Thursday, December 12, 2013

अभी मत जायो नेल्सन .........

नेल्सन मंडेला का 6 दिसंबर, 2013 को निधन हो गया। .
एक और गाँधी बादी नही रहे | जिनके बारे मे ये जाना जाता था की उन्होंने गाँधी जी के सिद्दांतो का जीवन भर पालन किया |
जो दक्षिण अफ्रीका के प्रथम अश्वेत भूतपूर्व राष्ट्रपति थे।उनके देश मे उनको प्यार से मदीबा के नाम से जाना जाता है. यह उनके कबीले का नाम है |राष्ट्रपति बनने से पूर्व वे दक्षिण अफ्रीका में सदियों से चल रहे रंगभेद का विरोध करने वाले अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस और इसके सशस्त्र संगठन उमखोंतो वे सिजवे के अध्यक्ष रहे। रंगभेद विरोधी संघर्ष के कारण उन्होंने 27 वर्ष रॉबेन द्वीप के कारागार में बिताये जहाँ उन्हें कोयला खनिक का काम करना पड़ा था।आज वो स्थल रंगभेद की लड़ाई का धर्मिक स्थल बन चूका है 1990 में श्वेत सरकार से हुए एक समझौते के बाद उन्होंने नये दक्षिण अफ्रीका का निर्माण किया। वे दक्षिण अफ्रीका एवं समूचे विश्व में रंगभेद का विरोध करने के प्रतीक बन गये।
राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला का जन्म 18 जुलाई 1918 को केप प्रांत के मवेजो गांव में हुआ। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद नीति की नीत‍ि के खिलाफ और अफ्रीका के लोगों के स्वराज्य के लिए लड़ाई लड़ी। इसके लिए उन्हें 27 वर्ष रॉबेन द्वीप की जेल में बिताने पड़े। मंडेला का पूरा नाम नेल्सन रोहिल्हाला मंडेला था ।
यह नाम उनके पिता ने उन्हें दिया। रोहिल्हाला का अर्थ होता है पेड़ की डालियों को तोड़ने वाला या प्यारा शैतान बच्चा। नेल्सन के पिता गेडला हेनरी गांव के प्रधान थे। नेल्सन के परिवार का संबंध शाही परिवार से था।तब भी उनकी रूचि आम समाज में थी | नेल्सन की मां एक मेथडिस्ट ईसाई थीं। नेल्सन ने क्लार्क बेरी मिशनरी स्कूल से अपनी आरंभिक पढ़ाई की थी। छात्र जीवन में ही उन्हें रंगभेद नीति का सामना करना पड़ा। स्कूल में उन्हें याद दिलाया जाता कि उनका रंग काला है। अगर वे सीना तानकर चलेंगे तो उन्हें जेल तक जाना पड़ सकता है।महात्मा के जीवन की ट्रेन बाली घटना का उनपर बड़ा प्रभाव पड़ा था |
इस रंगभेद नीति के चलते उनमें एक क्रांतिकारी का जन्म बालक पन मे ही हो रहा था। नेल्सन ने हेल्डटाउन से अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई की। यह अश्वेतों के लिए बनाया गया एक स्पेशल कॉलेज था। यहीं पर उनकी मुलाकात ऑलिवर टाम्बो से हुई जो उनके जीवनभर दोस्त और सहयोगी रहे। उन्होंने अफ्रीका की यूनिवर्सिटी ऑफ फोर्ट हेयर के अलावा, लंदन की यूनिवर्सिटी एक्सटर्नल सिस्टम, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ अफ्रीका और यूनिवर्सिटी ऑफ विटवाटरर्सरैंड में पढ़ाई की।
1940 तक नेल्सन और ऑलिवर अपने राजनीतिक विचारों के कारण कॉलेज में काफी चर्चित हो गए। इस गतिविधि के कारण दोनों को कॉलेज से बाहर कर दिया गया। इसके बाद वे घर लौट आए। घरवाले उनकी शादी की तैयारी करने लगे, लेकिन नेल्सन के मन तो विद्रोह चल रहा था।
वे घर से भागकर जोन्हानसबर्ग आ गए। यहीं पर उनकी मुलाकात वाल्टर सिसलू और वाल्टर एल्बर टाइन से हुई। अश्वेत होने के कारण नेल्सन को नौकरी पर हर रोज अपमानित होना पड़ता। 1944 में उन्होंने मित्र वाल्टर सिसुलू की बहन इवलिन एनतोको मेस से शादी की। बाद में उन्होंने विनी मंडेला और अंत में ग्रेसा माशेल के साथ विवाह किया। अंत में उनकी तीसरी शादी ग्रेसा माशेल से हुई जोकि एक अफ्रीकी देश के पूर्व राष्ट्रपति की पत्नी थीं।
मंडेला ने अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस यूथ लीग की स्थापना की और अफ्रीका के अश्वेत युवाओं को एक नेतृत्वकर्ता दिया। जब पूरे विश्व पर गांधीजी का प्रभाव था, नेल्सन पर भी उनका प्रभाव पड़ा। अश्वेतों को उनका अधिकार दिलाने के लिए 1991 में कनवेंशन फॉर ए डेमोक्रेटिक साउथ अफ्रीका (कोडसा) का गठन किया जो देश में शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन करने की अगुवा बनी। श्वेत नेता डी क्लार्क और मंडला ने इस काम में अपनी समान भागीदारी निभाई। 10 मई 1994 को दक्षिण अफ्रीका में रंगभेदरहित चुनाव हुए।
भारत सरकार की ओर से उन्हें 23 जुलाई 2008 को गाँधी शांति पुरस्कार इससे पहले उन्हें 1979 में जवाहर ‘लाल नेहरु अंतर राष्टीय सदभावना पुरूस्कार’ से भी नवाजा गया था| , 1990 में भारत रत्न पुरस्कार दिया गया।1993 में नेल्सन मंडेला और डी क्लार्क को संयुक्त रूप से शांति के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया।
उनकी पुस्तक ; Mandela, Nelson. Nelson Mandela Speaks: Forging a Democratic, NonracialSouth Africa. New York: Pathfinder, 1993.
Mandela, Nelson. Long Walk to Freedom. The Autobiography of Nelson Mandela. 1994.
Mandela, Nelson. The Struggle Is My Life. , 1986.विश्व भर में बड़ी प्रसिद्ध है |
संयुक्त राष्ट्रसंघ ने उनके जन्म दिन को नेल्सन मंडेला अन्तर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया।दक्षिण अफ्रीका की संसद एक विशेष सत्र बुलाकर नेल्सन मंडेला को श्रद्धांजलि देगी. इस विशेष सत्र में मंडेला परिवार से सदस्य संसद दीर्घा में मौजूद रहेंगे.
दक्षिण अफ्रीका के विदेश मंत्रालय के अनुसार 91 देशों के राष्ट्र प्रमुख नेल्सन मंडेला को श्रद्धांजलि देने के लिए दक्षिण अफ्रीका आये हैं. इसके अलावा 10 पूर्व-राष्ट्रप्रमुख, 86 प्रतिनिधि मंडलों के प्रमुख और 75 गणमान्य लोग आये हैं. स्मृति सभा को दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा ने संबोधित भी किया |
मंगलवार को होने वाली स्मृति सभा में शामिल होने वालों में अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा, फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसुआ ओलांद, क्यूबा के राष्ट्रपति राउल कास्त्रो और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन शामिल हैं. अमरीका के तीन पूर्व-राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश, बिल क्लिंटन और जिमी कार्टर भी इस सभा में शामिल हुए .
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून, यूरोपीय संघ के अध्यक्ष जोसे मैनुएल बारोसो, ब्राजील की राष्ट्रपति डिल्मा रूसेफ, फ़लस्तीनी नेता महमूद अब्बास और भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी स्मृति सभा में शामिल एवं सम्बोथित करने वालों की सूची में हैं.|
इस स्मृति सभा में करीब 95,000 लोगों के शामिल होने अंदाजा है. यह स्मृति सभा दक्षिण अफ्रीका के सोवेटो स्थित एफएनबी स्टेडियम में हुई . नेल्सन मंडेला ने वर्ष 2010 के फ़ुटबॉल विश्व कप के दौरान इसी स्टेडियम में आखिरी बार सार्वजनिक रूप से देखे गए थे.


रंगभेद विरोधी आंदोलन के प्रमुख नेता पीटर गैब्रिएल और बोनो के भी उनके निधन पर शोक प्रकट किया |
भारत देश उनको सदा सम्मान और प्रेम से आदर देता था |उनका भी भारत से विशेष प्रेम था क्युकी दोनों देशो ने रंगभेद की लड़ाई सफलता से लड़ी थी |और दुनिया मे मानवाधिकार की लड़ाई के सफल जिन्दा योद्धा वो ही थे |दुनिया भर मे images (1) उनको पद त्याग के बाद भी ” रास्त्रपति” जी ही कहा जाता था |जैसे भारत मे महात्मा को बापू कहा जाता है |

Wednesday, December 4, 2013

लिव इन नही! नही !

