग इसे आसानी से अपना सकें। जन-सामान्य में अभी भी काफ़ी भ्रांतियाँ हैं,  अत: साहित्य को छोड़ कर इनके प्रयोग में उदारता बरती जाए और सरलीकरण की ओर कदम बढ़ाएं जाएं,तो लोग रोमन-लिपि का सहारा लेना छोड़ सकते हैं।
कंप्यूटर हिन्दी में सहज होना चाहिए। हिन्दी के  जानने बाले विद्बान कंप्यूटर की जानकारी  कम रखते हैं, जिसके कारण वे अपनी बात अन्तर्जाल(internet) पर नहीं कह पाते हैं । आज हो यह रहा है कि जो वर्ग कंप्यूटर जानता है, उनका हिन्दी ज्ञान कम है और जिनको हिन्दी-ज्ञान है, वे कंप्यूटर नहीं जानते। यही कारण है कि अन्तर्जाल पर हिन्दी के माध्यम से जो सूचनाएं मिलनी चाहिए वे सब अंग्रेज़ी में सहज उपलब्ध हैं इसीलिए अंग्रेज़ी का प्रयोग दिन-ब दिन बढ़ता जा रहा है। इन पर हिन्दी में काम होना चाहिए और पूर्ण प्रचार-प्रसार होना चाहिए जिससे जन-सामान्य भी इसका उपयोग कर सकें। उदाहरण के लिए जैसे - कंप्यूटर में लिखने के लिपि-अक्षर(फ़ॊन्ट्स) अब ‘य़ूनिकोड’ में बहुत सरल हो गए हैं, जिनके कारण अब प्रयोग आसान हो गया है | विभिन्न राजकीय दफ़्तरों में हिन्दी भाषा अधिकारी नियुक्त  हैं और कंप्यूटर पर हिन्दी में काम करते हैं,पर बे भी प्रचारकरने मे रूचि नही लेते  जबकि ये जानकारी हिन्दी-जगत को होनी चाहिए। यह तभी हो सकता है जब कंप्यूटर पर कार्य करने वाला भारतीय इसके लिए स्वम आगे आये  और इसमें कुशलता का विकास करे।

एक समस्या है  ‘शब्दकोश’ की। हिन्दी–शब्दकोश का प्रयोग हिन्दी  जानने वालों के लिए ही  बड़ा  मुस्किल होता है।  हिन्दीतर प्रदेशों के लोगों को बार-बार शब्दकोश देखने की आवश्यकता होती रहेती  है,अत: शब्दकोश को वर्णमाला क्रम के अनुसार मानक और सहज बनाया जाय तो यह एक वरदान हो जाएगा। 

अत एक लेख के  सभी पाठको से मेरा नम्र निवेदन है कि हिन्दी को सरल, सह्ज और बहुगम्य बनाने की राह में जो अवरोध आ रहे हैं उन पर उदारता से विचार कर निष्कर्ष निकालें और हिन्दी भाषा को सुव्यवस्थित रूप में विस्तरित होने का अवसर दें, अन्यथा अरबो लोगो की प्यारी ये भाषा तो सरिता की भाँति है जो अपना रास्ता जल  की भाँति निकाल ही लेगी, और  सही प्रयासों से जल्द ही  हिंदी हमारे माथे की बिन्दी ही नही दिल की महारानी भी बन   सकती है  ! इस को  कोई खतरा नही है |

Monday, September 9, 2013

हिंदी ब्लोगिंग !

नव परिवेर्तनो के दौर मे हिंदी ब्लोगिंग !

