कोई भी भाषा हमारे लिए बोलचाल का एक माध्यम होती है|मानव भाव के संप्रेषण का एक माध्यम होती है। इसके द्वारा हम अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं और सम्पूर्ण प्राणी जगत और लोगों के विचार जान सकते हैं| जब से मानवजाति का उदय हुआ तब से ही बह कोई न कोई भाषा का उपयोग कर रहा है चाहे वह ध्वनि के रूप में हो या सांकेतिक रूप जिसमे लिखित या चित्रित हो सकते है में या अन्य किसी रूप में विचारों को व्यक्त करने के लिए उसे भाषा की आवश्यकता होती है। हा कभी कभी अमेल भाषी होने पर संकेतो या भावो का प्रयोग भी किया जाता है |हिंदी भी विश्व की प्रमुख भाषा है जिसको अभी तक देश की मुख्य धारा मे नही माना जाता जबकि इसको बोलने बाले दुनिया मे दुसरे सबसे बड़े वर्ग मे है |
आज हिन्दी भारत के प्रमुख राज्य जैसे मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार राजस्थान, हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश में प्रमुख रूप से बोली जाती है और महारास्त्र गुजरात उड़ीसा जम्मू कश्मीर जैसे प्रान्तों मे समझी और अल्प मात्रा प्रयोग करी जाती है |
कोई राष्ट्रभाषा संपूर्ण देश में भावात्मक तथा सांस्कृतिक एकता स्थापित करने का प्रधान साधन होती है। इसे बोलने वालों की संख्या सबसे अधिक होती है।
कोई एक भाषा किसी एक राष्ट्र के लिए आवश्यक है । भाषा राष्ट्र की एकता, खंडता तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि राष्ट्र को एक रखना है मजबूत बनाना है तो उसकी एक भाषा हो जो नागरिको को स्वीक्रत होनी चाहिए। इससे धार्मिक सामाजिक तथा सांस्कृतिक एकता बढ़ती है। यह शक्तिशाली राष्ट्र के लिए आवश्यक है। इसलिए हर विकसित तथा स्वाभिमानी देश की अपनी एक भाषा अवश्य होती है जिसे राष्ट्रभाषा का गौरव प्राप्त होता है।
क्या किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाया जा सकता है। किसी भी देश की राष्ट्रभाषा उसे ही बनाया जाता है जो उस देश में व्यापक रूप में फैली होती है। संपूर्ण देश में यह संपर्क भाषा व्यवहार में लाई जाती है। हम सभी इस बात को मानते हैं कि हिन्दी भाषा बोलने में, लिखने में, पढ़ने में सरल है। हिन्दी की साहित्यिक गरिमा और लिपि की वैज्ञानिकता से सभी सहमत हैं। अनेक बाधाओं, व्यवधानों और उतार-चढ़ाव के बावज़ूद भी आज हिन्दी विश्व-मंच पर अपना स्थान बनाती जा रही है, यह हमारे देश के लिए बहुत ही गर्व की बात है। हिन्दी भाषा आज के युग की भाषा बने, विज्ञान और नई तकनीक की भाषा बने, यह आज के युग की माँग है
आज हिन्दी भारत के प्रमुख राज्य जैसे मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार राजस्थान, हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश में प्रमुख रूप से बोली जाती है और महारास्त्र गुजरात उड़ीसा जम्मू कश्मीर जैसे प्रान्तों मे समझी और अल्प मात्रा प्रयोग करी जाती है |
कोई राष्ट्रभाषा संपूर्ण देश में भावात्मक तथा सांस्कृतिक एकता स्थापित करने का प्रधान साधन होती है। इसे बोलने वालों की संख्या सबसे अधिक होती है।
क्या किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाया जा सकता है। किसी भी देश की राष्ट्रभाषा उसे ही बनाया जाता है जो उस देश में व्यापक रूप में फैली होती है। संपूर्ण देश में यह संपर्क भाषा व्यवहार में लाई जाती है। हम सभी इस बात को मानते हैं कि हिन्दी भाषा बोलने में, लिखने में, पढ़ने में सरल है। हिन्दी की साहित्यिक गरिमा और लिपि की वैज्ञानिकता से सभी सहमत हैं। अनेक बाधाओं, व्यवधानों और उतार-चढ़ाव के बावज़ूद भी आज हिन्दी विश्व-मंच पर अपना स्थान बनाती जा रही है, यह हमारे देश के लिए बहुत ही गर्व की बात है। हिन्दी भाषा आज के युग की भाषा बने, विज्ञान और नई तकनीक की भाषा बने, यह आज के युग की माँग है
भारत प्राचीन काल से ही साहित्यिक,सामाजिक , सांस्कॄतिक और वैज्ञानिक दॄष्टि से अति समृद्ध रहा है, लेकिन उसके इस समृद्ध-कोश को विदेशियों द्वारा कभी चुराया गया तो कभी जलाया गया है। आज आवश्यकता है कि हम अपने पुराने गौरव को प्राप्त करे और फ़िर से दुनिया के साथ आगे बढ़ें और भारत की उस गरिमा को प्राप्त करे जो उस समय में थी।