भारत एक विशेष सामाजिक स्थिति बाला देश है | जहा एक तरफ तो एक पीढ़ी ,परिवार ,समाज ,धर्म अभी तक पुरातनपंथी है बही दसरी और नई जनरेशन  नोकरी रोजगार  शिक्षा के लिए बहुत बड़ी संख्या मे  घर शहर से दूर है और पूर्ण  आजादी से जीवन जी रहे है |जिस कारण शादी सस्था  और सामाजिक सम्बन्ध बदल रहे है | जिस कारण विपरीत सेक्स के युवा घर परिवार और आर्थिक  और मनोविज्ञानिक कारणों से आसरा तलाश रहे है जिस कारण  लिव-इन रिलेशनशिप  जैसी नई धारणाये सामने आई है और अभी तक शादी से पहले सेक्‍स को केवल बड़े शहरों तक ही सीमित करके देखा जाता है, लेकिन परंपराओं के गढ़ छोटे शहरों में भी अब यह आम बात बनती जा रही है.|   सेक्स अब पहले की तरह विबाह  के बाद  किया जाने वाला पवित्र अनुष्‍ठान नहीं रह गया | यह सब पिछले 10-15 सालों में बदल गया है.'|'कॉलेज की तो क्या  अब तो स्‍कूल के बच्‍चों में भी ये संबंध आम होने लगे है . चाहे वो माध्‍यमिक स्‍कूल हों या सेकेंडरी, ब्‍वॉयफ्रेंड्स और गर्लफ्रेंड्स होना आम बात है. वे जब मिलते हैं तो सिर्फ हाथ नहीं मिलाते, वे एक दूसरे को गले लगाते हैं | एकांत मे मिलने पर वर्जनाये नही रहेती | आज का युवा प्‍यार के इस उन्‍मुक्‍त तरीके का आनंद ले रहा है.जिसमे बहुत सारी समस्यों का हल भी है |और नई समस्याए भी है | जहां सार्थक संबंध पिछड़ रहे हैं, वहीं थोड़े समय के लिए बनाए गए रिश्‍ते ज्‍यादा पनप रहे हैं.' इस सम्बन्ध मे रिश्तेदारी परिवार योजना  की चिंता और हर चीज की मल्कियत का झगड़ा  करने जैसी आम समस्या  भी नहीं होती है। इस रिलेशनशिप में कपल के सामाने एक दूसरे की जिम्मेदारियों को बांटने जैसी मजबूरियां भी नहीं होती है। .
  • लिव-इन रिलेशनशिप में रहने जोडियों में धोखा, बेवफाई और व्यभिचार की आशंका कम होती है।पर डर जायदा होता है |
  पैसों के मामले में ये  स्वतंत्र होते हैं। इसमें अपने पार्टनर के साथ अपनी कमाई को देने या जोड़ने जैसी बाध्यता नहीं होती है। अपने पैसों का इस्तेमाल पूरी आजादी होता  है ।. लिव इन रिलेशनशिप को  जोड़े के बीच सामंजस्य को परखने के तौर पर भी देखा जा सकता है। ताकि सही जोड़ी होने पर शादी सफल हो  कि क्या आप  साथ रह कर उनसे तालमेल बिठा पा रहे हैं नहीं। कुछ आधुनिक  लोग लंबे समय तक एक ही जोड़ीदार के साथ ऊब जाते हैं। और रोज़ कुछ नया खोजते है | लिव इन रिलेशनशिप ऐसे लोगों के लिए ही है। अगर उन्हें लगे कि वह अब ऊब रहें हैं तो पार्टर बदलने के लिए स्वतंत्र हैं।शादी के उलट इस रिलेशनशिप को तोड़ना ज्यादा आसान होता है। अलग होने से पहले किसी भी तरह की कानूनी पचड़े और उनकी  खानापूर्ति नहीं करनी होती है। अलग होने आपको बस सामान लेकर जाना है और  भावनात्मक पहलू से निपटना होता है। इसमे में आप खुद नियम बनाने के लिए स्वतंत्र होते हैं। इसमें समाज के द्वारा तय किए गए मानक नहीं होते हैं। यह आप पर निर्भर करता है कि इसे  कैसे आगे बढ़ाते हैं।.
  • दोनों पार्टनर अपनी जिम्मेदारियां बिना किसी दबाव ‌के निभाते हैं।
 लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे कपल को शायद ही कभी एक दूसरे के लिए त्याग करना पड़ता है। इस रिलेशनशिप में आप सिर्फ अपने बारे में सोचने के लिए स्वतंत्र होते हैं। आपको अपने पार्टनर के अनुसार अपने स्वभाव में बदलाव करने की मजबूरी भी नहीं होती है।  लिव इन रिलेशनशिप को आप बड़ी आसानी से खत्म कर सकते हैं। यही कारण है कि इसे काफी लोकप्रियता मिल रही है। जब भी आपको लगे कि आप अपने पार्टनर के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं, तो मामला ख़त्म !
  • इस रिश्ते में रहते-रहते आप विवाह के बंधन में भी बंध सकते हैं।अगर कोई पक्ष राज़ी हो |या दुसरे साथी की साथ एक ही समय मे लिव इन कर सकते है 
 छोटे शहरों में भी अब लिव-इन रिलेशशिप्‍स की तादाद बढ़ रही है. प्रेम विवहा पर घरवालों की नापसंदगी  से परेशान आज का युवा अपने  प्‍यार की कुर्बानी देने को तैयार नहीं है, जिसके चलते लिव-इन रिलेशशिप्‍स के प्रति उनका रुझान बढ़ता जा रहा है.|बिना शादी के साथ मिल जाता है |हालांकि  दुनिया के सारे देशों में लिव इन रिलेशनशिप को स्वीकृति नहीं मिली है और इसके लिए कानून बनाए जा रहे हैं। बिना शादी किए दो लोगों का एक साथ रहना पूरब के देशों में अभी भी वजिर्त माना जाता है। वहीं पश्चिम के ज्यादातर देशों में इसको स्वीकृत  किया गया है और वहां के युवाओं नेकाफी समय पूर्व से ये अपनाया है । जिसके दुष्परिनाम भी सामने है जैसे बिन बाप के बच्चे , अल्प आयु मे गर्भधारण , आत्महत्या , पागलपन आदि |
  • उच्चतम न्यायालय ने हॉल ही मे  कहा कि लिव इन रिलेशनशिप  मे  कानून बनाए जाने की जरूरत है क्योंकि इस तरह के संबंध टूटने पर महिलाओं को भुगतना पड़ता है। इसने कहा कि बहरहाल हम इन तथ्यों से मुंह नहीं मोड़ सकते कि इस तरह के संबंधों में असमानता बनी रहती है और इस तरह के संबंध टूटने पर महिला को कष्ट उठाना पड़ता है।
 सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले मे  उलटे चेतावनी दी कि पहली पत्नी और बच्चे उस महिला के खिलाफ मुआवजे का दावा ठोंक सकते हैं,जिसके साथ पुरुष लिव इन सम्बन्ध मे था  क्यूँकि वो उनकी वजह से पति और पिता के प्यार से  वे  वंचित रहे। लेकिन साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा इस तरह के मामलों में अभी तक कोई कानून नहीं है और लिव-इन रिलेशनशिप के ऐसे मामलों में पीड़ित महिला को भी न्याय मिले, इस बारे में नए सिरे से कानून बनाने पर सरकार को सोचना होगा। अब ये सरकार को सोचना होगा की बदलते समाज में बढ़ते लिव-इन रिलेशनशिप के मामलों के मद्दे नजर नए सिरे से कानून बनाये, जिससे किसी भी पक्ष के प्रति अन्याय न हो।लिव इन रिलेशनशिप आज के समय मे तेज़ी  से बढ़ रहा है। एक समय था जब ऐसे संबंधों पर लोग खुलकर बात करना पसंद नहीं करते थे। लेकिन आज लोग खुलकर लिव इन रिलेशन शिप में रहते हैं और इस बात को जगजाहिर भी करते हैं। लिव इन रिलेशनशिप के जहां कुछ फायदे हैं वही इसके कुछ नुकसान भी हैं। यानी जैसे हर सिक्के के नकारात्मक और सकारात्मक पहलू होते हैं, इस रिश्तें में भी कुछ ऐसा ही है। आइए जानें लिव इन रिलेशन के पहलूओं को।परन्तु इस रिश्तो मे ,ये  इश्क  नहीं  आसां , इतना  तो  समझ  लीजिये एक  आग  का  दरिया  है , और  डूब  के  जाना  है इसमे  बंधन में न बंधने की आजादी तो होती है, पर लाइफ में पूरी तरह से एन्जॉय नहीं कर पाते, क्योंकि अविश्वास की भावना पनपने का डर बना रहता है।
  • कहीं आपका पार्टनर आपको छोड़ न दे इस तरह का डर मन में हमेशा बना रहता है, जिससे तनाव की स्थितियां भी उत्पन्न हो जाती है।
  • एक दूसरे के वर्क स्टाइल या कल्चर को ना समझ पाने के कारण भी दिक्कतें आने लगती हैं।
  • लिव इन रिलेशनशिप में आप परिवार की खुशी का मजा नहीं ले सकते। 
  • परिबार समाज के उत्सव , समारोह आदि से दूरी बन जाती है |
  • आप शुरूआत में प्यार और भावनात्मक रूप से तो जुड़ते है पर शारीरिक संबंधो से ऊब हो जाने के बाद लड़ाई झगडे बहुत बड़ते है और फूलो के कांटे दर्द देने लगते है | जिससे बोरियत होने लगती है। 
  • थी  हमारी  क़िस्मत  के  विसाले  यार  होता 
अगर  और  जीते  रहते , यही   इंतज़ार  होता  उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष की पीठ  ने कहा कि वित्तीय और घरेलू इंतजाम, परस्पर जिम्मेदारी का निर्वाह, यौन संबंध, बच्चे को जन्म देना  उनकी बेधता और उनकी परवरिश करना, लोगों से घुलना-मिलना तथा संबंधित लोगों की नीयत और व्यवहार कुछ ऐसे मापदंड हैं जिनके आधार पर संबंधों के स्वरूप के बारे में जानने के लिए विचार किया जा सकता है।अत भारत जैसे सामाजिक निर्भरता बाले देश मे एस प्रकार के सम्बन्ध एक सीमा तक ही प्रचालन मे आ सकते है | सर्वलोकपिर्ये  और स्वीक्रत  नही  हो सकते |और अभी कितने जोड़े होंगे ?जो सामने आकर बोल सके ? यहा पर अधिकतम  आवादी गावो मे बस्ती है जहा के सामाजिक कानून बड़े कड़े होते है |वहा तो अभी तक प्रेम विबाह तक को मान्यता नही मिल  पाई है |

Tuesday, December 3, 2013

बलात्कार अब राजनीतिक मुद्दा !

आजकल अखबारों मे दो खबरों पर बहुत शोर मच रहा है ! एक तो मोदी जी के विरुद्ध एक महिला की जासूसी के आरोप दुसरे तरुण तेजपाल की विरुद्ध यौन अपराध का आरोप !
अगर प्राप्त अखबारों के अनुसार उनपर विश्वास किया जाये तो अधिकतर इस बात पर जोर दे रहे है की मोदी ने बहुत बड़ा अपराध किया है जो गुजरात शासन के अधिकारियो ने किसी लाचार पिता के कहेने पर बेटी को सुरक्षा देने की बात करी है और मोदी जी के विरुद्ध ना सबूत है ना खुद महिला और तेजपाल जी को गोवा सरकार मुजरिम बना रही है | नही तो वो तो अपराध कर ही नही सकते | सरकारी पत्रकार जो है |जिन्होंने देश की मुख्य गैर कांग्रेसी पार्टी बी जे पी को हनी ट्रेप मे फसाकर बदनाम करने मे काला धन का इस्तमाल किया था |और सत्ता मे आकर देश का बंटाधार करने और खुद मस्ती मारने की छुट इनको दी गयी थी |
बहुत बड़े बड़े लोग जो मोदी जी विरुद्ध ज्वालामुखी बने हुए थे ,गिरगिट की तरह रंग बदल गए और अचानक तेजपाल के लिए बकालत करने उतर पड़े है !मानो उनके सत्ता खेल को किसी ने विगाड़ दिया हो | ये कैसी राजनीति है और कैसा कानून ?जिसकी कोई भी मजाक बना ले सत्ता मे बेठ कर |
बाल की खाल निकलने मे माहिर , बक्तायो को तेजपाल पर बोलने का बक्त ही नही मिल रहा है |अभी सोच मे है की केसे उस महिला को जूठा साबित करे |या उसके चरित्र का हनन किया जा सके | बड़े बकील साहब सत्ता के ठेकेदार जिन्होंने पैसा दिया ( काला या सफेद ) और देते रहे तहलका मचाने को विपक्षी दलों के खात्मे के लिए , उनसे कोई कुछ नही पूछ रहा की क्या क्या होता है ? पैसे का इन पत्रकारों की अय्याशियों मे |
कोन है ये तेजपाल ? किसके पैसे से अय्याशिया करते है ये सत्ता के दलाल ? जनता को समझ आ गया है …..
और भारतीय मिडिया तो पूरी तरहा पीले रंग मे रंग गया है | पीत पत्रकरिता के
कारण ही तो सही खबरों के लिए जनमत का रुझान इन्टरनेट की तरफ हो रहा है | जिस कारण अब खरीदे गए लोग सोशल मिडिया पर भी रोक लगाने के लिए तड़फ रहे है |पर अब जाएदा दिन नही बचे है इनके पास , ये इन्हे भी पता है | इसलिए सारे एकमत होकर देश हित मे लगे सारे तत्वों को गलत सिद्ध करना चाहते है
| इसी काले धन से पैदा पीले रंग को केसरिया रंग पर सुनियोजित तरीके से चडाने का असफल
प्रयास कर रहा है मिडिया | एक तरफ तो कहेते है लोकतंत्र है फिर .. मोदी जी के पीछे क्यों पड़ गये है सारे एक होकर | जहा महिला या किसी पक्ष के तरफ से शिकायत भी दर्ज नही है तो भी मोदी जी का नाम महिला की जासूसी
मे बिना सबूत के लिया जा रहा है | और प्रयोजित प्रदर्शन भी होने लगे है
तथाकथित नारी संगठनो के अनेक स्थानों पर ,
और जहा तेजपाल के विरुद्ध ? कोई नही गया अभी तक इण्डिया गेट पर मोमबत्ती जलाने के लिए ? नारी शोषण के विरुद्ध ?
खुले सबूत होने पर भी लोग जाँच की बात करते है | पीड़ित सामने है पर उस पर दबाब बनाने की हर संभव कोशिश की जा रही है | और बेशर्म होकर कुछ सत्ता के दलाल राज्य
सरकार पर अतिरिक्त तेज़ी दिखाने का आरोप भी लगा रहे है | जबकि भारत सरकार के ग्रहमंत्री मोदी जी के विरुद्ध जाच के लिए रो रहे है | और तेजपाल पर चुप्पी है |
मानो तेजपाल के विरुद्ध मामला दर्ज करने के लिए गोवा की बी जे पी सरकार ने ही दबाब डाला हो उक्त महिला पर | अभी इंतजार करिये कुछ भी बयान आ सकते है तेजपाल के पालनहारो के …
ये किस्सा असल मे राजनीति – पैसा -सत्ताहड़प – अयाशी का दिख रहा है
| जनता एस सरकार
के सारे खेलो को समझ रही है और उससे रोष मे है | इस तरह के हथकंडे अपना कर सरकार मोदी जी को नही रोक सकते | ये देश अब मन बना चूका है मोदी जी को देश की प्रधानमंत्री पद के कुर्सी के लिए| और इससे भी कांग्रेसी केंद्र सरकार को
अन्तोगत्वा राजनितिक नुकसान ही होंगा |जिसका असर राज्य चुनावो मई पता चल जायेंगे |