 इन्टरनेट युग  मे जुड़े लोगो की  आवश्यकता, उपयोगिता, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय दुनिया से तत्काल  अपने लेख  के जरिए जुड़ने वालों की बढ़ती संख्या को देखते हुये आज ब्लॉगिंग जैसे सफल संचार माध्यम को लोकतंत्र का  पॉचवा स्तम्भ माना जा सकता है । बर्तमान युग मे  इसे वैकल्पिक मीडिया तो कोई न्यू मीडिया की संज्ञा से नवाजने लगा है ।लेकिन इसे स्वतंत्र मीडिया कहना अधिक उचित लगता है 
दुनिया बड़ी तेज़ी से बदल रही है इसकी आवश्यकता ,सामाजिकता सवेदनशीलता सब की जरूरत प्रतिदिन बदलती है इसी तरह एस दौर मे हिंदी ब्लोगिंग बड़ी सफल होती , लोकप्रिय कला है ! 
जिसकी  सफलता के पीछे दो प्रमुख कारण हैं जिनमें पहला तो यह कि ब्लॉगों की शुरूआत से पहले आम आदमी इंटरनेट पर केवल एक दर्शक था। जिनमे रूचि थी समय था पर माध्यम नही था 

ब्लॉगिंग ने उसे दर्शक से लेखक बनाकर उसके हाथ में ऐसा  कलंम दिया जिससे वह दुनिया के किसी भी कोने में पलक झपकते अपनी बात साझा कर  सकता है । दूसरा और इसकी लोकप्रियता का सबसे प्रमुख कारण यह है कि इस पर हम अपनी भाषा का उपयोग करते हुए इसका उपयोग किया जा सकता है । इसने उन लोगों मे भी रूचि जगा दी है जिनमे  इंटरनेट के अन्य उपयोगो  में कोई रुचि नहीं थी।

हमारे देश मे इस विद्यया को प्रचलन मे आये अधिक समय नही हुआ है | लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसकी लोकप्रियता बड़ी  तेजी से बढ़ी है। अभिव्यक्ति के इसके गुण अन्य किसी मीडिया माध्यम मे नही है |

ए दौर मे  ब्लॉगरों को चिट्ठाकार कहा जाने लगा है । शुरूआत से ही ये लेखन रसिको को बहुत भाया है और इसके पाठक भी अब लाखो मे है और हर नए - पुराने समकालीन विषयों पर काम हो रहा है |नये और अनोखे विषयो पर काम हो रहा है और उच्च कोटि का काम हो रहा है | 

हर  मुद्दे पर अपने विचार व्यक्त करने,बिरोध करने ,  डायरी लिखने, ज्ञान .- विज्ञानं के बाते राजनितिक मुद्दो पर खुल  कर बाते हो रही है । नव कल मे इसे  इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का माध्यम कहा जाता है क्योंकि कैसा भी लिखे कोई संपादक नही है |

आज एस माध्यम के लोक प्रिय लेखको की 
 मुख्य धारा के लेखक बनाने की सम्भावना भी बनती है तोबल्कि ब्लॉगर अपने ब्लॉग की लोकप्रियता के अनुसार लाखों रुपए हर महीने कमा सकते है । कंपनियाँ अपने उत्पादों का प्रचार करने के लिए ब्लॉगरों की मदद लेती हैं और विज्ञापन देने वाली कंपनियाँ विज्ञापन पोस्ट करने के लिए। साथ ही


हिन्दी ब्लॉगिंग की लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि  कई नामी  राजनीतिक ,सामाजिक  और फिल्मी हस्तियाँ इससे जुड़े हैं।दूर  विदेशों में बसे हिन्दीभाषी एस माध्यम से जुड़ कर अपने को देश से जुड़ा महसूस करते है  और देश के  छोटे-छोटे स्थानों  से भी ब्लॉगर अपने  आगे आ रहे है ।

Tuesday, September 3, 2013

८४ कोष सत्ता परिक्रमा !

