आसाराम ने साधू और संत परम्परा को बदनाम कर दिया है | उनके कुकृत्य संत समाज के लिए बेहद शर्मनाक है इस प्रकार के अपराध हर धर्म के ठेकेदार खुले आम करते रहे है पर जनता की आँखों पर कोन सी पट्टी बंधी रहेती है अधिकतर साधू कॉर्पोरेट तरीके से काम करते है , हर सहर मे इनके खास चेले होते है जो आश्रम चलाकर प्रचार से , बल ,धन - और तन की अय्याशियों का इंतजाम करते है और जिसमे इनका निश्चित हिस्सा होता है | इसमे सहायक होते है राजनीतिक जो इनके पीछे जुटी भीड़ को देख कर, हर तरह की मदद करने मे आगे रहेते है |और एन अपराधियों को अपने फायदे के लिए सरक्षण देते है |
आसाराम ने साधू और संत परम्परा को बदनाम कर दिया है | उनके कुकृत्य संत समाज के लिए बेहद शर्मनाक है |जिस प्रकार संत होने का नाटक करके सम्पति और बल का प्रदर्शन किया जाता था उससे ही पता चलता था की ये कितना पहुचा हुआ संत है | भागवत गीता के अनुसार जिन संतों में निम्न चार विशेषताएँ हों , वे ही सच्चे संत कहलाने योग्य हैं :-
[ १ ] त्याग - स्वरूप से पदार्थों का त्याग | जैसे संन्यासाश्रम में मान - बडाई , कंचन - कामिनी का त्याग |पर वर्तमान संत ? क्या त्याग पाए ?
[ २ ] संयम - इन्द्रिय , मन अपने वश में रखना , इसका नाम संयम है |इनकी सारी इंद्रिय जरूरत से जाएदा तेज है
[ ३ ] वैराग्य - वस्तुओं में जिसका राग नहीं है | संयम तो सकामी योगी भी कर सकते हैं बड़े - बड़े आश्रम सारी सुविधाए फिर वैराग्य कहा ? | मन , इन्द्रियों का संयम किये बिना समाधि नहीं होती | संयम का मतलब है वश में कर लेना | इन्द्रियों को वश में कर लेना एक चीज है , विषयों से हटाना एक चीज है , उनमें राग का अभाव कर देना एक चीज है | भगवान ने गीता [ २ / ५९ ] में कहा है " इन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण न करनेवाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत हो जाते हैं , परन्तु उनमें रहनेवाली आसक्ति निवृत नहीं होती | |
[ ४ ] उपरामता - जैसे शाकाहारी का मन किसी मासाहारी भोज़न की तरफ उसकी वृति जाती ही नहीं , इस प्रकार की वृति का नाम ' उपरामता ' है |जब स्वरूप से विषयों का त्याग कर देते हैं | वह त्याग है किन्तु विषयों में राग होने के कारण उपरामता नहीं है | जिसके साथ राग का अभाव होकर स्वत: उपरति होती है , वह उपरामता है | राग का अभाव हो वह उपरति है , तथा वैराग्ययुक्त उपरति हो , वही उपरामता है |
अब जब ये संत मद- और बल मे चूर होकर सत्ता को ही नतमस्तक केर देते हो तो उनके लिए गीता उपदेश क्या मायने रखते है ?
पर इस प्रकार के अपराध हर धर्म के ठेकेदार हजारो सालो से खुले आम करते रहे है पर पता नही की जनता की आँखों पर कोन सी पट्टी बंधी रहेती है जो इनके लिए अपनी तर्क शक्ति को भूल कर, इनकी भक्ति मे बर्बाद होते है | बास्तव मे इनकी भक्त जनता को मनोचित्सक की जरुरत होती है पर सहारा इनका लेती है अधिकतर कपटी - साधू कॉर्पोरेट तरीके से काम करते है , हर सहर मे इनके खास चेले होते है जो आश्रम चलाकर नियोजित चमत्कारों के प्रचार से ,जनता पर प्रभाव बनाते है और इनके लिए बल ,धन - और तन की अय्याशियों का इंतजाम करते है और जिसमे सबका निश्चित हिस्साबटन रूप मे होता है | इसमे सहायक होते है राजनीतिक ताकते , जो इनके पीछे जुटी भीड़ को देख कर, हर तरह की मदद करने मे आगे रहेते है और इस कारन प्रशाशन भी नतमस्तक रहेता है | और एन अपराधियों को अपने फायदे के लिए सरक्षण देते है |
सबसे बड़ी गलती तो जनता की है जो खुली आँखों से कुछ भी देखना ही नही चाहती , आंखे मुन्धे इनके भजन करती है |
बड़े बड़े नेता इनके पास शान्ति जाते रहे है इनपर पर विभिन्न आश्रमों से लगी ज़मीनें भी गैरकानूनी रूप से दबाने के कई मामले आरोपित हैं. इन पर भी लगे हाथ कार्यवाही की जाना चाहिए. आसाराम सहित कुछ और कथित बाबाओं पर काले धन को सफ़ेद करने के आरोप लगे थे जिसमे बड़े उधोगपति और नेता लोग सामिल रहेते है |. इस विषय में जांच होनी जरुरी है और जरूरी यह है कि सभी अधर्मी, पाखंडी, दुश्चरित्र व्यक्ति पर उक्त तमाम आरोपों की गहरी छानबीन और जांच हो और सख्त सजा इसे दी जावे साथ ही इसकी साधू वेश में शैतान वाली छवि को व्यापक रूप से प्रसारित किया जावे ताकि यह फिर कभी जनता को मुंह दिखाने लायक न बचे.और जनता की सोच बदले !जनता अपना सुख कर्म बाद मे देखे | एन दुस्क्रमियो के जल मे फास कर अपना घर परिवार बर्बाद न करे |अब एन संतो को राम राम बोलना जरूरी है !