माँ तुम कहा कहा हो ?

मैंने कभी तुझे चाहा   हो , दिल ने ऐसा कहा भी नही था |
फिर तेरे आने पर ख़ुशी और जाने पर गम क्यों होता है ?

  माँ तुम कहा कहा  हो ?
 सितारों मे ,जो रात मे चमकते है
 राह दिखाने को                                  
सूरज सी हो
 जो जीवन आधार है                                      
तुम तो  रात मे भी  रहेती हो |
मुझे लोरी सुनाने को
सारे  फूलो की खुशबू ,
तुम्हारे आचल मे
 मेरी सारी आशाये उम्मीदे
सब तुम से  रही थी
तुम भगवान हो
जो जन्म देता है /
पालनहार हो
 जो अपना आँचल देती हो .
तुम हो मेरे अंतर्मन मे ,
मेरे कण कण मे , मेरे जीवन मे ....                                                                                                                                                                                                                                          

Thursday, November 21, 2013

शिक्षार्थीयो की आत्मघाती प्रवत्ति - जिम्मेदार कोन ?

हर बर्ष आई आई टी जैसे बड़े सस्थानो मे पड़ने बाले बच्चो के आत्महत्या की खबरे आम होती थी |
जिसका कारण था परिवार से दुरी , स्वाभाविक स्नेह और प्रेम का आभाव , पढाई का दबाब , भविष्य की अनिश्चितता , धन की कमी , जीवन शेली की असमानताए आदि | परन्तु अब अन्य प्रतियोगी महोल बाले नगरो और स्थानों पर भी एस तरह के मामले
बड रहे है | जिसका साफ साफ कारण है अभिभवको की सोच,बड़ी जनसँख्या के कारण
अत्यधिक प्रतिस्पर्धा , रोजगार अवसरो की कमी ,सुंदर भविष्य की चिंता, बालक के अच्छे
कैरियर का लोभ | जिसके कारण खेलने- खाने के उम्र मे बच्चे ,पढाई की अंधी दौड़ मे शामिल हो
गए है | यह तक की छठी कक्षा से बच्चे बड़ी प्रवेश प्रतियोगिता की कठिन पढाई कर रहे है | स्कूल और कॉलेज मे जहा बिना किसी बड़े दबाब के पढाई करके युवा व्यक्तित्व का बिकास करते थे | अब पढाई की भाग दौड़ मे जीवन काट रहे है | और अच्छी टुसन कोचिंग की तलाश मे शहर से बहार जाने और पड़ने की सोच आम हो गयी है |कुछ बालक तो घर मे रहकर भी परिवार से दूर ही हो गए है क्युकी उनकी पास समय ही कहा है परिवार समाज के लिए | और कोटा , दिल्ली,बैंगलोर कलकत्ता जैसे नगरो मे तादात बाद रही है | जहा कम उम्र मे घर से अलग रहेने पर और अनेको सामाजिक और मानसिक समस्यायो के सामना करने मे असमर्थ हो जाने पर और मानसिक दबाब मे बहक कर आत्मघाती कदम उठाते है | जिसके अन्य घातक परिणाम भी हो सकते है | मानसिक अवसाद ,और अन्य मनोविकार स्थायी रूप से उसके जीवनभर साथ रह सकते है | शराब , अपराध , अन्य मानवीय चरित्र के अवगुण आ सकते है |
माता – पिता को भी अब समझना होंगा की उनको क्या मिलेंगा और उसको पाने के लिए बे क्या खो सकते है |कही मानव का मशीनीकर्ण तो नही किया जा रहा ?
प्राक्रतिक प्रकिर्या से बड़ने बाले बच्चे ही जीवन मे सही रूप से सफल हो
सकते है |सफलता का अर्थ विदेश मे नोकरी ,या उच्च आय ही नही है | इसमे सभी पक्ष संतुलन जरूरी है| परिबार – समाज के लिए समर्पण कहा से सीखा जा सकता है ?भारत मे बड़ते ओल्ड होम यही दर्शाते है कही ना कही माँ – बाप से रही दूरी ही आज भावनायो , जिम्मेदारी और प्रेम से बिलग करती रही होंगी | जो आज ये स्थिति बन रही है |सबसे जरूरी है युवा होते बच्चो को सही मार्गदर्शन,जिसके के लिए माता – पिता से बढकर कोई नही होता अगर इस उम्र मे उनका साथ और संबल मिले तो जीवन मूल्य की स्थापना स्थायी होंगी और परिवार – समाज देश के लिए भी सम्मान और प्रेम की भावना होंगी , नही तो अच्छा करियर भी सफल जीवन की गारंटी नही है |

Thursday, November 14, 2013

नीतीश कुमार की राजनेतिक हाराकेरी !

नीतीश कुमार जी को सत्ता मिलने के मुख्य कारण बी जे पी से अलग होकर उन्होंने अपने राजनेतिक भविष्य दाव पर लगा दिया है | ७ -८ सालों तक सरकार बनाने के बाद उनको टोपी विशेष पहनने की याद आई और बी जे पी साम्प्रदायिक हो गयी | कहा तो उनके प्रधानमंत्री पद पर बेठने की चर्चा चल रही थी पर अब उनकी स्थिति दुबारा विहार का मुख्यमंत्री बनने की भी नही रही |मोदी जी का साथ ना देना उनकी गलती रही , पर जो गया वो हो गया जिसे बदला नही जा सकता | जे डी यु की राजनीतिक मौत उनकी अति  म्हात्वकन्षा के कारण आसन्न है|कुछ समय पहेले तक जिनको प्रधानमंत्री पद के लिए दौड़ मे माना  जा रहा था  और  बर्तमान मे उनकी स्थिति मुलायम सिंह ,मायावतीजी  और ममता जी , प्रकाश करात जैसे छत्रपो  से भी बदतर हो गयी है | तीसरा मोर्चा कांग्रेस की बी टीम ही तो है |जो इतिहास मे , आज या कल जो कांग्रेस के साथ  लिए घुटने के बल , रेंग कर चले हो और   जो  छदम  धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जनता को  मुर्ख बनाने और गैर कांग्रेसी गैर बी जे पी  वोटो को लुभा कर कांग्रेसी सरकार बनवाकर  , बक्त आने पर सत्ता मे स्वम् बेठने  के लिए बनाई गयी है | आतकबाद  के मुद्दे हो या रोजगार की समस्या , लालू जी के पार्टी का पुन्र उदय हो , या कांग्रेस से समर्थन ले कर करी गलती जिससे उनका सत्ता मोह सामने आया है जिस प्रकार उनकी 
 छवि अब दिन प्रतिदिन धूमिल हो रही है | उससे जापानी पुराणिक योद्धा सामुराई की हारकारी की याद आती है | राजनीति मे सही समय पर सही निर्णय से ही लाल किले तक पहुचा जा सकता है |नही तो आसमान से धूल मे मिलने मे समय नही लगता |

Monday, November 11, 2013

बिग बास की भारत को जरूरत है या नही ??

 आज कल टी वी के एक चेनल "कलर " पर बिग बास नाम का रियल्टी शो बड़ा प्रसिद हो रहा है | जिसे हमारे दबंग  नायक बड़े अटपटे तरीके से पेश कर  रहे है | जिसके ६  शो पहेले भी आ चुके है |
प्रथम शो जिसमे फ्लैप हीरो  राहुल राय ने जीता , जिस को मुन्ना भाई के सर्किट अरसद वारसी ने पेश किया था और मुख्या कलाकार थे राखी सावंत , बॉबी डार्लिंग , बाबा सेहगल आर्यन बेधय, रवि किशन यानि सब खाली जिन्हे कोई काम नही था | तब सोनी चेनल पर आता था |