८४ कोष सत्ता परिक्रमा !
बी ज पी के उत्तेर प्रदेश के चुनाव प्रमुख नेता अमित शाह की अयोद्दया की यात्रा , अब बी एच पी की ये ८४ कोसी परिक्रमा , हिन्दू मतों के लिए , फिर बीजेपी आत्मघाती योजनाये बना रही है | जबकि सत्ता के लिए थाली सजा कर खुद कांग्रेस उनके हाथ मे मुद्दे दे रही है | जरुरत है सडको पर आकर पुरे देश के गली -गली नगर नगर जाकर ८४ हज़ार कोसी करने की , जिसमे जनता जुड़े , नेता हो, समस्यायों पर मुद्दों पर बात हो ,विकास के सुझाव लिए- दिए जाये हल दिया जाये सरकार को ,|काश … अगर आद्बानी जी अब फिर रथ यात्रा पर निकलेजिसमे सरकारी चोरी . कायरता , बैमानी ,कुशासन . विफल योजनायो पर लोगो को समझाए तो हिन्दू मुस्लिम का भेद भुला कर उनकी मूल समस्या पर बात करे तो .. मोदी जी गुजरात मे ही खुश रहेंगे अगली बार के प्रधान मंत्री उम्मीदवार के रूप में |एनी दलों को भी साथ देना होना |
बीजेपी ने जिन मुद्दो को सत्ता मे आने के बाद भुला दिया था |जिसे उस समय गड्बंधन की मज़बूरी का नाम दिया गया |तो फिर अब उसको उडाकर अपनी विस्वस नियता पर प्रशनचिन्ह लगवा रही है | जरुरत तो है एक साथ मिलकर उत्सह से आगे बदने की पर आपसी मतभेद के चलते अभी तक वो मजबूत विपक्ष नही बना पाया है | कई मुद्दों पर कांग्रेस का साथ देकर अपना पार्टी विद डिफरेंस का नारा भुला दिया है !
RTI से राजनितिक दलों को दूर रखने बाले कानून पर सहमति हो या अपराधइयो के चुनाव लड़ने से रोक का विधेयक हो ,कांग्रेस का साथ देकर देश के साथ धोका देने बाला काम किया है |
अब बीजेपी कितने ही टोटके कर ले पर सत्ता पाने के लिए अगर अयोद्ध्या मे राम मंदिर, समान नागरिक सहिता या कश्मीर मे धारा ३७० हटाने की बात दुबारा की तो उसे जनता की नफरत का सामना ही करना होंगा | क्युकी एक तो इन मुद्दो पर वास्तव मे राजनीति की अलावा बी जे पी ने सरकार बनाने के बाद भी कुछ नही किया था | दुसरे वर्तमान सरकार की हर मोर्चे पर विफलता से निराश जनता , देश की मूल समस्यायों का हल करने बाली स्पस्ट और निश्चित योजनायो पर चलने बाले राह पर जाना चाहती है |जो एस देश को वास्तव मे विकास और रोजगार दिलवाए | चारो अरफ फैली बईमानी और चोरी से निजाद मिले | मजबूत विदेश निति हो सर्व धर्म समान हो , त्रुस्तिक्रण बंद हो | अगर हिन्दू वोटो का धुरुविकरण करने की कोई निति बनाई गयी है तो वो पूर्णत असफल सिद्द होंगी | क्युकी बक्त और जनता दोनों अब बदल गये है | केंद्र मे सत्ता के लिए देश भर से समर्थन मिलना जरुरी होता है | जिसमे अभी ये दल अभी कामयाब नही हो पाया है | और दलों का साथ भी लेना होंगा अब तो सबसे जरुरी है आपस में एकता , और मजबूती से नेतार्त्व के साथ पार्टी कार्यकर्ता का जुड़ना , पर अभी तक मोदी जी के साथ पूर्ण मन से इनका उच्च शक्ति प्राप्त समूह नही जुड़ पाया है | जो अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है अब तो बी जेपी को देख कर यही लगता है की अब येन केन प्रकरण कांग्रेस को सत्ता पाने से कोई नही रोक सकता | और ये दल ८४ कोसी तो क्या ८४ हजार कोसी परिक्रमा भी करता रहे , करता रहेंगा पर सत्ता के केंद्र मे इस बार भी नही आ पायेंगा |प्रधानमंत्री के रूप मे कभी कोई रामलला के दर्शन करने नही जा पाएंगा |
अभी बाकि है
अमन अन्गिरिशी