आसाराम ने साधू और संत परम्परा को बदनाम कर दिया है | उनके कुकृत्य संत समाज के लिए बेहद शर्मनाक है |जिस प्रकार संत होने का नाटक करके सम्पति और बल का प्रदर्शन किया जाता था उससे ही पता चलता था की ये कितना पहुचा हुआ संत है | भागवत गीता के अनुसार जिन संतों में निम्न चार विशेषताएँ हों , वे ही सच्चे संत कहलाने योग्य हैं :-
[ १ ] त्याग - स्वरूप से पदार्थों का त्याग | जैसे संन्यासाश्रम में मान - बडाई , कंचन - कामिनी का त्याग |पर वर्तमान संत ? क्या त्याग पाए ?
[ २ ] संयम - इन्द्रिय , मन अपने वश में रखना , इसका नाम संयम है |इनकी सारी इंद्रिय जरूरत से जाएदा तेज है
[ ३ ] वैराग्य - वस्तुओं में जिसका राग नहीं है | संयम तो सकामी योगी भी कर सकते हैं बड़े - बड़े आश्रम सारी सुविधाए फिर वैराग्य कहा ? | मन , इन्द्रियों का संयम किये बिना समाधि नहीं होती | संयम का मतलब है वश में कर लेना | इन्द्रियों को वश में कर लेना एक चीज है , विषयों से हटाना एक चीज है , उनमें राग का अभाव कर देना एक चीज है | भगवान ने गीता [ २ / ५९ ] में कहा है " इन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण न करनेवाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत हो जाते हैं , परन्तु उनमें रहनेवाली आसक्ति निवृत नहीं होती | |
[ ४ ] उपरामता - जैसे शाकाहारी का मन किसी मासाहारी भोज़न की तरफ उसकी वृति जाती ही नहीं , इस प्रकार की वृति का नाम ' उपरामता ' है |जब स्वरूप से विषयों का त्याग कर देते हैं | वह त्याग है किन्तु विषयों में राग होने के कारण उपरामता नहीं है | जिसके साथ राग का अभाव होकर स्वत: उपरति होती है , वह उपरामता है | राग का अभाव हो वह उपरति है , तथा वैराग्ययुक्त उपरति हो , वही उपरामता है |
अब जब ये संत मद- और बल मे चूर होकर सत्ता को ही नतमस्तक केर देते हो तो उनके लिए गीता उपदेश क्या मायने रखते है ?
पर इस प्रकार के अपराध हर धर्म के ठेकेदार हजारो सालो से खुले आम करते रहे है पर पता नही की जनता की आँखों पर कोन सी पट्टी बंधी रहेती है जो इनके लिए अपनी तर्क शक्ति को भूल कर, इनकी भक्ति मे बर्बाद होते है | बास्तव मे इनकी भक्त जनता को मनोचित्सक की जरुरत होती है पर सहारा इनका लेती है अधिकतर कपटी - साधू कॉर्पोरेट तरीके से काम करते है , हर सहर मे इनके खास चेले होते है जो आश्रम चलाकर नियोजित चमत्कारों के प्रचार से ,जनता पर प्रभाव बनाते है और इनके लिए बल ,धन - और तन की अय्याशियों का इंतजाम करते है और जिसमे सबका निश्चित हिस्साबटन रूप मे होता है | इसमे सहायक होते है राजनीतिक ताकते , जो इनके पीछे जुटी भीड़ को देख कर, हर तरह की मदद करने मे आगे रहेते है और इस कारन प्रशाशन भी नतमस्तक रहेता है | और एन अपराधियों को अपने फायदे के लिए सरक्षण देते है |
सबसे बड़ी गलती तो जनता की है जो खुली आँखों से कुछ भी देखना ही नही चाहती , आंखे मुन्धे इनके भजन करती है |
बड़े बड़े नेता इनके पास शान्ति जाते रहे है इनपर पर विभिन्न आश्रमों से लगी ज़मीनें भी गैरकानूनी रूप से दबाने के कई मामले आरोपित हैं. इन पर भी लगे हाथ कार्यवाही की जाना चाहिए. आसाराम सहित कुछ और कथित बाबाओं पर काले धन को सफ़ेद करने के आरोप लगे थे जिसमे बड़े उधोगपति और नेता लोग सामिल रहेते है |. इस विषय में जांच होनी जरुरी है और जरूरी यह है कि सभी अधर्मी, पाखंडी, दुश्चरित्र व्यक्ति पर उक्त तमाम आरोपों की गहरी छानबीन और जांच हो और सख्त सजा इसे दी जावे साथ ही इसकी साधू वेश में शैतान वाली छवि को व्यापक रूप से प्रसारित किया जावे ताकि यह फिर कभी जनता को मुंह दिखाने लायक न बचे.और जनता की सोच बदले !जनता अपना सुख कर्म बाद मे देखे | एन दुस्क्रमियो के जल मे फास कर अपना घर परिवार बर्बाद न करे |अब एन संतो को राम राम बोलना जरूरी है !
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