दूसरे शो मैं  एक फ्लाप गालियो के लिए प्रसिद्द  टी वी सीरियल  "रोडिस " विजेता आशुतोष कौशिक   मोटी रकम जीत चुके है | अन्य कलाकारो मैं राहुल महाजन , मोनिका बेदी ,संजय निरुपम सम्भावना सेठ आदि मुख्य थे वेदेशी तत्व के रूप मैं  जेड गुडी को रखा गया था | पेश किया था योग गर्ल शिल्पा सेट्टी ने ,|
तीसरा शो जिसे जीता देश मैं चल रहे मैच फिक्सिंग के गोरख धंदे के सरताज़ के रूप मैं पकड़े गये और भारत के असली नायक दारा सिंह के नाम को डूबने बाले बिंदु सिंह ने ,ऐसे  पेश किया अपने करोरपति बनाने के ढेकेदार ,विजय दिना नाथ चोहान  यानि अमिताभ बच्चन ने , मसाले के रूप मैं शर्लिन चोपड़ा , विनोद कांबली , राजू श्रीवास्तव का  तड़का भी था  | साथ ही अनेक फ़िल्मी अभिनेता- नेत्री अपनी फिल्मो के प्रचार के लिए इसमे आता जाते रहे |
चौथी शो से आये अपने दबग भाई सलमान , जिनके घर मैं रहे मेहमानो मै साइनी आहूजा जो कि महिला उत्पीड़न के मामले से अब बरी हुआ है और सारा खान , तरुन्न्म, गायक शान , स्टार राजेश खन्ना चंकी  पाण्डेय  ने भी अपने पुराने निस्प्रभावी जलवे  दिखाए  | अभिनेत्री स्वेता तिवारी विजेता रही |
पाचवे शो को होस्ट किया संजू बाबा और उनके चेले सलमान  भाई ने मिलकर ., अन्य एतिहासिक चरित्र थे पूजा बेदी , अमर उपाध्याय ,  सन्नी लियोन , सक्ति कपूर , निहिता ( शोभ राज की पत्नी ) पर विजेता रही जूही परमार अभिनेत्री |
छठे शो मे भी सलमान भाई रहे और प्रतिभागी थे सिद्धू , सना खान , उर्वशी दोलाकिया ( विजेता ) और
 ये  सब ही असल जिन्दगी मे भारत के नायक बनने के दौड़  मे भी नही हो सकते क्युकी सामाजिक जीवन और वयवसायिक जीवन दोनों मे कुछ खास नही कर  पाये  |
 ये सीरियल विदेशी अमेरिका के सीरियल बिग ब्रोदर का देशी  रूपान्तर कहा जाता है| पर नगापन -असलीलता उतनी ही है जितना असली मे  थी
 |बल्कि भारत कि  सामाजिक  मान्यताओ के हिसाब से यहा जायदा डाली गयी  है | छाट- छाट कर बे  लोग रखे जाते है इसमे  जो बदनाम होते है ,पर  ये  देशी तो जब होता जब बिग बॉस का  घर किसी ऋषि के आश्रम जैसा होता जहा पर प्राचीन भारतीय संस्कारो से युक्त जीवन दिखाया जाता |जहा योग , बेद , शिक्षा , राजनीति पर चर्चा होती | बैसा जीवन ही जिया जाता | देशी भारतीय तरीके होते | तब समाज को कुछ सीखने को भी मिलता परन्तु इसमे तो पता नही क्या रियल्टी दिखाना चाह रहे है ये लोग ,  असल मे बिग बास जैसे सीरियल कोई रियल्टी शो नही है सब कुछ पूर्व निर्धारित लिखित  होता है | जिसे दर्शोको के एच्छा के अनुसार दिखाया  जाता है ,जिसने सन्नी लियोन को भी भारत मे रोजगार दिलवा दिया है  | पोर्न फिल्मो पर बहस अब घरो तक आ आगयी है  असल जिन्दगी के फ्लाप लोगो की नकली बनावटी  जिन्दगी लोगो को अश्लीलता , नंगापन , मुरखता , स्तरहीन भाषा का प्रयोग ही सिखला रही है | निर्माता   समाज के किन वर्गों  का मनोरंजन कर रहे है ये समझ से परे है | मनुष्य की अपूर्ण , दमित भावनायो को साकार करके परदे पर दिखाया जाना ही इस शो की प्रसिद्दी का एक मात्र कारण है | जो समाज के पतन का संकेत है | इस प्रकार की काल्पनिक जीवन को देखकर ही युवा वर्ग बिचलन करता है और अपनी असामान्य भावनायो और लिप्सा पूर्ति हेतु  अपराध के और चल पड़ता है या ना कामयाबी मिलने पर हताशा मे जीवन जीता है | जीवन कि समाप्ति कि और चल पड़ता है | इस प्रकार के शो भी पर सेंसर जैसी प्रकिर्या जरूरी है |जो कुछ हद्द तक गंदगी रोके |
सबसे जरूरी है की मनोरंजन के साधनों का प्रयोग देश प्रेम , निर्माण , संस्कारो , रोजगार समस्या मूलक ,बुराइयों को दूर करने मैं  और चरित्र निर्माण के लिए हो , ताकि समाज और देश का निर्माण मजबूती से हो सके | आने बाली सांस्क्रतिक  चुनोतियो का सामना किया जा सके | एस राह पर बड़ी  गहरी खाइया है  नयी पीढ़ियों को हमें ही सही रास्ता दिखाना होंगे |

Sunday, September 29, 2013

निराशा राम .....

आसाराम ने साधू और संत परम्परा को बदनाम कर दिया है | उनके कुकृत्य संत समाज के लिए बेहद शर्मनाक है इस प्रकार के अपराध हर धर्म के ठेकेदार खुले आम करते रहे है पर जनता की आँखों पर कोन सी  पट्टी बंधी रहेती है अधिकतर साधू कॉर्पोरेट तरीके से काम करते है , हर सहर मे इनके खास चेले होते है जो आश्रम  चलाकर प्रचार से , बल ,धन - और तन की  अय्याशियों का इंतजाम करते है और जिसमे इनका निश्चित हिस्सा होता है | इसमे सहायक होते है राजनीतिक जो इनके पीछे जुटी भीड़ को देख कर, हर तरह की मदद करने मे आगे रहेते है |और एन अपराधियों को अपने फायदे के लिए सरक्षण देते है |
आसाराम ने साधू और संत परम्परा को बदनाम कर दिया है | उनके कुकृत्य संत समाज के लिए बेहद शर्मनाक है |जिस प्रकार संत होने का नाटक करके सम्पति और  बल का प्रदर्शन किया जाता था उससे ही पता चलता था की ये कितना पहुचा हुआ संत है | भागवत गीता के अनुसार  जिन संतों में निम्न चार विशेषताएँ हों , वे ही सच्चे संत कहलाने योग्य हैं :-
 [ १ ] त्याग - स्वरूप से पदार्थों का त्याग | जैसे संन्यासाश्रम में मान - बडाई , कंचन - कामिनी का त्याग |पर वर्तमान संत ? क्या त्याग पाए ?
 [ २ ] संयम - इन्द्रिय , मन अपने वश में रखना , इसका नाम संयम है |इनकी सारी इंद्रिय जरूरत से जाएदा तेज है
  [ ३ ] वैराग्य - वस्तुओं में जिसका राग नहीं है | संयम तो सकामी योगी भी कर सकते हैं बड़े - बड़े आश्रम सारी सुविधाए फिर वैराग्य कहा ? | मन , इन्द्रियों का संयम किये बिना समाधि नहीं होती | संयम का मतलब है वश में कर लेना | इन्द्रियों को वश में कर लेना एक चीज है , विषयों से हटाना एक चीज है , उनमें राग का अभाव कर देना एक चीज है | भगवान ने गीता [ २ / ५९ ] में कहा है " इन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण न करनेवाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत हो जाते हैं , परन्तु उनमें रहनेवाली आसक्ति निवृत नहीं होती | |
 [ ४ ] उपरामता - जैसे शाकाहारी का मन किसी मासाहारी भोज़न  की तरफ उसकी  वृति जाती ही नहीं , इस प्रकार की वृति का नाम ' उपरामता ' है |जब  स्वरूप से विषयों का त्याग कर देते हैं | वह त्याग है किन्तु विषयों में राग होने के कारण उपरामता नहीं है | जिसके साथ राग का अभाव होकर स्वत: उपरति होती है , वह उपरामता है | राग का अभाव हो वह उपरति है , तथा वैराग्ययुक्त उपरति हो , वही उपरामता है |
अब जब ये संत मद- और बल मे चूर होकर सत्ता  को ही नतमस्तक केर देते हो तो उनके लिए गीता उपदेश क्या मायने रखते है ?
 पर   इस प्रकार के अपराध हर धर्म के ठेकेदार हजारो सालो से  खुले आम करते रहे है पर पता नही की  जनता की आँखों पर कोन सी  पट्टी बंधी रहेती है जो इनके लिए अपनी तर्क शक्ति को भूल कर, इनकी भक्ति मे बर्बाद होते है | बास्तव मे इनकी भक्त  जनता को मनोचित्सक की जरुरत होती है पर सहारा इनका लेती है  अधिकतर  कपटी - साधू कॉर्पोरेट तरीके से काम करते है , हर सहर मे इनके खास चेले होते है जो आश्रम  चलाकर नियोजित चमत्कारों के  प्रचार से ,जनता पर प्रभाव बनाते है और इनके लिए  बल ,धन - और तन की  अय्याशियों का इंतजाम करते है और जिसमे सबका  निश्चित हिस्साबटन रूप मे  होता है | इसमे सहायक होते है राजनीतिक ताकते ,  जो इनके पीछे जुटी भीड़ को देख कर, हर तरह की मदद करने मे आगे रहेते है और इस कारन प्रशाशन भी नतमस्तक रहेता है  | और एन अपराधियों को अपने फायदे के लिए सरक्षण देते है |
सबसे बड़ी गलती तो जनता की है जो खुली आँखों से कुछ भी देखना ही नही चाहती , आंखे मुन्धे इनके भजन करती है |
 बड़े बड़े नेता इनके पास  शान्ति  जाते रहे है इनपर  पर विभिन्न आश्रमों से लगी ज़मीनें भी  गैरकानूनी रूप से दबाने के कई मामले आरोपित हैं. इन पर भी लगे हाथ कार्यवाही की जाना चाहिए. आसाराम सहित कुछ और कथित बाबाओं पर काले धन को सफ़ेद करने के आरोप लगे थे जिसमे बड़े उधोगपति और नेता लोग सामिल रहेते है |. इस विषय में जांच होनी जरुरी है और  जरूरी यह है कि सभी  अधर्मी, पाखंडी, दुश्चरित्र व्यक्ति पर उक्त तमाम आरोपों की गहरी छानबीन और जांच हो और सख्त सजा इसे दी जावे साथ ही इसकी साधू वेश में शैतान वाली छवि को व्यापक रूप से प्रसारित किया जावे ताकि यह फिर कभी जनता को मुंह दिखाने लायक न बचे.और जनता की सोच बदले !जनता अपना सुख कर्म  बाद मे देखे | एन दुस्क्रमियो के जल मे फास कर अपना घर  परिवार  बर्बाद न करे |अब एन संतो को राम राम बोलना जरूरी है !

Tuesday, September 24, 2013

हिंदी ब्लोग्स .......