आज हिन्दी बहुगम्य भाषा होती जा रही है और विश्व में धीरे धीरे अपना स्थान बना रही है तो उसके माध्यम से विभिन्न विषयों सम्बन्धी ज्ञान को सरल भाषा में विकसित करना होंगा । हिन्दी मंच पर न केवल साहित्यिक विद्वानों को वरन् वैज्ञानिक, सामाजिक और शैक्षिणिक विद्वानों को भी स्थान मिलना चाहिए,
वैसे हिंदी के प्रयोग मे आने बाली कई समस्याओं का हल काफ़ी हद तक हो रहा है, परंतु उनकी गति अभी बहुत ही धीमी है। जो लोग विदेशों में कार्यरत हैं और जिनका हिन्दी- भाषा पर पूरा अधिकार है, वे ऐसे मार्ग खोज सकते हैं।जिससे उन देशो मे प्रचार हो और प्रयोग एवं प्रचार करने का प्रयास कर सकते है आमतौर पर हिन्दी- भाषा को उसके साहित्य से ही जाना जाता है, विभिन्न भाषाओं से अनुवाद भी अधिकांशत: साहित्य का ही होता हैं, जबकि कि विज्ञान और तकनीकी विषयों का अनुवाद हिन्दी में सरल, मानक और बोधगम्य रूप में जरूरी हो गया है । क्लिष्ट शब्द और त्रुटिपूर्ण अनुवाद लोगों को हिन्दी से दूर कर रहे हैं। कितने ही ऐसे विषय हैं जिनका हिन्दी में ठीक से अनुवाद नहीं हो पा रहा है, जो वर्तमान युग के लिए महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि अंग्रेज़ी हर व्यक्ति की ज़रूरत बनती जा रही है। अत: हमारा प्रयत्न यह होना चाहिए कि नई पीढ़ी सक्षम अनुवादकों/भाषान्तरकारों की होनी चाहिए जिनका अंग्रेज़ी-हिन्दी पर समानाधिकार हो, साथ ही उन्हें विज्ञान और तकनीकी की पूर्ण जानकारी हो।
। हिन्दी भाषा का मौखिक स्वरूप तो बहु-लोकप्रिय है। परंतु जो लेखन और लिपि से सम्बन्धित है, उसमें सरलता और सहजता की अत्यन्त आवश्यकता है, जिससे लिखने में भी इसका प्रयोग अधिकाधिक हो सके। इसके लिए यद्यपि काफ़ी कार्य हुआ है, मानक रूप भी तैयार हुआ है तथापि अभी तक भी वह इतना सरल नहीं हुआ है कि लोग इसे आसानी से अपना सकें। जन-सामान्य में अभी भी काफ़ी भ्रांतियाँ हैं, अत: साहित्य को छोड़ कर इनके प्रयोग में उदारता बरती जाए और सरलीकरण की ओर कदम बढ़ाएं जाएं,तो लोग रोमन-लिपि का सहारा लेना छोड़ सकते हैं।
कंप्यूटर हिन्दी में सहज होना चाहिए। हिन्दी के जानने बाले विद्बान कंप्यूटर की जानकारी कम रखते हैं, जिसके कारण वे अपनी बात अन्तर्जाल(internet) पर नहीं कह पाते हैं । आज हो यह रहा है कि जो वर्ग कंप्यूटर जानता है, उनका हिन्दी ज्ञान कम है और जिनको हिन्दी-ज्ञान है, वे कंप्यूटर नहीं जानते। यही कारण है कि अन्तर्जाल पर हिन्दी के माध्यम से जो सूचनाएं मिलनी चाहिए वे सब अंग्रेज़ी में सहज उपलब्ध हैं इसीलिए अंग्रेज़ी का प्रयोग दिन-ब दिन बढ़ता जा रहा है। इन पर हिन्दी में काम होना चाहिए और पूर्ण प्रचार-प्रसार होना चाहिए जिससे जन-सामान्य भी इसका उपयोग कर सकें। उदाहरण के लिए जैसे - कंप्यूटर में लिखने के लिपि-अक्षर(फ़ॊन्ट्स) अब ‘य़ूनिकोड’ में बहुत सरल हो गए हैं, जिनके कारण अब प्रयोग आसान हो गया है | विभिन्न राजकीय दफ़्तरों में हिन्दी भाषा अधिकारी नियुक्त हैं और कंप्यूटर पर हिन्दी में काम करते हैं,पर बे भी प्रचारकरने मे रूचि नही लेते जबकि ये जानकारी हिन्दी-जगत को होनी चाहिए। यह तभी हो सकता है जब कंप्यूटर पर कार्य करने वाला भारतीय इसके लिए स्वम आगे आये और इसमें कुशलता का विकास करे।
एक समस्या है ‘शब्दकोश’ की। हिन्दी–शब्दकोश का प्रयोग हिन्दी जानने वालों के लिए ही बड़ा मुस्किल होता है। हिन्दीतर प्रदेशों के लोगों को बार-बार शब्दकोश देखने की आवश्यकता होती रहेती है,अत: शब्दकोश को वर्णमाला क्रम के अनुसार मानक और सहज बनाया जाय तो यह एक वरदान हो जाएगा।
अत एक लेख के सभी पाठको से मेरा नम्र निवेदन है कि हिन्दी को सरल, सह्ज और बहुगम्य बनाने की राह में जो अवरोध आ रहे हैं उन पर उदारता से विचार कर निष्कर्ष निकालें और हिन्दी भाषा को सुव्यवस्थित रूप में विस्तरित होने का अवसर दें, अन्यथा अरबो लोगो की प्यारी ये भाषा तो सरिता की भाँति है जो अपना रास्ता जल की भाँति निकाल ही लेगी, और सही प्रयासों से जल्द ही हिंदी हमारे माथे की बिन्दी ही नही दिल की महारानी भी बन सकती है ! इस को कोई खतरा नही है |
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