माँ !
जब माँ थी, तब बड़ी बोझ लगती थी ,उसकी बीबी को,बड़े होते बच्चो को ,खुद उसको भी हर बार गुस्सा आ ही जाता था जब भी किसी की गलती होती, लड़ाई माँ से ही होती थी ।
अरे वो कहा,? किसी पर बोझ थी ? उसके पापा जी की पेन्सन से ही, घर का दूध , बिजली बिल ,अख़बार .राशन बच्चों का ज़ेब खर्च तो पापा जी के टाइम से ही आ रहा था ।जिस पर सबका बराबर हक था ।पर माँ को सब ही अवांछित मानते रहे थे ।
पर माँ का क्या हक था ? ये कभी न सोचा गया ।जिन्दगी यू ही ही चलती गयी ..............
और एक दिन माँ भी आज़ाद हो गयी ......पर खर्चा बड़ा गयी ,उनका पुराना घर था सो एक कमरे में उनका पुराना सामान बंद करके, बाकि किराये पर दे दिया गया ।पेंसन जो बंद हो गयी थी ।
।उस सामान में माँ की तस्वीर थी ।जो उसकी शादी से पहले बड़ी ममतामयी ,तेजोमय दिखती रही ।
शादी के बाद अचानक तस्वीर मे माँ का चेहरा ,धूमिल हो गया था ।साफ़ करने पर ,कुछ दुखी पन का भाव लगने लगा था ।
आज माँ के जाने के 20 साल बाद ,जब उसके सुपुत्र ने उसे घर से निकला तो , रहने के लिये भी यही तो कमरा बचा था , पुत्र के बंगले में, वो नोकरों के माँ -बाप जैसे लगते थे , जिनकी जगह घरो में नही होती ।ओल्ड होम में होती है ।
कमरे को साफ करने में , माँ के बही पुरानी तस्वीर मिली .....पर ! माँ तस्वीर मे मुसकरा रही थी !पहली बार ............पर वो रो रहा था ।
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