वर्तमान युग मे जहा किताबो से दूर होते पाठक और , पाठको तक न पहुच पाने बाले लेखक, धन और संशाधनो की कमी , पत्र - पत्रिकाओ के लेखको और मालिको के पद्युक्त बोधिकता से अपमानित होकर  हिंदी भाषा को मन दिलाने मे पिछड़ते जा रहे थे बही हिंदी मे नाममात्र के लेखक और पाठक हिंदी की सेवा कर पा  रहे थे |पत्रिकाए न  बिकने के कारण बंद हो रही थी तो गरीब पाठक कहा  जाये ?
एन हालातो मे उम्मीद की एक किरण नही पूर्ण सूरज उगा , वो है इन्टरनेट पर हिंदी ब्लोगिंग का , जिसने हिंदी भाषा को वो मान दिलबाया है जो विशेष है |
आज की तारीख मे  हिंदी भाषा में लगभग २५००० के आसपास ब्लोग्स हैं जिनमे २०००० के लगभग रोज साँस लेते है जबकि ५००० के लगभग कभी - कभी जिन्दा हो जाते है  ,तब भी यह संख्या अंग्रेजी की तुलना में बहुत कम है . अंग्रेजी भाषा  में  तो पाच  करोड़ के लगभग  ब्लोग्स  चल रहे है  .दुनिया भर मे चलने बाले ब्लोग्स मे जिसमे  अंग्रेजी में, जापानी भाषा मे और चीनी भाषा मे अधिकतम प्रयोग हुए है . अभी तुलनात्मक रूप से भले ही हिंदी ब्लॉग का विस्तार काफी कम है किन्तु हिंदी ब्लोगों पर एक से बढकर एक विद्या  प्रस्तुत की जा रही हैं ! समाज, राजनीति, मीडिया और साहित्य से संबंधित उच्च स्तरीय सृजन हिंदी ब्लॉग पर पर हो रहा है  !हिंदी में ब्लॉग कम होने का एक कारण यह भी हो सकता  है, कि अंग्रेजी में ब्लोगिंग १९९७ में ही शुरू हो गयी थी,  ऐसा मन जाता हैं की  हिंदी का पहला ब्लॉग ०२ मार्च २००३ को लिखा गया जिसे  हिंदी के पहले ब्लोगर के रूप में आलोक कुमार ने लिखा और जिनका ब्लॉग है नौ  दो ग्यारह जबकि  यह हिंदी ब्लोगिंग के विस्तार न होने का तथ्यपूर्ण  तर्क नहीं है, क्योंकि समय के लिहाज से अंग्रेजी और हिंदी के बीच मात्र छ: साल की दूरी है लेकिन ब्लॉग की संख्या के लिहाज से दोनों के बीच पीढियों का अंतर है !
साहित्य रचना के छेत्र मे ब्लोग्स अब अति महतवपूर्ण साधन बन गए है  तो आज का हिन्दी ब्लॉग  प्रोयोगाताम्क दौर में है , जिसमे  नित नए प्रयोग होते हैं।  जैसे समूह ब्लाग का चलन ज़्यादा हो गया है। ब्लागिंग प्रसिद्ध होने का माध्यम भी बन रहा   है।पर अब  लिखने की मर्यादा पर भी सवाल उठाए जाने लगे हैं। ब्लाग लेखन को एक समानान्तर मीडिया का दर्ज़ा भी हासिल हो गया है। हिंदी साहित्य के अलावा विविध विषयों पर विशेषज्ञ की हैसियत से भी ब्लाग रचे जा रहे हैं ।साहित्य ,समाज  विज्ञान , कला  ,सूचना , तकनीक , स्वास्थ्य और राजनीति कुछ भी अछूता नहीं है।
जिस प्रकार हिंदी ब्लॉगर साधन और सूचना की कमी के बावजूद भाषा - समाज और देश के हित में  जन चेतना को विकसित करने में सफल हो रहे हैं बह भी बड़ी उपलब्दी ही है  । अपनी सामाजिक भूमिका  को निभाने  की प्रतिबद्धता के कारण आज हिंदी के अनेक  ब्लोग्स सामाजिक  मीडिया की दृष्टि से समाज में सार्थक भूमिका निभाने में सफल रहे हैं । हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय स्वरुप देने में हर  ब्लॉगर की महत्वपूर्ण भूमिका  है | जो बोल्गर अपने  बेहतर प्रस्तुतिकरण,सधी हुई भाषा  गंभीर चिंतन, समसामयिक विषयों पर सूक्ष्मदृष्टि, सृजनात्मकता, समाज की कुसंगतियों पर प्रहार और साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से अपनी बात रखने में सफल हो रहे हैंबो एक मायने मे समाज सेवी ही है । ब्लॉग लेखन और वाचन के लिए सबसे सुखद पहलू तो यह है कि हिन्दी में बेहतर ब्लॉग लेखन की शुरुआत हो चुकी है जो हिंदी समाज  के लिए शुभ संकेत का  है । आने बाला समय    हिंदी ब्लॉगिंग को एक नया आयाम  मिलेंगा ऐसी उम्मीद की जा रही है ।अनेक समाचार पत्रों के ब्लोग्स है जो अच्छे ब्लोगर्स को अपने पत्र मे स्थान देते है मंच प्रदान करते है |
माना जाता है कि ब्लोगिंग की दुनिया पूरी तरह आजाद ,आत्म निर्भर और खिलंदड  है ! यहाँ हर कोई यहा लेखक, प्रकाशक और संपादक की भूमिका में  खुद ही होता  हैं ! ब्लॉग की दुनिया  अत्यंत विस्तृत और व्यापक है !यहाँ केवल राजनीतिक कहानियों और साहित्यिक रचनाएँ ही नहीं प्रस्तुत नही है  वल्कि  स्तरीय पुस्तकों  का ओन लाइन  प्रकाशन तथा अन्य सामग्रियां भी प्रकाशित की जाती है .आज हिंदी में भी फोटो ब्लॉग, म्यूजिक  ब्लॉग, विडिओ ब्लॉग,समाचार पत्र ब्लोग्स बिज्ञान ब्लॉग ज्ञान  ब्लॉग, प्रोजेक्ट ब्लॉग, कारपोरेट ब्लॉग आदि का प्रचलन तेजी से बढ़ा है ! यानी हिंदी  आज मानवीय संवेदनात्मकता के विकास के  दौर में है |
अर्थात  हिंदी ब्लोगिंग का भविष्य उज्जवल है  और ये  बाज़ार का हिस्सा नही है क्युकी इसमे वो लोग जुड़े  है जो हिंदी प्रेमी है जीन को सही  मंच की तलाश थी जो मोका अब मिला हुई और आने वाले दिनों में अंग्रेजी भाषा  की तरह इसका भी एक बड़ा और समृद्ध संसार होगा,इसमें कोई संदेह नहीं है ! सबसे सुखद बात तो यह है कि आज हिंदी ब्लोगिंग समानांतर मीडिया का स्वरुप ले चुका है , आने वाले समय में निश्चित रूप से इसका एक वृहद् संसार देखने को मिलेगा इसमें कोई संदेह नहीं !जरूरत केवल इस बात की है सकारात्मक नव  लेखन को बढ़ावा दिया जाए और नकारात्मक लेखन को महत्व न दिया जाए,क्योंकि हिंदी ब्लोगिंग में ऐसे लोगों बहुत अधिक है जो अशुद्ध भाषा और तकनिकी अकुशलता के कारण अभी तक अपने को मन से जोड़ नही पाए है | हमें इस ओर विशेष ध्यान देना होगा , तभी हम हिंदी ब्लोगिंग के माध्यम से एक सुन्दर और खुशहाल संसार के निर्माण को रूप देने में सफल हो सकेंगे |
अत स्पस्ट है हिंदी  ब्लोगिंग ही अब हिंदी को मुख्य धारा मे मान दिलबा सकती है |नही तो पुराने तौर - तरीको से हिंदी अब अधोगामी दिशा मे ही जा रही है .....

Sunday, September 22, 2013

मुज्फ्फर नगर दंगा .लाशो की राजनीति

मुज्फ्फर नगर दंगा


 नारी अपराध के प्रतिशोध मे पहेले एक हत्या फिर दो हत्या फिर एक टी वी पत्रकार की हत्या पंचायत से लोटते लोगो पर सुनियोजित  हमला , और उसकी प्रतिकिर्या से उपजे दंगे  फिर तो  आकड़े ही नही मिलते है की कहा पर ? कितने लोग मरे ? किसने मारे ?कितने गायब है ? क्यों मारे ? खबरों पर रोक जो लगी थी |
प्रशन यह है की क्यों लोग ऐसा करते है और कोन है बे  लोग जो हमला करके छुप जाते है ?और मरते निर्दोष ही है | सारे दलों के नेताओ की भूमिका इस मामले मे दोषी है , किसी ने  समाज को जोड़ने की बात नही करी सब मरने बालो के कफ़न , और बचने बालो के वोट  का इंतजाम करते देखे गए पर सही बात किसी ने नही उठाई |दिल को जोड़ने के नाटक होते रहे , 
लोकतंत्र के कितना गलत फायदा उठा रहे है लोग , मुद्दो की नही , लाशो की राजनीति हो रही है गद्धी के लिए |
इस  देश का यह दुभाग्य ही है की एक बिभाज़न होने के बाद भी जनमानस को धर्म की  राजनिति के चलते आज भी लड़ाया जा सकता है | जबकि  नुकसान दोनों वर्गों के निर्बल बर्गो  को ही झेलना पड़ता है ।जिसका  फायदा तथाकथित रहनुमा राजनितिक दलों  को चुनावो मे  मिलता है । प्रसाशन की असंवेदनशीलता , चुक और तुस्तिकर्ण  के चलते और सरकार के दबाब के कारण , सही समय पर उचित प्रसाशनिक   कार्य बहाई  नही करी गयी और ये सुनियोजित  दंगा फेला , जिससे  जगल राज कायम हुआ पर अभी तक किसी स्तर से  कोई ठोस कदम नही उठाया गया है । जिससे आपसी  विस्बास बड़े और अपराधियों पर निस्कपक्ष कार्यबही  हो  इसलिए ये मामला अभी ख़तम नही माना  जा सकता। अब भी अगर जनता नही जागी  अब तो चुनाव तक यही सब होना , इस प्रदेश की नियति बन गयी है । जरुरत यह है की जनता ही धर्म आधरित राजनीती का बहिष्कार करे और विकास, रोजगार , रोटी , कपडे और मकान इमानदारी की बात पर नेता चुने नही तो अब इस देश का लोकतंत्र ही इसके लिए घातक सिद्ध होंगा !लाशो पर राजनीती की रोटिया सेकने से बात आगे बाद गयी है अब तो बोटिया सकी जा रही है |

Wednesday, September 18, 2013

हिंदी नही है बिन्दी ......वो है दिलो की रानी ( हिंदी बाज़ार का हिस्सा नही बनेगी ) कॉन्टेस्ट

कोई भी  भाषा हमारे लिए बोलचाल का एक  माध्यम होती है|मानव भाव के  संप्रेषण का एक  माध्यम होती है। इसके द्वारा हम अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं और सम्पूर्ण प्राणी जगत और  लोगों के विचार जान सकते हैं| जब से मानवजाति का उदय हुआ  तब से ही  बह कोई न कोई भाषा  का उपयोग कर रहा है चाहे वह ध्वनि के रूप में हो या सांकेतिक रूप जिसमे लिखित या चित्रित हो सकते है  में या अन्य किसी रूप में विचारों को व्यक्त करने के लिए उसे भाषा की आवश्यकता होती है। हा कभी कभी अमेल भाषी होने पर संकेतो या भावो का प्रयोग भी किया जाता है |हिंदी भी विश्व की प्रमुख भाषा है जिसको अभी तक देश की मुख्य धारा मे नही माना जाता जबकि इसको बोलने बाले दुनिया मे दुसरे सबसे बड़े वर्ग मे है |

आज  हिन्दी भारत के प्रमुख राज्य जैसे मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार   राजस्थान, हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश में प्रमुख रूप से बोली जाती है और महारास्त्र गुजरात उड़ीसा जम्मू कश्मीर  जैसे प्रान्तों मे समझी और अल्प मात्रा प्रयोग करी जाती है |
कोई  राष्ट्रभाषा संपूर्ण देश में भावात्मक तथा सांस्कृतिक एकता स्थापित करने का प्रधान साधन होती है। इसे बोलने वालों की संख्या सबसे अधिक होती है।

कोई एक भाषा किसी एक राष्ट्र के लिए आवश्यक है । भाषा राष्ट्र की एकता, खंडता तथा विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि राष्ट्र को एक रखना है मजबूत  बनाना है तो उसकी  एक भाषा हो जो नागरिको को स्वीक्रत  होनी चाहिए। इससे धार्मिक  सामाजिक तथा सांस्कृतिक एकता बढ़ती है। यह शक्तिशाली  राष्ट्र के लिए आवश्यक है। इसलिए हर  विकसित तथा स्वा‍भिमानी देश की अपनी एक भाषा अवश्य होती है जिसे राष्ट्रभाषा का गौरव प्राप्त होता है।

क्या किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाया जा सकता है। किसी भी देश की राष्ट्रभाषा उसे ही बनाया जाता है जो उस देश में व्यापक रूप में फैली होती है। संपूर्ण देश में यह संपर्क भाषा व्यवहार में लाई जाती है। हम सभी इस बात को मानते हैं कि हिन्दी भाषा बोलने में, लिखने में, पढ़ने में सरल है। हिन्दी की साहित्यिक गरिमा और लिपि की वैज्ञानिकता से सभी सहमत हैं। अनेक बाधाओं, व्यवधानों और उतार-चढ़ाव के बावज़ूद भी आज हिन्दी विश्व-मंच पर अपना स्थान बनाती जा रही है, यह हमारे देश के लिए बहुत ही गर्व की बात है। हिन्दी भाषा आज के युग की भाषा बने, विज्ञान और नई तकनीक की भाषा बने, यह आज के युग की माँग है 
भारत प्राचीन  काल से ही साहित्यिक,सामाजिक , सांस्कॄतिक और वैज्ञानिक दॄष्टि से अति समृद्ध रहा है, लेकिन उसके इस समृद्ध-कोश को विदेशियों द्वारा कभी चुराया गया तो कभी जलाया गया है। आज आवश्यकता है कि हम अपने पुराने गौरव को प्राप्त करे और  फ़िर से दुनिया के साथ आगे बढ़ें और भारत की उस गरिमा को प्राप्त करे जो उस समय  में थी।
आज  हिन्दी बहुगम्य भाषा होती जा रही है और विश्व में धीरे धीरे  अपना स्थान बना रही है तो  उसके माध्यम से  विभिन्न विषयों सम्बन्धी ज्ञान को सरल भाषा में विकसित करना होंगा । हिन्दी मंच पर न केवल साहित्यिक विद्वानों को वरन् वैज्ञानिक, सामाजिक और शैक्षिणिक विद्वानों को भी स्थान मिलना चाहिए,

वैसे हिंदी के प्रयोग मे आने बाली कई समस्याओं का हल काफ़ी हद तक हो रहा है, परंतु उनकी गति अभी  बहुत ही धीमी है। जो लोग  विदेशों में कार्यरत हैं और जिनका हिन्दी- भाषा पर पूरा अधिकार है, वे ऐसे मार्ग खोज सकते हैं।जिससे उन देशो मे प्रचार हो और प्रयोग एवं प्रचार  करने का प्रयास कर सकते है  आमतौर पर  हिन्दी- भाषा को उसके  साहित्य से ही  जाना जाता है, विभिन्न भाषाओं से अनुवाद भी अधिकांशत: साहित्य का ही होता हैं, जबकि कि विज्ञान और तकनीकी विषयों का अनुवाद हिन्दी में सरल, मानक और बोधगम्य रूप में जरूरी हो गया है । क्लिष्ट शब्द और त्रुटिपूर्ण अनुवाद लोगों को हिन्दी से दूर कर रहे हैं। कितने ही ऐसे विषय हैं जिनका हिन्दी में ठीक से अनुवाद नहीं हो पा रहा है, जो वर्तमान युग के लिए महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि अंग्रेज़ी हर व्यक्ति की ज़रूरत बनती जा रही है। अत: हमारा प्रयत्न यह होना चाहिए कि नई पीढ़ी सक्षम अनुवादकों/भाषान्तरकारों की होनी चाहिए जिनका अंग्रेज़ी-हिन्दी पर समानाधिकार हो, साथ ही उन्हें विज्ञान और तकनीकी की पूर्ण जानकारी हो।

। हिन्दी भाषा का मौखिक स्वरूप तो बहु-लोकप्रिय है। परंतु जो लेखन और लिपि से सम्बन्धित है, उसमें सरलता और सहजता की अत्यन्त आवश्यकता है, जिससे लिखने में  भी इसका प्रयोग अधिकाधिक हो सके। इसके लिए यद्यपि काफ़ी कार्य हुआ है, मानक रूप भी तैयार हुआ है तथापि अभी तक भी वह इतना सरल नहीं हुआ है कि लोग इसे आसानी से अपना सकें। जन-सामान्य में अभी भी काफ़ी भ्रांतियाँ हैं,  अत: साहित्य को छोड़ कर इनके प्रयोग में उदारता बरती जाए और सरलीकरण की ओर कदम बढ़ाएं जाएं,तो लोग रोमन-लिपि का सहारा लेना छोड़ सकते हैं।
कंप्यूटर हिन्दी में सहज होना चाहिए। हिन्दी के  जानने बाले विद्बान कंप्यूटर की जानकारी  कम रखते हैं, जिसके कारण वे अपनी बात अन्तर्जाल(internet) पर नहीं कह पाते हैं । आज हो यह रहा है कि जो वर्ग कंप्यूटर जानता है, उनका हिन्दी ज्ञान कम है और जिनको हिन्दी-ज्ञान है, वे कंप्यूटर नहीं जानते। यही कारण है कि अन्तर्जाल पर हिन्दी के माध्यम से जो सूचनाएं मिलनी चाहिए वे सब अंग्रेज़ी में सहज उपलब्ध हैं इसीलिए अंग्रेज़ी का प्रयोग दिन-ब दिन बढ़ता जा रहा है। इन पर हिन्दी में काम होना चाहिए और पूर्ण प्रचार-प्रसार होना चाहिए जिससे जन-सामान्य भी इसका उपयोग कर सकें। उदाहरण के लिए जैसे - कंप्यूटर में लिखने के लिपि-अक्षर(फ़ॊन्ट्स) अब ‘य़ूनिकोड’ में बहुत सरल हो गए हैं, जिनके कारण अब प्रयोग आसान हो गया है | विभिन्न राजकीय दफ़्तरों में हिन्दी भाषा अधिकारी नियुक्त  हैं और कंप्यूटर पर हिन्दी में काम करते हैं,पर बे भी प्रचारकरने मे रूचि नही लेते  जबकि ये जानकारी हिन्दी-जगत को होनी चाहिए। यह तभी हो सकता है जब कंप्यूटर पर कार्य करने वाला भारतीय इसके लिए स्वम आगे आये  और इसमें कुशलता का विकास करे।

एक समस्या है  ‘शब्दकोश’ की। हिन्दी–शब्दकोश का प्रयोग हिन्दी  जानने वालों के लिए ही  बड़ा  मुस्किल होता है।  हिन्दीतर प्रदेशों के लोगों को बार-बार शब्दकोश देखने की आवश्यकता होती रहेती  है,अत: शब्दकोश को वर्णमाला क्रम के अनुसार मानक और सहज बनाया जाय तो यह एक वरदान हो जाएगा। 

अत एक लेख के  सभी पाठको से मेरा नम्र निवेदन है कि हिन्दी को सरल, सह्ज और बहुगम्य बनाने की राह में जो अवरोध आ रहे हैं उन पर उदारता से विचार कर निष्कर्ष निकालें और हिन्दी भाषा को सुव्यवस्थित रूप में विस्तरित होने का अवसर दें, अन्यथा अरबो लोगो की प्यारी ये भाषा तो सरिता की भाँति है जो अपना रास्ता जल  की भाँति निकाल ही लेगी, और  सही प्रयासों से जल्द ही  हिंदी हमारे माथे की बिन्दी ही नही दिल की महारानी भी बन   सकती है  ! इस को  कोई खतरा नही है |

Monday, September 9, 2013

हिंदी ब्लोगिंग !

नव परिवेर्तनो के दौर मे हिंदी ब्लोगिंग !

 इन्टरनेट युग  मे जुड़े लोगो की  आवश्यकता, उपयोगिता, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय दुनिया से तत्काल  अपने लेख  के जरिए जुड़ने वालों की बढ़ती संख्या को देखते हुये आज ब्लॉगिंग जैसे सफल संचार माध्यम को लोकतंत्र का  पॉचवा स्तम्भ माना जा सकता है । बर्तमान युग मे  इसे वैकल्पिक मीडिया तो कोई न्यू मीडिया की संज्ञा से नवाजने लगा है ।लेकिन इसे स्वतंत्र मीडिया कहना अधिक उचित लगता है 
दुनिया बड़ी तेज़ी से बदल रही है इसकी आवश्यकता ,सामाजिकता सवेदनशीलता सब की जरूरत प्रतिदिन बदलती है इसी तरह एस दौर मे हिंदी ब्लोगिंग बड़ी सफल होती , लोकप्रिय कला है ! 
जिसकी  सफलता के पीछे दो प्रमुख कारण हैं जिनमें पहला तो यह कि ब्लॉगों की शुरूआत से पहले आम आदमी इंटरनेट पर केवल एक दर्शक था। जिनमे रूचि थी समय था पर माध्यम नही था 

ब्लॉगिंग ने उसे दर्शक से लेखक बनाकर उसके हाथ में ऐसा  कलंम दिया जिससे वह दुनिया के किसी भी कोने में पलक झपकते अपनी बात साझा कर  सकता है । दूसरा और इसकी लोकप्रियता का सबसे प्रमुख कारण यह है कि इस पर हम अपनी भाषा का उपयोग करते हुए इसका उपयोग किया जा सकता है । इसने उन लोगों मे भी रूचि जगा दी है जिनमे  इंटरनेट के अन्य उपयोगो  में कोई रुचि नहीं थी।

हमारे देश मे इस विद्यया को प्रचलन मे आये अधिक समय नही हुआ है | लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसकी लोकप्रियता बड़ी  तेजी से बढ़ी है। अभिव्यक्ति के इसके गुण अन्य किसी मीडिया माध्यम मे नही है |

ए दौर मे  ब्लॉगरों को चिट्ठाकार कहा जाने लगा है । शुरूआत से ही ये लेखन रसिको को बहुत भाया है और इसके पाठक भी अब लाखो मे है और हर नए - पुराने समकालीन विषयों पर काम हो रहा है |नये और अनोखे विषयो पर काम हो रहा है और उच्च कोटि का काम हो रहा है | 

हर  मुद्दे पर अपने विचार व्यक्त करने,बिरोध करने ,  डायरी लिखने, ज्ञान .- विज्ञानं के बाते राजनितिक मुद्दो पर खुल  कर बाते हो रही है । नव कल मे इसे  इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का माध्यम कहा जाता है क्योंकि कैसा भी लिखे कोई संपादक नही है |

आज एस माध्यम के लोक प्रिय लेखको की 
 मुख्य धारा के लेखक बनाने की सम्भावना भी बनती है तोबल्कि ब्लॉगर अपने ब्लॉग की लोकप्रियता के अनुसार लाखों रुपए हर महीने कमा सकते है । कंपनियाँ अपने उत्पादों का प्रचार करने के लिए ब्लॉगरों की मदद लेती हैं और विज्ञापन देने वाली कंपनियाँ विज्ञापन पोस्ट करने के लिए। साथ ही


हिन्दी ब्लॉगिंग की लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि  कई नामी  राजनीतिक ,सामाजिक  और फिल्मी हस्तियाँ इससे जुड़े हैं।दूर  विदेशों में बसे हिन्दीभाषी एस माध्यम से जुड़ कर अपने को देश से जुड़ा महसूस करते है  और देश के  छोटे-छोटे स्थानों  से भी ब्लॉगर अपने  आगे आ रहे है ।

Tuesday, September 3, 2013

८४ कोष सत्ता परिक्रमा !

८४ कोष सत्ता परिक्रमा !
बी ज पी के उत्तेर प्रदेश के चुनाव प्रमुख नेता अमित शाह की अयोद्दया की यात्रा , अब बी एच पी की ये ८४ कोसी परिक्रमा , हिन्दू मतों के लिए , फिर बीजेपी आत्मघाती योजनाये बना रही है | जबकि सत्ता के लिए थाली सजा कर खुद कांग्रेस उनके हाथ मे मुद्दे दे रही है | जरुरत है सडको पर आकर पुरे देश के गली -गली नगर नगर जाकर ८४ हज़ार कोसी करने की , जिसमे जनता जुड़े , नेता हो, समस्यायों पर मुद्दों पर बात हो ,विकास के सुझाव लिए- दिए जाये हल दिया जाये सरकार को ,|काश … अगर आद्बानी जी अब फिर रथ यात्रा पर निकलेजिसमे सरकारी चोरी . कायरता , बैमानी ,कुशासन . विफल योजनायो पर लोगो को समझाए तो हिन्दू मुस्लिम का भेद भुला कर उनकी मूल समस्या पर बात करे तो .. मोदी जी गुजरात मे ही खुश रहेंगे अगली बार के प्रधान मंत्री उम्मीदवार के रूप में |एनी दलों को भी साथ देना होना |
बीजेपी ने जिन मुद्दो को सत्ता मे आने के बाद भुला दिया था |जिसे उस समय गड्बंधन की मज़बूरी का नाम दिया गया |तो फिर अब उसको उडाकर अपनी विस्वस नियता पर प्रशनचिन्ह लगवा रही है | जरुरत तो है एक साथ मिलकर उत्सह से आगे बदने की पर आपसी मतभेद के चलते अभी तक वो मजबूत विपक्ष नही बना पाया है | कई मुद्दों पर कांग्रेस का साथ देकर अपना पार्टी विद डिफरेंस का नारा भुला दिया है !
RTI से राजनितिक दलों को दूर रखने बाले कानून पर सहमति हो या अपराधइयो के चुनाव लड़ने से रोक का विधेयक हो ,कांग्रेस का साथ देकर देश के साथ धोका देने बाला काम किया है |
अब बीजेपी कितने ही टोटके कर ले पर सत्ता पाने के लिए अगर अयोद्ध्या मे राम मंदिर, समान नागरिक सहिता या कश्मीर मे धारा ३७० हटाने की बात दुबारा की तो उसे जनता की नफरत का सामना ही करना होंगा | क्युकी एक तो इन मुद्दो पर वास्तव मे राजनीति की अलावा बी जे पी ने सरकार बनाने के बाद भी कुछ नही किया था | दुसरे वर्तमान सरकार की हर मोर्चे पर विफलता से निराश जनता , देश की मूल समस्यायों का हल करने बाली स्पस्ट और निश्चित योजनायो पर चलने बाले राह पर जाना चाहती है |जो एस देश को वास्तव मे विकास और रोजगार दिलवाए | चारो अरफ फैली बईमानी और चोरी से निजाद मिले | मजबूत विदेश निति हो सर्व धर्म समान हो , त्रुस्तिक्रण बंद हो | अगर हिन्दू वोटो का धुरुविकरण करने की कोई निति बनाई गयी है तो वो पूर्णत असफल सिद्द होंगी | क्युकी बक्त और जनता दोनों अब बदल गये है | केंद्र मे सत्ता के लिए देश भर से समर्थन मिलना जरुरी होता है | जिसमे अभी ये दल अभी कामयाब नही हो पाया है | और दलों का साथ भी लेना होंगा अब तो सबसे जरुरी है आपस में एकता , और मजबूती से नेतार्त्व के साथ पार्टी कार्यकर्ता का जुड़ना , पर अभी तक मोदी जी के साथ पूर्ण मन से इनका उच्च शक्ति प्राप्त समूह नही जुड़ पाया है | जो अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है अब तो बी जेपी को देख कर यही लगता है की अब येन केन प्रकरण कांग्रेस को सत्ता पाने से कोई नही रोक सकता | और ये दल ८४ कोसी तो क्या ८४ हजार कोसी परिक्रमा भी करता रहे , करता रहेंगा पर सत्ता के केंद्र मे इस बार भी नही आ पायेंगा |प्रधानमंत्री के रूप मे कभी कोई रामलला के दर्शन करने नही जा पाएंगा |
अभी बाकि है
अमन अन्गिरिशी

Wednesday, August 21, 2013

यादे ...........

मेरी दीदी  नीरू .........
बहेने तो छोटी माँ के समान होती है , माँ के काम मे हाथ बटाना रसोई और पढाई दोनों को संभल लेना , माँ को कहा ? कभी छोले - भटूरे , इडली -डोसा ,आलू छोले की चाट , लिट्टी - चोखा , केक , शाही - पनीर ,नमकीन के परांठे , रस्गूले , तमाम गुजराती पंजाबी भोजन बनाने मे रूचि थी ? वो तो  ही दीदी थी जो हमे ये सब कभी भी खाने को मिल जाता था |
दुपहर की चाये बस हम दोनों भाई इतना बोलते थे की " बना ले " और वो बना कर ले आती , कभी कभी समस्या होती जब वो सो रही होती .........हम बाल खीच कर परेशान करते बना ले , 
बस वो जोर से बोलती मम्मी .....!...........!..................
मम्मी डंडा लेकर हमारे पीछे , पर चाय बन जाती थी|
घर के समान का नक्शा हर सप्ताह बदलना उसकी आदत थी सब बहेने की होती है 
था | घर की आंतरिक सज्जा मे अपना कौशल दिखाने की |
शादी के बाद अपना बुटिक भी खोला , अच्छा चल निकला उनकी  सरल आदत के कारण , पर बच्चो के चलते बंद भी कर दिया |बिना मुनाफा सोचे !
पा - माँ ने सदा दीदी को जाएदा प्यार किया हम तीनो भाइयो से ,\सबसे बड़ी जो है हमसे .....
आज तो खुल कर बोलते भी है ये बात !
आज भी पा-माँ कही भी हो रोज़ ३० मिनिट बात फ़ोन पर दीदी से ही होती है बाकि हम लोग खुद उनसे बात करते है ,,,,,
याद आता है! उनकी शादी मे टेंट लगाने के लिए पड़ोसियों से हुए जगड़े मे , 
मर -पीट के दौरान ,जब  अचानक दीदी भागती आई और एक लम्बा डंडा पूरी ताकत से  उनके सर पर दे मारा ..........
हम लड़ाई भूल कर हसने लगे ! 
हर रक्षा बंदन पर भैया से उनका किसी न किसी बात झगड़ा होता और हम मनाते थे दोनों को , आज तक यही होता है |भोपाल शादी को उनके १६- १७ साल हो गए है |
पर जब वो भोपाल से नही आ पाती तो फ़ोन के बाद फौजी अफसर भाई सहित सबकी आँखे गीली होती देखी है मैंने !
अब तो लगता है हम सब के बीच का बन्धन है वो .......परिवार का फेविकोल का जोड़ !.......
पता नही , मम्मी ने बताया या अपने आप ,अपने परिवार को उन्होंने जोड़ा है सुसराल मे बड़ी भू के रूप मे इज्जत कमाई ,नही तो हमारे पापा जी का दबंग स्वभाव भोपाल शहर तक , हर  रिश्तेदार को मालूम था |
सदा आगे .रही है वो लोगो के साथ मे ................ 
प्यार मे , एस बार भी अकेली बच्चो के साथ भोपाल से रूडकी आ गयी . अपनी लक्ष्मी बाई ! 
दोनों भाइयो की शादी का काम , हो या किसी का कोई दुःख सब जगह ,,,,होती थी वो !भाइयो की ख़ुशी के लिए ज़माने से लड़ी और जीती , दोनों के प्रेम विवहा का एक मात्र सहारा वो ही तो थी ......
भाइयो के लिए पेडुलम बनी रहेती पा - माँ और हमारे बीच , 
आज भी इतनी उष्मा भरा रिश्ता है की अपने को भूल कर जीती है वो हमारे लिए ....
जब भी भोपाल जायो पेट मे और दिल मे स्थान नही रहेता | किसी और के लिए ......
आज भी जब पा- माँ से कुछ कहेना हो तो ...... माध्यम दीदी ही है .......उनको वो कभी नही कुछ कहेते !उनकी मान भी लेते है ............. अब की बार राखी , तिलक सब आया है पोस्ट से ....
दिल भर आता है |उसकी याद मे .......
रक्षा बन्धन की ढेरो मुबारक बाद .......

Monday, August 19, 2013

रिक्शा वाला .....

कल तक, तो सुबह   ही खटर - पटर ,ची . चु  की आवाज़ सुनकर ही पता चल जाता  था कि बच्चो को लेने रिक्शाबाला  आ गया है | उम्र 50 से एक -आध साल ही उपर होंगी , पर गरीब जल्दी  बढता है , और जल्दी ही मरता है  इसलिए लगता 70 साल का था  | नाम कभी पता नही किया मैंने , होंगा कोई राजा राम  या बादशाह खान क्या फर्क पड़ता है नाम से ?
 दाढ़ी भी  पता नही किस दिन बनाता था ? जब भी देखा  ,उतनी की उतनी , सफ़ेद काली , मिक्स वेज जैसी , न कम न ज्यादा ! पोशाक बिलकुल , भारतीय पजामा कुर्ता ,कभी चेक का हरा - नीला तहमद  ,जिससे उसके धर्म का पता चलता था , पर गरीब का धर्म नही , पेट होता है , क्या पता ? किसी बड़े सहाब ने खुस होकर दिलवाया हो या सस्ता पड़ता हो, इस महगाई मे तहमद से तन को ढकना ,या मनरेगा योजना के जॉब कार्ड को अपने पास  जमा करने के बाद ,प्रधान जी ने इनाम मे दिया हो |

कभी कभी चढ़ाई पर बच्चो को नीचे उतर कर रिक्शा मे  धक्का मारते हुए देखा था मैंने | जिससे पता चलता था की सरकार की किसी योजना से उसे भरपेट खाना न मिला ,  फिर शरीर मे ताकत कहा  होती ? कभी कभी बारिश तेज़ होने पर वो नही आता था ," बच्चे स्कूल नही जा पाए" इसलिए पैसे काट लिए जाते उसके , भले ही उस दिन स्कूल बंद हो जाता हो रैनी डे के नाम पर |

उस दिन अचानक उसकी मुर्गे के बांग जैसी रिक्शा की आवाज़ नही आई , बल्कि हलके  से सु - सु जैसी आवाज़आई मानो बिल्ली दवे पाव घर मे घुस  रही हो हडबडाहट मे अजीब से आवाज  सुनकर मे उठा , और बहार आकर देखा की एक नया प्रकार का रिक्शा खड़ा था , लाल रेक्सीन की छत बेठने की 8 लोगो की  सुंदर मजबूत सीट और आगे मोटरसायकिल जेसा हेंडिल , और मुस्कराता साफ सुथरा  नोजवान  चालक ,मानो हो रहा भारत निर्माण !
पूछने पर पता चला की दिल्ली मे १ लाख मे मिलता है और बेटरी से चलता है |बस रात मे चार्ज करो दिन मे पैसा कमायो |
अमर सिंह जी से पूछना ही पड़ा " पुराने को क्यों हटा दिया "
"भाई सहाब कई बार दारू पीकर रिक्शा चलाता था जी "
 "खुद मैंने पकड़ा उसको "
"छुट्टिया इतनी करता था की बस " ..गहरी साँस ली
भाभी जी भी  चुप न रही ,बोल ही  गयी " कई बार लेट कर दिया बच्चो को "
 "अजी चढ़ाई पर बच्चो से धक्के लगवाता था |"
 " पैसे भी जाएदा थे ६०० ले रहा था ये ५०० मे है "
अब मेरी बारी थी बोलने की " जब इतनी कमिया थी तो ४ सालो से क्यों नही बदल  दिया उसको "?
उनकी चुप्पी ने सब बोल दिया |मे बापस आ गया ||सोच रहा था की टी बी की सरकारी  दवाई पीने बाला गरीब , दारू कहा से पियेंगा ? महेनत कश लोगो के लिए अब क्या बचा ?
मै चुप रह कर भारत निर्माण देख रहा था |
मौलिक एवं अप्रकाशित 

Friday, August 16, 2013

भारत निर्माण की राह... नारी शिक्षा !

शिक्षा हर देश , समाज , परिवार के लिए आवश्यक तत्व है किन्तु भारत के लिए ये अनेको समस्याओ का हल भी है |
शिक्षा ही मानव को मनुष्य बनती है और साक्षरता तो शिक्षित  नही मान सकते |मनुष्य की चेतना का निर्माण शिक्षा से ही होता है सबसे जरुरी है नारी शिक्षा क्युकी भारत मे नारी शिक्षा दर वास्तव मे काम ही है क्युकी जरुरत है उच्च शिक्षा की और यहा माध्मिक शिक्षा को ही शिक्षा का पैमाना मन जाता है |

अगर परिबार की महिला उच्च शिक्षित हो तो उसका प्रभाव सर्वप्रथम परिवार की नई पीढियों पर तदुपरांत समाज औरआस - पास के  इलाके पर क्रन्तिकारी रूप से पड़ता  है | एक नारी को दी शिक्षा  सामाजिक विकास एवं परिवर्तन के नये  रास्ते खोलते है |क्युकी उसका प्रभाव उसके बालको पर पड़ता है उनकी शिक्षा देना सरल हो जाता है |

भारत की वर्तमान मुख्या समस्या है एकता और अखंडता पर मडराता खतरा और दिल्ली से दूर राज्यों मे अलगावबाद की फैलती विचारधारा बास्तव मे  असिक्षित या  अल्प शिक्षित को ही जूठे नारों और उद्देश्यों से सरलता पूर्वक   बहलाया जा सकता है |और बहलाया जाता है | जबकि  शिक्षित युवा क्रांति नही , अपना भविष्य देखता है अपना और परिवार का विकास करना उसका उद्देश्य बन जाता है |
कश्मीर  घाटी, नक्सल प्रभावित भूमि और उत्तर पूर्व राज्यों  पर बनी बिकास एवं कल्याण  योजनाओ पर अरबो रुपए पानी की तरह बहाने के बाद भी एन इलाकों  मे  उतना प्रभाव नही पड़ा जितना होना चाहिये था | अगर बहा के युवा समाज को रोजगार और शिक्षा के लिए भारत के अन्य भागो  मे विशेष सुबिधा एवं प्रोत्सहान  दीया  जाये तो सांस्क्रतिक मिलन , रोजगार के सामान अबसर , निवास की सुविधा दी जाये एवं  परस्पर अविश्वास का खात्मा करके उन्हें आगे बदने का मोका दिया जाये तो उन्हें  मुख्य धारा और धरा से जोड़ा जा सकता है |और भारत को अखंड रखा जा सकता है  |
 समस्या  प्रभावित इलाकों के साथ ही सम्पूर्ण देश  मे  टोटके के रूप मे बालिकायो की   उच्च  शिक्षा सुविधा के लिए सरकार को तुरंत प्रभावी  योजनाये बनानी चाहिये |एवं सांस्क्रतिक प्रवास पर बल भी  देना आवश्यक है | ताकि सबको ,  सब जगह अपना देश लगे |
शिक्षा मे जरुरी है एक समान पाठ्यक्रम एक देश एक सी शिक्षा होना आवश्यक है |साथ ही उच्च शिक्षा को निजी करण से दूर किया जाये क्युकी अब ये एक व्यापार बन गया है गुणबत्ता काम हो गयी है ! गरीबो से दूर हो गयी है |और प्रतिभाशाली छात्र अब भी बंचित ही  है |
विषय विस्तृत होने के कारन मंच के प्रबुद्ध सहयोगियों से  चर्चा की अपेक्षा है .........

Thursday, August 8, 2013

जज्बात !

मै अपनी तक़दीर पर कभी , रोया या नही रोया 
पर मेरे जज्बातों पर आसमा टूट के रोया |
मै क्या क्या बताऊ मे क्या क्या गिनाऊ ,
क्या नही पाया मैंने क्या नही खोया |
मेरी हर रात कटी है सो वीमारो के जैसे 
दर्द से जुदा होकर मै एक पल नही सोया |
मेरे जीने पे  जो जालिम , मातम मनाता रहा ,
मेरे मरने  पर वो जी भर के क्यों रोया |
मेरे दिल के जख्म फूलो से निखरते रहे   
मैंने कभी इनको मरहम से नही  धोया |
बडो की ये बड़ी बाते ,हमे देती रही है ये  नसीहत
अब काटो  बही जो  बीज वो तुमने था जो बोया |

Monday, August 5, 2013

भारतीय राजनीति के मिल्खा सिंह मोदी

आज निर्विवाद रूप से , मोदी देश के सबसे लोकप्रिय नेता  तो है | जिनमे देश के प्रधानमंत्री बनने के अनेको गुण है किन्तु समस्त अव्यस्यक गुण अभी तक उनमे नही आ पाए है |एक तरफ तो उनकी बिखरी हुई  बीजेपी पार्टी है ,जिसे आजकल राजनीतिक रूप से अछूत दिखाया जाता है ,और  जिस कारण उसके साथ समान विचारधारा बाले कुछ दल ही है और संसद मे बहुमत के लिए गड्बंधन की बिना कोई  भी सरकार  बननी नही  है | उनको एस दल से  प्रधान मंत्री बनने के लिए , अटल बिहारी बाजपेई जी जैसी सर्वस्वकरती , नेतर्त्व के गुण , भाषण की वो कला जिस को  विपक्षी भी सुनना चाहे , और सबको साथ लेकर आगे चलने की स्पस्ट दिखती  सोच दिखानी होंगी  |और दूसरी तरफ आपस में उलझे उनके दल के नेता, सत्ता को  करीब पाकर कही उस टिड्डे की तरह न हो जाये जो भूख लगने पर अपने परो को  ही खाने लगता है |कई बार होता है की आदमी का गुण ही उसके लिए अवगुण बन जाता है |उत्पत्ति के कारण ही विनाश हो जाता है अब देखना यह है की मोदी एन सब समस्याओ पर कितनी जल्दी विजय प्राप्त करते है नही तो सत्ता की गाँधी नगर से दिल्ली ये बाधा  दोड़ जिसमे बाधा ही बाधा है , जीतना तो दूर पूर्ण करना ही मुस्किल होंगा  |और देश को इसका खामियाजा भुगतना होंगा 
अमन अन्गिरिशी 

Thursday, July 25, 2013

लेट नाईट डिनर


 भारत के आम नागरिक इतिहासिक रूप  से गरीब रहे है |इसलिए आज भी आजीविका के रूप मे मिली सरकारी नोकरी हो या कोई अन्य सावर्जनिक पद , वे उस को  हर प्रकार से अपने फायदों के लिए अधिकतम और सम्पूर्ण  उपभोग करने के विशेष  प्रवत्ति रखते है | और सेवा भाव के स्थान पर मेवा भाव आ जाने के कारण  लापरवाही और भारस्ताचार का बोलबाला चारो और है |मिड  डे मील जैसे कार्यक्रम शिक्षा देने और शिक्षित करने मे  कितने सफल है ये तो बक्त बतायेंगा, पर एसी योजनायो से  कितने सलंग्न लोगो के लेट नाईट डिनर बन रहे है यह सोच का विषय है !जिसका खामियाजा इन मासूमो को अनचाये भुगतना पड़ा | दुःख तो यह है की योजना की कमियों , बच्चो की मौत से जाएदा जरुरी  वोटो की राजनीती हो गयी है |उसी के लिए सारी कवायत होती दिख रही है !

Tuesday, July 16, 2013

भारत भाग्य विधाता .....

बास्तव मे भारत की वर्तमान राजनीती बड़े  उधोग मे बदल गयी है ! जिसका लक्ष्य असीम धन और शक्ति है और हर दल अपनी कम्पनी को अलग ब्रांड नेम से चला रहा है |
 कोई समाजवाद के नाम राजनीती शुरू करके अब  पर परिवार वाद चला रहा है तो  कोई दलित उत्थान के नारे को बेच कर स्मारक बना, पैसा कम   रहे है| तो कोई मन्दिर - मस्जिद पकड कर अभी तक  बेठा है  |तो कोई बंश वाद के सहारे सत्तासीन है |हर राज्य से लेकर केंद्र मे ये लोकतंत्र के सत्ताहड़प राजा अपनी कंपनी चला रहे है पर लक्ष्य सबका एक ही है वो है येन -केन- प्रकरण सत्ता पर कब्ज़ा करना  असीम धन- सत्ता सुख  के सागर मे डुबकी लगाना | इनके परिवार तो क्या इनके दूर -दूर के रिश्तेदार भी इनकी बाटी रेवड़ीया खाते है | पर दोष कही न कही इनके जूठे नारों के सुनहरे  जाल मे फस कर , तडपते लोगो का है| जो इन्हे सिर आँखों पर बिठाते  है  |और कभी धर्म तो कभी जाति तो कभी भाषा के विज्ञापन से भाबुक और  मजबूर होकर इनको फिर मजबूत बनाते है  

Tuesday, July 9, 2013

अब विदा हो बे -गुणा

अब विदा हो बे -गुणा  
    बर्बादे गुलिस्तान के खातिर बस एक ही उल्लू काफी था , हर साखपे उल्लू बैठा हैअंजामे गुलिस्ता क्या होगा ?एक नेता को हटाकर किसका भला होने बाला है केंद्र से लेकर पंचायत स्तर तक , सत्ता से लेकर विपक्ष तक शासन से लेकर प्रशासन तक गिद्ध बेठे है जिनकी चोंच बड़ी लम्बी है पर अंडे नही देते | उत्तराखंड आपदा के समय राजनीतिक , प्रशसनिक और आपदाप्रबंधन के साधन  पूर्णतया विफल हुए  अब जनता किससे  क्या  उम्मीद करे जो  उनके बारे मे सोचे  | भारतीय समाज स्वकेंद्रित और बेशर्म  हो गया है |अधिकतम वेयक्तिगत लाभ  के लिए ही पद दोहन किया जाता है अब आम  जनता को सोचना है की भारत को किस और ले जाना है |यहा तो हर तरफ बे गुणा ही है |फिर भी उम्मीद अभी बाकि है |ये चमत्कारों का देश है |



Thursday, June 27, 2013

मेरे महानायक .........

उत्तराखंड की आपदा हो ,या देश के दुश्मनो के काले कारनामो  मे लाखो लोगो का  एक मात्र सहारा भारतीय सेना, उसका एक हेलीकाप्टर दुर्र्घटना ग्रस्त हुआ और हमारे नायक सहीद हुए ! घटना स्थल के निकट होने के कारण , मन मे कुछ भाव उठे जो लिख रहा हु ! मंच के प्रबुद्ध भागीदार त्रुटियों को माफ़ करते हुए |सभी को भगवान सुरक्षित करे शांति दे यही इच्चा है !
मेरी भावना समझने की क्रपया करे 
तंग हालात मे जो हस के गुजर जाते है |
मुसीबतों मे  जो सोना सा निखर जाते है 
उनकी पेशानी  पे  चमका ना पसीना श्रम का 
उनकी राहो  मे दुःख आकर ठहर जाते है |
तंग हालात मे जो हस के गुजर जाते है 
देश के खातिर जो   अपनी जान पर खेल जाते है । 
मुसीबत जो भी हो , याद वो ही आते है ।
हमला सीमा पर हो या अंदर सामने वो खड़े हो जाते है !
घर परिवार है उनके भी, अपने बच्चे याद कहा आते है !
देश के हर दुश्मन को वो हिम्मत से   मार भगाते है
 या  तिरंगे मे  लिपटे ताबूत मे बापस  घर तब अपने  आते  है |
देश के जर्रे - जर्रे से  सदा महानायक का दर्ज़ा पाते है |
मोलिक एवं अप्रकाशित -
नोट >( संशोधन करते समय ये रचना अज्ञात कारणों से समाप्त हो गयी है  )